मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

Is there a God ?

An atheist professor of philosophy speaks to his class on the problem science has with God, The Almighty.He asks one of his new students to stand and …..
Prof: So you believe in God?
Student: Absolutely, sir.
 Prof: Is God good?
Student: Sure. 
Prof: Is God all-powerful?
 Student: Yes. 
Prof: My brother died of cancer even though he prayed to God to heal him. 
Most of us would attempt to help others who are ill. But God didn’t. How is this God good then? Hmm?
 (Student is silent.)
 Prof: You can’t answer, can you? Let’s start again, young fellow. Is God good?
 Student: Yes.
 Prof: Is Satan good?
 Student: No.
 Prof: Where does Satan come from?
 Student: From…God…
 Prof: That’s right. Tell me son, is there evil in this world?
 Student: Yes.
 Prof: Evil is everywhere, isn’t it? And God did make everything.Correct?
 Student: Yes.
 Prof: So who created evil?
 Student does not answer.
 Prof: Is there sickness? Immorality? Hatred? Ugliness? All these terrible things exist in the world, don’t they?
Student: Yes, sir.
 Prof: So, who created them?
 Student has no answer.
 Prof: Science says you have 5 senses you use to identify and observe the world around you. Tell me, son…Have you ever seen God?
 Student: No, sir.
 Prof: Tell us if you have ever heard your God?
 Student: No, sir.
 Prof: Have you ever felt your God, tasted your God, smelt your God? Have you ever had any sensory perception of God for that matter?
 Student: No, sir. I’m afraid I haven’t.
 Prof: Yet you still believe in Him?
 Student: Yes.
 Prof: According to empirical, testable, demonstrable protocol, science says your GOD doesn’t exist. What do you say to that, son?
 Student: Nothing. I only have my faith.
 Prof: Yes. Faith. And that is the problem science has.
 Student: Professor, is there such a thing as heat?
 Prof: Yes.
 Student: And is there such a thing as cold?
 Prof: Yes.
 Student: No sir. There isn’t.
 (The lecture theatre becomes very quiet with this turn of events.)
 Student: Sir, you can have lots of heat, even more heat, superheat, mega heat, white heat, a little heat or no heat. But we don’t have anything called cold. We can hit 458 degrees below zero which is no heat, but we can’t go any further after that. There is no such thing as cold. Cold is only a word we use to describe the absence of heat. We cannot measure cold. Heat is energy. Cold is not the opposite of heat, sir, just the absence of it.
 (There is pin-drop silence in the lecture theatre.)
 Student: What about darkness, Professor? Is there such a thing as darkness?
 Prof: Yes. What is night if there isn’t darkness?
 Student: You’re wrong again, sir. Darkness is the absence of something.
You can have low light, normal light, bright light, flashing light….But if you have no light constantly, you have nothing and it’s called darkness, isn’t it? In reality, darkness isn’t. If it were you would be able to make darkness darker, wouldn’t you?
 Prof: So what is the point you are making, young man?
 Student: Sir, my point is your philosophical premise is flawed.
 Prof: Flawed? Can you explain how?
 Student: Sir, you are working on the premise of duality. You argue there is life and then there is death, a good God and a bad God. You are viewing the concept of God as something finite, something we can measure. Sir, science can’t even explain a thought. It uses electricity and magnetism, but has never seen, much less fully understood either one. To view death as the opposite of life is to be ignorant of the fact that death cannot exist as a substantive thing. Death is not the opposite of life: just the absence of it. Now tell me, Professor. Do you teach your students that they evolved from a monkey?
 Prof: If you are referring to the natural evolutionary process, yes, of course, I do.
 Student: Have you ever observed evolution with your own eyes, sir?
 (The Professor shakes his head with a smile, beginning to realize where the argument is going.)
 Student: Since no one has ever observed the process of evolution at work and cannot even prove that this process is an on-going endeavor, are you not teaching your opinion, sir? Are you not a scientist but a preacher?
(The class is in uproar.)
 Student: Is there anyone in the class who has ever seen the Professor’s brain? (The class breaks out into laughter.)
 Student: Is there anyone here who has ever heard the Professor’s brain, felt it, touched or smelt it? No one appears to have done so. So, according to the established rules of empirical, stable, demonstrable protocol, science says that you have no brain, sir. With all due respect,
Sir, how do we then trust your lectures, sir?
 (The room is silent. The professor stares at the student, his face unfathomable.)
 Prof: I guess you’ll have to take them on faith, son.
 Student: That is it sir… The link between man & god is FAITH. That is all that keeps things moving & alive.
 WANT TO KNOW WHO THAT STUDENT WAS ?
 This is a true story, and the student was none other than………
 Dr. APJ Abdul Kalam, the Ex president of India

गुरुवार, 29 नवंबर 2018


अंबेडकर और गाँधी समाज के नायक हैं ।

भारतीय समाज के वर्तमान परिदृश्य में अंबेडकर व गाँधी की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही है पिछले कुछ समय से यह मसहूस किया जा रहा कि महात्मा गाँधी ने भारत के बंटवारे व अन्य देशभक्तों के साथ जो जो अन्याय में  उन्होने अनदेखा किया है वह भारतीय जनमानस में एक पक्ष सहन नहीं कर पा रहा है वास्तव में जिस के साथ गुजरती है वह जानता है कि उसने अपना सब कुछ परिवार आदि देश के लिये खो दिया लेकिन गाँधी जी उस समय ऐसे मकाम पर थे कि उनके कहे को सुना जाता था लेकिन कुछ ऐसे निर्णय उन्होंने उस समय में लिये जो सबको हैरान करने वाले रहे हैं उस सब कुछ के बाद भी उनका दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है विश्व उनके सिद्धांतों से परिचित है और उनकी आवश्यकता को महसूस करता है हम यह भी मान कर चलते हैं कि गाँधी की चुप्पी गलत रही है लेकिन उनके अनेकों कार्य ऐसे रहे हैं जिनके आगे उनकी कमियाँ छोटी पड़ जाती हैं और उनके दर्शन को मान कर हम वर्तमान भारतीय समाज को नई राह दिखाने में जितना भी सहायक हो सकता है उसकी भरपूर सहायता को स्वीकार किया जाये और उनको कहा व सुना जाने की आवश्यकता है भारतीय समाज को विभिन्न विदेशी सरकारी ताकतें, धार्मिक,उग्रवाद आदि विखंड़ित करने में पूरजोर कोशिशें कर रही हैं और वे कामयाब भी हो रही हैं हमें अपने समाज को एक करने में महात्मा गाँधी की भूमिका का लाभ लेना होगा जो कि आज भी भारतीय समाजिक दायरे पर प्रभाव रखता है समाज को नई दिशा देने में उनकी शिक्षाओं को पुनः प्रचारित किया जाना चाहिये।  
                          दूसरे बड़े कद में डाँ बी आर अंबेडकर साहब आते हैं इनका योगदान भारतीय संविधान के अलावा अनेकों समाजिक कुरीतियों को दूर करने में सहयोगी रहा है यह वर्तमान समाज को एक करने में, देश की प्रगति को उच्च स्तर तक पहुँचानें में सहयोगी रहेगा उनके कहने से , उनके पढ़ने से , उनकी शिक्षाओं को प्रचारित करके हम समाज को पुनः एकिकृत कर सकते हैं जो समाज आज के समय में विखंड़ित हो रहा है जिसे बाहरी शक्तियाँ नष्ट करने में लगी हुऊ हैं जिसमें कुछ राजनीतिक शक्तियाँ बढ़ावा देती आई हैं उनसे बचने की आवश्यकता है व अंबेड़कर के भारतीय सिद्धांतों को अपना कर पूरा किया जा सकता है इनको भी समाज के एक पक्ष को ग्रहण करना होगा जो कि बहुत ही जरूरी है समाज के सभी पक्षों को दोनों महापुरूषों को वर्तमान के परिदृश्य में स्वीकार करना होगा ।
                                                                 सूबे सिंह सुजान    

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

उनके कहने से जो हर बात सही होती है ... ग़ज़ल सूबे सिंह सुजान

                                 ग़ज़ल     

उनके कहने से जो हर बात सही होती है  
तो मैं ये समझूँ के सब उनकी कही होती है 

हम जिसे जाँच परख़ देख रहे होते हैं 
बाद उसके भी परख़ बाक़ी रही होती है 

ज़िन्दगी मुझसे यूँ तो रूठ गई है बेशक  
दिल की इन धड़कनों में फिर भी वही होती है 

अपनी नाक़मी का इल्ज़ाम जो ओरों को दे 
सच में उसने कोई कोशिश की नहीं होती है 

मुँह से जो बोलते हैं सच वो नहीं होता है 
दिल में जो बात है चेहरे पे वही होती है    


    शायर                                सूबे सिंह "सुजान"  

शिक्षा दिवस मनाया जाने के दिन नजदीक आ रहे हैं


सच में एक दिन बहुत जल्द ही *शिक्षा दिवस* मनाने की आवश्यकता पड़ने वाली है ।
क्योंकि शिक्षा तो गायब ही हो रही है हर रोज शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों से दूर किया जा रहा है ।
गोया जो जो भाषा,संस्कृति,गुरू गुजरने या अंतिम समय में लगते हैं हम उन्हें बचाने की मुहिम को दिवस के रूप में मनाते आये हैं और मनाने का अर्थ बहुत ज्यादा यह लगता है कि हम अपनी कोशिशों को तिलांजलि दे देते हैं ।
सरकार व विभागीय अधिकारियों की कोशिश ही जिम्मेदार होती है लेकिन हम शिक्षक लोग बड़े आराम से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं जबकि समाज में किसी भी रीति रिवाज़ या संस्कृति को मारने में सब हिस्सेदारी में होते हैं  खैर कुछ तो मकसद दिवस मनाने के अच्छे भी होते हैं यदि सकारात्मक रूप से हर जगह इस्तेमाल किये जायें तो ।
मुझे लगता है हमारे नेताओं से ज्यादा हमारे विभागीय अधिकारियों की कमियाँ ज्यादा होती हैं किसी भी परिपाटी को शुरू करने या बंद करने में और ये परिपाटी या आदेश ही अच्छा या बुरा मोड़ देते हैं ।
नेतागण तो चंद रोज होते हैं बदल जाते हैं ।
और हमारे कर्मचारी,संस्था,समाज सारा फोकस सरकार व नेताओं को देते हैं जिस कारण दोष समाज में पनपते ही रहते हैं और बीमारियाँ लाइलाज हो जाती हैं । हम समाज के जो जागरूू लोग हैं हम भी नेेेता के ही पीीछे पड़ कर तक गये हैैं हम बहुुुत बार स्वयं को ही समझदार 
समझ बैठते हैं और निशाना चूक हो रही होती है अब हमें ये निशाना चूक ठीक करनी होगी तभी कुछ हालात बदलेंगें।

सूबे सिंह सुजान

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

ग़ज़ल - सपने हैं काँच के जरा रखना संभाल कर

सपने हैं काँच के जरा रखना संभाल कर 
जीना पड़ेगा,दिल से,महब्बत निकला कर 

मैंने कहा था इतना कि चलना संभाल कर 
वो देखने लगे मुझे आँखें निकाल कर 

मुझसे जो दोस्ती करो तो ध्यान रखना ये 
किस्मत को आँकना मेरी सिक्का उछाल कर 

कीटाणु दिल के पानी में इतने पनप गये 
पीने दे अब मुझे भी महब्बत उबाल कर 

अपनी ग़ज़ल में मैं तेरी बातें भी करता हूँ 
ग़ज़लों को सुन मेरी, और खुद को निहाल कर 

अपनी कहानी कहनी है तो कहना अपने आप 
लेखक नहीं कहे तो न इसका मलाल कर 

चालाकियाँ पहुँच गई ऐसे मुकाम पे 
सब खेलते हैं ताश से पत्ते निकाल कर 

क्या प्यार है कि दोस्त भी पहचानते नहीं 
चेहरे पे मेरे कौन गया रंग डाल कर 

ऐ आने वाली नस्लों तुम्हें हैं संभालने 
हम दे रहे तुम्हें नये रस्ते निकाल कर 

    *सूबे सिंह "सुजान"*
*कुरूक्षेत्र हरियाणा*
  *मोबाइल*  *9416334841*
*email* *subesujan21@gmail.com*

https://youtu.be/Tz_4M72uJ-M 

https://youtu.be/Tz_4M72uJ-M



मंगलवार, 18 सितंबर 2018

रविवार, 26 अगस्त 2018

प्रेमिकाओं की यादें

मैं जब सोने को लेटता हूँ नींद का इंतजार करता हूँ और नींद आने में देर लगाती है तो मुझे उस वक्त प्रेमिकाओं की यादें आने लगती हैं पहले तो पहली प्रेमिका यादों में आती है वो ऐसी प्रेमिका रही है जैसे कभी उससे कुछ भी लेने की इच्छा आज तक नहीं पैदा हुई ,बस सारी कोशिश उसे खुद को समझाने में लगा दी लेकिन जिन्दगी के महत्वपूर्ण दिनों में भी मैं उसे समझा ही नहीं पाया क्योंकि उसने मुझे समझने की तरफ कदम ही नहीं बढ़ाया और ये पागल दिल मेरा आज भी सबसे पहले,नींद से भी पहले उसी को याद करता है और वो याद आती है तो दुनिया की खबर आने लगती है और नींद गायब हो जाती है ।
उसको केवल देखा ही है और यही बहुत है बहुत यूँ कि अब तक वही तो है सबकुछ, जो यादों में भी,कविताओं में भी, जीवन दर्शन में भी है ।

सोचता हूँ कि लोग कौन सी प्रेमिका को पसंद करते होंगे यथार्थ जो अधिकतर देखने को मिलता है वह तो ऐसा नहीं लगता जैसा मेरा है लेकिन मैं सबको समझने की कोशिश क्यों करता हूँ ?मालूम नहीं ।
हो सकता है मुझे भी बहुतों ने समझा हो या समझने की कोशिश की हो ।
खैर आगे चलिये ।

फिर दूसरी प्रेमिका याद आती है जो मुझे चाहती थी लेकिन मैं उसे यही नहीं समझा सका कि मैं किसी को प्यार करता हूँ और वो मुझे प्यार नहीं करती लेकिन उसे मेरी बातों से कोई मतलब नहीं था वो मुझे प्यार देना चाहती थी और ये समझाना चाहती थी कि तुम उसके पीछे मत दौड़ो जो तुम्हारा नहीं है और मैं उसकी यही बात नहीं समझ सका और उसे नाराज कर दिया ।

बरसों बाद मुझे सोने से पहले सारी बातें याद आ रही हैं तो पता चलता है कि दूसरी प्रेमिका यथार्थ थी और उसे नाराज करना मेरी मूर्खता थी खैर कहीं न कहीं मूर्ख एक समय में सब होते हैं जो यह सोचते हैं कि उन्होंने प्रेमिकाओं को खूब भोगा है वे भी बाद में पश्चाताप करते रहे होंगे और अपनी मूर्खता पर गुस्सा होते रहे होंगे ।
लेकिन ये प्रेमिकाएँ ही दुनिया बनाती हैं ऐसा तो नहीं है हाँ दुनिया को मनोरंजक तो जरूर बनाती हैं मुझे पेड़ों से भी प्यार हो जाता है तो उनको भी मैं दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए प्रेमिका से ज्यादा धन्यवाद करता हूँ बेल जब पेड़ों पर चढ़ती है तो बहुत खूबसूरत गहना बनकर पेड़ को सजा देती है मैं ऐसे दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध होता रहता हूँ लेकिन जब यह देखता हूँ कि लोग इस दृश्य को और इस दृष्टिकोण से नहीं देख रहे हैं तो दुनिया पर हँसते हुए आगे चलता हूँ ।


सोमवार, 23 जुलाई 2018

अदबी संगम कुरूक्षेत्र ने गोपालदास नीरज को दी श्रद्धांजलि

कुरूक्षेत्र - आज दिनांक 22 जुलाई को अदबी संगम कुरूक्षेत्र की मासिक काव्य गोष्ठी श्री दीदार सिंह कीरती जी की अध्यक्षता में अखंड गीता धाम सेक्टर आठ, कुरूक्षेत्र में हुई जिसमें सर्वप्रथम साहित्य जगत के चितेरे गीतकार गोपालदास नीरज को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई श्री गुलशन कुमार ग्रोवर जी ने यह पंक्तियाँ गायी ।

 "अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाये,
जिसमें इनसान को इनसान बनाया जाये ।"

श्री आर के शर्मा ने गोपालदास नीरज की कविताओं व गीतों को सुनाकर महफ़िल को मदमस्त करते हुए गीतों में श्रद्धांजलि दी ।

 आज की काव्य गोष्ठी में डॉ बलवान सिंह ने वर्तमान परिदृश्य पर कविता में कहा -
 "वो बोले मगर संसद में भूचाल नहीं आया ।
गुनगुनाने की कोशिश की पर सुरताल नहीं आया।।

 इधर गले पड़े और आंख मारी उधर जाकर ।
तनिक भी संसद की गरिमा का ख्याल नहीं आया।।"
                       डॉ बलवान सिंह

"सारी दुनिया की दौलत कम है मां के हाथों की रोटी के सामने ।
सारी दुनिया की खुशियां मिली उसे जिसने भी मां के हाथों की खाई रोटी"

  गुलशन कुमार ग्रोवर जी ने हिंदी के महान कवि गीतकार ग़ज़लकार पदम विभूषण दिवंगत श्री गोपालदास नीरज को श्रद्धांजलि देते हुए उनका यह शेर ही गोष्ठी में पढ़ा 
"अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए ।
 जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए ।। "

मोती राम तुर्क ने दोहे पढ़े
 पानी आंखो में मरा , मरी शर्म और लाज ।
कहे बहू अब सास से,घर में मेरा राज ।।
भाई भी भाई भी करता नहीं,भाई पर विश्वास ।
बहन पराई हो गई , साली खासमखास ।।
मोती राम तुर्क

मैं मजबूर हूं तभी तो मजदूर हूं दिल मेरा भी है दिल में धड़कती ख्वाहिशें हैं 
   संजय मित्तल   

सुमन प्रजापत युवा कवियित्री ने अपनी कविता इस तरह पढ़ी ।
हकीकत है सच्चाई है खुद पर बीती औरों ने भी बताई है अपने हाथों हमने खुद आग लगाई है ।

सुमन प्रजापत   

प्रकाश कुमार कश्यप ने अपनी रचना पेश करते हुए कहा
      "सुना है इरादे क़त्ल में तलवार जरूरी नहीं 
वो नज़र भी किसी खंज़र से कम नहीं रखते ।
  प्रकाश 
 अन्नपूर्णा शर्मा ने भी गीतकार गोपालदास नीरज को श्रद्धांजलि के रूप में अपनी कविता कही

चला गया है वह गीतों का चितेरा
 दुखा गया वह दिल तेरा
  वह सूरज सा दीप्तिमान था ।
चमकता उसमें आसमान था ।
प्यार के गीतों को जिसने टेरा ।
चला गया है वह गीतों का चितेरा ।।

और गंगा मलिक जी ने गीत तरन्नुम में पेश करते हुए कहा  -
अब तो होने लगी बरसात केहि विधि आन मिलो आज बस में नहीं जज्बात केहि विधि आन मिलो नींद नैनों की गलियों में आती नहीं
बूंद बरखा कि तुम बिन सुहाती नहीं
मोहे बैरन लगे है बरसात केहि विधि आन मिलो ।

छूट गए सब संगी-साथी सागर साकी और शराब कालचक्र सा बदल रही है अपना भी दस्तूर गजल ।
   कस्तूरी लाल शाद

कोई अर्ज़ी कोई दरख्वास्त अब मंजूर नहीं होती
क्यों कहीं पूरी अब कोई फरियाद नहीं होती 
   करनैल खेड़ी साहब 

 ओम प्रकाश राही ने कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए अपनी राष्ट्र के नाम कविता में कहा राही क़फन तिरंगे वाला चूम चूम कर गाती माँ 
और अगर एक बेटा हो तो वतन पे उसे लुटाती माँ । 

दीदार सिंह कीरती जी जिन्होंने आज की गोष्ठी की अध्यक्षता की उनका अंदाज पंजाबी कविता में देखिए -
 "रिश्वत मेरे देश दे अन्दर, लाउंदी हर काम नूं पहिये ।
  अनहोनी नूं होणी करदे, रखो तली दे जदों रुपिये ।।

डॉ राकेश भास्कर जी ने काव्य गोष्ठी की मेजबानी भी की और उनकी हास्य व्यंग्य कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए -

 मित्रों आप भी अपनी सुख सुविधा हेतु
एक सेकेंड हैण्ड कार खरीद लो

आज की काव्य गोष्ठी में कविता व ग़ज़ल सुनाने वाले कवियों व शायरों में श्रीमती शकुंतला शर्मा, श्री दीदार सिंह कीरती, डॉ राकेश भास्कर ,श्री कस्तूरी लाल शाद, श्री ओमप्रकाश राही, श्री आर के शर्मा, श्रीमती गंगा मलिक, श्रीमती अन्नपूर्णा शर्मा, गुलशन कुमार ग्रोवर, सूबे सिंह सुजान, सुमन प्रजापत, डॉ बलवान सिंह, संजय मित्तल, सुधीर ढांढा,करनैल खेड़ी, प्रकाश कुमार, मोती राम तुर्क, नीलम,अमित,राजेश आदि नये कवियों ने भी कविताएँ सुनाई ।

सूबे सिंह सुजान
सचिव -अदबी संगम कुरूक्षेत


शनिवार, 7 जुलाई 2018

शोध लेख *कवितालयों की आवश्यकता*


*कवितालयों की तीव्र आवश्यकता है*
जिस तरह अस्पताल व पुलिस स्टेशनो की जरूरत है
उसी तरह से समाज को कवि व कविताओं की की जरूरत है। 
कविता समाज की जुबान होती है कविता के माध्यम से समाज अपनी बात कह पाता है अपनी भावनाओं को मासूमियत व नाजुकी से  कह व सुन पाता है ।
अपनी बात कहने को तो हम सारा दिन आपस में न जाने कितना बोलते हैं और किसी समय बोलने के कारण ही आपस में प्यार करते हैं या लड़ाई कर बैठते हैं हर प्रकार के व्यक्ति होते हैं कुछ व्यक्ति बहुत कम बोलना पसंद करते हैं तो कुछ बोलने से रोके नहीं रुकते, अर्थात मनुष्य बिना बोले या बातें किये रह नहीं सकता हर काम करने के लिए मनुष्यों को एक दूसरे पर निर्भर होना पड़ता है यही प्रक्रिया समाज का निर्माण करती है ।
*अब बात करते हैं समाज व कविता का संबंध पर और उसकी आवश्यकता पर*
मनुष्यों को जितनी जरूरत स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर,अस्पतालों की पड़ती है उसके पीछे बीमारियाँ कारण होती हैं लेकिन बीमारियाँ होती ही क्यों हैं इनके होने के कारण को पता तो करना चाहिए कुछ बीमारियाँ वायरस आदि से होती हैं लेकिन वर्तमान टेक्नोलॉजी के युग में मनुष्य का भी मशीनीकरण हो गया है जिसकी वजह से अधिकतर बीमारियाँ मनुष्य द्वारा अपने शारीरिक अंगों का समुचित प्रयोग न करना या विपरीत दिशाओं में प्रयोग करना जो प्राकृतिक नहीं होता जिससे अनेकानेक बीमारियाँ पैदा होती हैं  इन बीमारियों से निजात पाने के लिए हमें बहुत सी क्रियाओं को करना पड़ता है जो हमारे मन मस्तिष्क पर असर डालती हैं कविता भी उन्हीं क्रियाओं में से सबसे मुख्य होती है  तो क्यों नहीं हम इन कारणों के लिये कविता,कहानी जैसी सार्थक क्रियाओं को प्रभावी बनायें और जिस प्रकार सरकार अस्पताल,पुलिस स्टेशन पर बजट खर्च करती है उसी प्रकार "कवितालय" बनाये जायें जहाँ पर लोगों को कविता सुनाकर उनके तनाव,मानसिकता रोगों को,काम के बोझ से पैदा हुए रोगों से निराकरण किया जा सके तथा साथ ही साथ मोबाइल वैन की तरह कवि उपलब्ध करवाये जायें जो समाज की आवश्यकता को वहीं जाकर पूरी करें ।
कविता मानव मन मस्तिष्क पर प्राकृतिक रूप से प्रभाव डालती है और मनुष्य की गलत आदतों में सुधार लाती है तथा अप्राकृतिक कार्य करने से रोकती है और मनुष्य को प्राकृतिक बनाती है प्राकृतिक रूप से बहने वाली हर वस्तु,मनुष्य,समाज स्वयं स्वस्थ हो जाता है कविता मनुष्य को परिभाषित करती है जिससे वह रूकता नहीं,समाज में बाधा नहीं आती और मनुष्य सकारात्मक होता जाता है ।
कवितालयों का निर्माण करके उनमें सार्थक व सकारात्मक कवियों को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए यह कवि,शायर कविता,ग़ज़ल स्वयं कहेंगे व इतना ही नहीं समाज के लोगों को कविता कहने के लिए प्रोत्साहित करेंगे जैसे मानसिक डॉक्टर इलाज करता है उसी प्रकार बिना प्रयोगशाला के मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों का इलाज तो होगा ।
जिस मनुष्य को परिभाषित किया जायेगा वह स्वस्थ हो जाएगा हमें कविता के माध्यम से मनुष्यों को और समाज को परिभाषित करना होगा ।
"*कवितालयों का निर्माण करने की बात बेशक आपको प्रारंभ में अटपटी लगे लेकिन यह वर्तमान समाज की के लिए बेहद जरूरी है*"
*सूबे सिंह सुजान*
*कुरूक्षेत्र हरियाणा*
@यह शोध लेख सर्वाधिकार सुरक्षित है सूबे सिंह सुजान के ब्लॉग पर ।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

एक शेर - मुझे बर्बाद करना है

मुझे बर्बाद करना है तो फिर बर्बाद कर दो ना
मुझे तुम याद आओ, और तुम भी याद कर दो ना ।।

कभी पानी पिलाते हो,कभी तुम घास रखते हो,
तुम्हें प्यारी हैं इतनी बकरियाँ,आजाद कर दो ना ।।

 सूबे सिंह सुजान 

बुधवार, 27 जून 2018

प्रेम तरल

मैं इस तरह तरल होकर प्रेम में गुजरता रहता हूँ कि जैसे
मोटर ने पानी को पाइप में तीव्र गति से मोड़ देते हुए टंकी तक पहुँचा दिया और पानी ने आह तक न की जैसे जैसे धक्का मिला आगे चलता रहा ।

शुक्रवार, 22 जून 2018

ग़ज़ल -ठीक ठाक तो हो

तन्हा से छत पे बैठे हो, ठीक ठाक तो हो ?
क्या बात?खुद से लड़ते हो ठीक ठाक तो हो?

जगजीत सिंह को सुनते हो ,ठीक ठाक तो हो ?
ग़ालिब के शेर पढ़ते हो ठीक ठाक तो हो?

क्यों खुद ही हँसने लगते हो ठीक ठाक तो हो ?
बिन बात रोने लगते हो ठीक ठाक तो हो ?

दुनिया की बातें करना,दुनिया की बातें सुनना,
तुम किससे बात करते हो ठीक ठाक तो हो?

सुजान $μj@n

गुरुवार, 7 जून 2018

मंचीय कविता और साहित्य की दुर्दशा

      कवि सम्मेलन और मुशायरों की दुर्दशा
कविता के बाजारीकरण होने पर चुटकले,अश्लीलता बिकती है यही सत्य है वर्तमान मुशायरों,कवि सम्मेलन के मंचों का ।
                                                                                     लेकिन इस प्रायोजित अश्लीलता के विरोध में अबल तो कोई कुछ चाहकर भी कुछ कह नहीं पाता और यदि कभी कोई दिलेरी से यह बात कह देता है तो नव कवियों की फौज पीछे पड़ जाती है ।मंच पर जहाँ वास्तविक कविता होती है वहाँ से श्रोता गायब होते हैं प्रायोजित करने वाले तो दूर दूर तक दिखाई ही नहीं देते ।
                                 
लेकिन जहाँ पर चुटकले,अश्लीलता होती है वहाँ पर प्रायोजक दौड़ते हुए और श्रोता,दर्शक औंधे मुँह पड़े मिलते हैं ।
महिला कवियत्रीयों के साथ वैसे तो मंचों पर भी यही हाल है कि वो बोल भी नहीं पाती कि उससे पहले वाह वाह की बरसात बिना बात के बादलों की तरह होने लगती है बात या कोई संदेह क्या कहा गया होता है यह कभी किसी को पूछना कवि सम्मेलन के बाद , तो पता चलेगा यार पता नहीं क्या कहा लेकिन  क्या बात है वाह वाह भाई सबसे बढ़िया उसी ने कहा है यह आवाजें सुनाई पड़ती हैं ।
लेकिन फेसबकीय साहित्य व मंचों पर तो महिला कवियत्रीयों को बेशुमार मान सम्मान, वाह वाह , हजारों लाइक व टिप्पणियों से नवाज़ा जाता है ।
मैं इस लेख में यह बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि मैं महिला कवियत्रीयों से ख़ैर खाता हूँ या कोई जलन करता हूँ कृपा करके यह तो मन से निकाल दीजिए ।
मैं किसी महिला का मन भी नहीं दुखाना चाहता हूँ ।
लेकिन मैं अपनी माँ,बहन समान सभी महिला कवियत्रीयों को यह ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि आप मंचों की इस तरह के व्यवहार को ध्यान से परख़ने की कोशिश कीजिए और ऐसे वाक़्यों पर अपनी बेबाक बात कहने से न हिचकें ।
अगर आप अश्लीलता, द्वियअर्थी चुटकलों का मंच पर विरोध करेंगी और सही सभ्य ढंग से इस तरह अपनी बात रखेंगी तो इसमें आपका ज्यादा सम्मान होगा और कविता व साहित्य का सम्मान के साथ साथ भविष्य उज्ज्वल होगा जिससे सार्थक समाज का विकास होगा और हम साहित्य के उद्देश्य को हासिल करने में सक्षम होंगे ।

                             आज के समय में जहाँ बेमकसद ,बेमतलब की कविता भी हो रही है वहीं कविता का राजनीतिक पार्टियों के द्वारा दोहन भी किया जा रहा है हम कवि लोग राजनीतिक पार्टियों के द्वारा प्रायोजित कवि सम्मेलन को समझ नहीं पाते हैं नये रचनाकार तो जब तक कविता को सीख भी नहीं पाते तब तक उन पर राजनीतिक सोच को थोप कर दूषित कर दिया जाता है और वे जीवन भर कविता व साहित्य को ही नहीं समझ पाते और राजनीति पार्टियों के क़ैद होकर रह जाते हैं और समाज को गहरा आघात पहुँचाते हैं ।

हमारे सामने कविता को बचाये रखने के लिए नये नये खतरे हैं इन खतरों से बचाने के लिए पुस्तकीय कविता,साहित्य ही बेहतरीन है और हमें फेसबुक जैसे नये सोशल मीडिया साहित्यिक गतिविधियों के अंदर जाकर साहित्य को सही दिशा देनी होगी ।

         
                       सूबे सिंह सुजान
               साहित्यिक खतरों पर बातचीत
            दिनांक 7जून 2018
                    कुरूक्षेत्र 

मंगलवार, 5 जून 2018

ग़ज़ल के महान सितारा कृष्ण बिहारी नूर साहब की एक उत्कृष्ट ग़ज़ल पेश है

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं 
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं ।

ज़िन्दगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं ।

सच घटे या बढ़े,तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तिहा ही नहीं ।


जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता -पता ही नहीं ।

कैसे अवतार,कैसे पैग़म्बर,
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं ।


अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
'नूर' संसार से गया ही नहीं ।


कृष्ण बिहारी 'नूर'

बुधवार, 23 मई 2018

कविता में शहर (छंदमुक्त कविता)

शहर में कविता हो न हो
लेकिन अभी बचा है कविता में शहर ।

इस गली से लेकर
उस सड़क तक
घरों की नीवों से लेकर छतों तक
गरीब घरों तक जाते
कच्चे रास्तों की खुशबू
संभाले हुए है कविता में शहर ।

यह शहर केवल मेरी कविता में नहीं रहता
यह बहुत से कवियों और यहाँ से दूर,परदेस
में बसे कवियों के साथ विदेशों में भी जीवत रहते
हुए है कविता में शहर ।


कुछ मोड़ों पर अपना नाम सेक्टर रखवा कर
बहुत खुशी से हँसते हुए इठलाने वाला
अगले मोड़ पर दर्द से कहराता हुआ
जब दिखाई देता है और
जब मैं पूछ लेता हूँ उसका हाल चाल
तो मुझे रोते हुए दिखाई देता है कविता में शहर ।

बेटी बचाने के नारों वाले इश्तहारों की चकाचौंध
सरकारी कार्यालयों,इमारतों से लेकर
पक्की सड़कों,चौराहों पर
बेटियों की लुटती इज्जत को अपनी ओट देते हुए
ढक लेते हैं । 
जबकि थे उन्हीं के बेटे,उन्हीं की बेटियाँ
लेकिन पता नहीं क्यों
 लोग फिर से सड़कों पर चिल्लाते हैं शहर को बंद करते हुए ,अपनी ही सम्पत्ति को जलाते हुए, कैंडल मार्च निकालते हुए
और फिर से जिंदा रखते हैं कविता में शहर ।

हर काम करती बेटियों के साथ
भेदभाव करते हुए
और निकम्मे होते बेटों का साथ देते हुए
उन्नति करता है
मजदूरों से काम लेते हुए
और दिहाड़ी में से पैसे कम करवाते हुए
शराब पी लेता है
किसानों से
अनाज लेकर पेट भरते हुए
उनके कर्ज पर कटाक्ष करते हुए
किसानों को गाली देकर
गंदी हंसी हँसता है कविता में शहर ।


         सूबे सिंह सुजान, कुरूक्षेत्र,हरियाणा 

मंगलवार, 20 मार्च 2018

अपनी नादानी पर

अपनी नादानी पे नादान अड़ा रहता है
सिर्फ़ अपनी ही नज़र में वो बड़ा रहता है ।

क्या इरादा है समझ खुद नहीं पाता अक्सर,
इसलिए दूर, अकेला ही खड़ा रहता है ।
   सूबे सिंह सुजान

रविवार, 18 मार्च 2018

ग़ज़ल,कविता को मुकाबला करना होगा बच्चों में बढ़ती नशे,व्यसनों के बढ़ते दुराचारों के साथ । अदबी संगम कुरूक्षेत्र की काव्य गोष्ठी में उपस्थित शायर कवि ।

आज दिनांक 18 मार्च 2018को नवसवंत्सर वर्ष के शुभ अवसर पर अदबी संगम कुरूक्षेत्र की मासिक काव्य गोष्ठी डॉ बृजेश कठिल जी की मेजबानी में और प्रो महेन्द्र पाल माथुर जी की अध्यक्षता में हुई ।

काव्य गोष्ठी में कवियों ने नव वर्ष पर व सामयिक मुद्दों पर रचनाओं का पाठ किया ।
जिनमें सर्वप्रथम करनैल खेड़ी ने कहा ये ग़ज़लें,ये नज़्में मेरा तजुर्बा हैं,ये मैंने कोई सपनों में नहीं देखी ।

डॉ शकुंतला शर्मा ने हरियाणवी गीत में हरियाणवी संस्कृति का कुछ यूँ बयान किया  ध्यान लगा कै सुणियो रै, सै बात या ध्यान लगाणे की ।
देसी खाणा,देसी बाणा  , मैं छोरी सूँ हरियाणे की ।

रत्न चंद सरदाना जी ने वर्तमान व्यस्त व मशीनी जीवन पर तंज कसते हुए एक पिता के दर्द को बयान करते हुए कहा - ख़प गई जवानियाँ बच्चों के नाम पर ।
अँधेरे में चल रहे लाठियों को थाम कर ।।

पंजाबी कवि दीदार सिंह कीरती ने वर्तमान संदर्भों पर अपनी कविता में करारा व्यंग्य कसते हुए कहा - डंगर बहुत आवारा फिरदे,जिधर देखो गाँ ही गाँ,  और सरकारी लोग गाँ नहीं कहते,कहते भाषण विच माँ ही माँ ।

कस्तूरी लाल शाद जी ने कहा -अपनों का ही भरोसा देता रहा है धोखा, सीमा का हर प्रहरी लगता ठगा ठगा है ।

ओम प्रकाश राही जी ने देश भक्ति पर रचना पढ़ते हुए गीत गाया - राही कफ़न तिरंगे वाला,चूम चूम कर गाती माँ ।
अगर और इक बेटा होता वतन पे उसे लुटाती माँ ।

संजय कुमार मित्तल ने कविता में कहा -

हे भारत माँ नमस्ते,नमस्ते नमस्ते
और मैं तुमको क्या दूँ,देने को है ही क्या मेरे पास
स्वीकार करो मेरी नमस्ते नमस्ते नमस्ते ।

उर्दू शायर जनाब शमीम हयात ने ग़ज़ल के खूबसूरत शेर पढ़ते हुए कहा - एक दिन उसको देखा संवरते हुए
जितने चेहरे थे सब आइने हो गए ।

डॉ संजीव अंजुम ने जिंदगी की सादगी और हकीकत पर शेर पढ़ते हुए कहा -

दिल से होकर ज़ीस्त की जागीर में शामिल हुआ
क़िस्सा ए ग़म यूँ मेरी तक़दीर में शामिल हुआ ।

डॉ बृजेश कठिल जी ने अपनी वस्तुस्थिति कविता में एक कर्मचारी के रिटायर्ड होने पर घर बनाने की व्यथा पर ,उसके बुढ़ापे के संघर्ष की कहानी को कविता में पिरोते हुए कहा -

साठ बरस की उम्र में घर बनाना,
दुस्साहस तो है , मगर उसने बनाया ।

अपनी नई ग़ज़ल में सूबे सिंह सुजान ने कहा -

उनके कहने से जो हर बात सही होती है
तो मैं ये समझूँ के सब उनकी कही होती है

हम जिसे जाँच परख़ देख रहे होते हैं
बाद उसके भी परख़ बाक़ी रही होती है ।

इसके अलावा अन्य शायर,कवियों में डॉ श्रेणिक लुंकड़ बिम्बसार, गंगा मलिक ने भी काव्य पाठ किया ।




शुक्रवार, 16 मार्च 2018

आओ बदलें मुशायरों से माहौल व समाज को दें सही दिशा

हमारे अभी कुछ पुराने समय में , ज्यादा दिनों की बात नहीं है हमारे शहरों कुरूक्षेत्र,अम्बाला,पानीपत हिसार और उधर पंजाब के साथ साथ पूरे देश में भी बहुत ऐसे शहर रहे हैं जहाँ साहित्य क्षेत्र में बहुत नामी काम होता रहा था
इन शहरों की  जमीन ने बहुत अच्छे शायर,लेखक,कलाकार,गायक दिये हैं ।
क्या हमें नहीं लगता कि इन शहरों ,देश में पुनः साहित्यिक गतिविधियों का परचम लहराये व समाज को विचारक बनाया जाए न कि वाजिब बात पर भी मखौल किया जाए ।

वरना आजकल के दौर में कवि सम्मेलन में बाज़ लोग चुटकले सुनाकर शायर कहलाते हैं और मोटी रकम ले उड़ते हैं वे गिरोह के रूप में काम करते हैं जबकि हमारे शुद्ध साहित्यिक लोग पाई पाई को तरसते रहते हैं ।

तो आइये आगे बढ़कर बनाइये अच्छा माहौल ।
बच्चों को नशे के बढ़ते कारोबार से बचाकर कविता,ग़ज़ल,कहानियों की तरफ ले चलें ।

इधर कुरूक्षेत्र में अदबी संगम कुरूक्षेत्र पिछले 40 बरसों से साहित्यिक गतिविधियों में काम करता आ रहा है अनेकों शायर,कवि लेखक,कलाकार इस माहौल ने पैदा किए अदबी संगम समाज की चहल पहल से,चकाचौंध से दूर रहकर अपनी हाथी की मदमस्त चाल से चलता रहा न किसी सरकारी मदद का मोहताज रहा न कभी किसी सरकारी अधिकारी, अकादमी ने वाजिब मदद दी बस कवि लोग स्वयं का खर्च करते रहे और साहित्य को रचते रहे,लगातार संगोष्ठी करते रहे ।
 इस संस्था की जड़ों को रोपने व वृक्ष बनाकर फलों तक लाने की फेहरिस्त में कुछ चुनिंदा नाम ध्यान में आते हैं जैसे कृष्ण चंद्र पागल, दोस्त भारद्वाज,डॉ एस पी शर्मा "तफ़्ता " "ज़ारी " डॉ हिम्मत सिंह सिन्हा "नाज़िम " डॉ के के ऋषि, डॉ दिनेश दधीचि, बाल कृष्ण बेज़ार, कस्तूरी लाल शाद,डॉ बृजेश कठिल , डॉ लुंकड़,आदि अनेकों नाम हैं

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

होली में हुडदंग किसी को करे तंग, किसी को करें रंग रंगीन।

होली खेलने के सबके अपने अपने मज़े हैं  यह मौसम परिवर्तन का र्योंहार है हम मौसम के परिवर्तन को प्रकट करने, आत्मसात करने के लिये हर अवसर पर त्योंहार के रूप में मनाते आये हैं यही संस्कृति का निर्माण करते हैं हमारी भारतीय संस्कृति इन्हीं त्योंहारों की परिपाटी रही है ।

                                                                                   लेकिन वर्तमान समय में होली खेतने से बहुत लोगों को डर भी लगने लगा है ऐसा क्यों हो रहा है यह हमें सोचने को विवश करता है और यदि हम मनुष्य हैं तो हमें सोचना भी चाहिये, वर्तमान समय में परेशानी का सबब यह होता जा रहा है कि हमने सोचना ही बंद कर दिया है यह सबसे खतरनाक़ है ।

                                              ताजा घटना दिल्ली में लड़कियों पर होली के बहाने वीर्य के गुब्बारे फेंकना किस सोच को दर्शाता है औकर क्या ये लड़के हमारे उन्हीं घरों के नहीं हैं , जिन घरों की वे लड़कियां हैं क्या इन लड़कों की बहनें नहीं हैं, क्या इन लड़कों के माता पिता नहीं हैं क्या ये लड़कियां जो शिकायत कर रहीं हैं ये अपने भाइयों को टोकती हैं ऐसी वारदातों के समय,  बहुत से और भी प्रश्न हैं जिनके जवाब हमें स्वयं से पूछने हैं और बार बार पूछने चाहियें ।

दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमारे समाज की सोच में लड़कियों में हो या पुरूषों में अमीर की सोच अलग व गरीब की सोच अलग हो जाती है दिल्ली की बहुतायत लड़कियों को मैट्रो में देखता हूँ कि वे सामाजिक मुद्दों पर विरोध करने वाली लड़कियों का बहुत कम साथ देती हैं  क्योंकि वे सोचती हैं की यह विरोध करना,सामाजिक मुद्दों पर बात करना मिडिल क्लास का काम है। उनकी जिंदगी में ऐसे मुद्दों को सहजता से अपना लिया जाता है और विरोध करने वालों को मिडिल क्लास का दर्जा देकर उन्हें ही नीचा दिखाया जाता है अमीरों द्वारा जिस कारण जिन मुद्दों पर सार्थक बातचीत होनी चाहिये वह हो नहीं पाती ।हमें समाज को एक सोच का बनाना होगा। सबसे पहले शिक्षा को एक करना होगा हर वर्ग के बच्चों हर प्रकार के स्कूलों में प्रवेश देना होगा महंगी शिक्षा का समूल निपटान जरूरी है।
                                                                                      सूबे सिंह सुजान

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

लघुकथा (बुरा व्यक्ति )

लघुकथा       ( बुरा व्यक्ति) 




कपिल आज स्कूल के बहुत से कामों में व्यस्त था लगभग हर काम को पूरा करने की हमेशा कोशिश करता आया है ।
स्कूल में स्टाफ की कोई कमी नहीं थी लेकिन हैड मैडम को जो काम जरूरी करना होता था वह समय पर काम को भूल जाती तो भी कपिल बिना कहे कर देता था ।
कपिल की यह आदतें इतनी बुरी भी हो सकती हैं उसने सोचा नहीं था ।

एक दिन स्टाफ सदस्यों में से एक मैडम ने बिना वजह उसको बुरा कहना शुरू कर दिया तो स्टाफ के सभी सदस्य कुछ न बोले और इसे उसका निजि मामला बताने लगे वह सबसे गुहार लगा रहा था कि आप सब एक परिवार के सदस्य हैं मेरी गलती हो तो बताओ ।
लेकिन सब अपने यह निजी मामला बताने लगे कपिल यह सोचकर पागल हो रहा था कि उसका कसूर क्या है उसे समझ नहीं आ रहा था एक दिन उसे स्कूल का काम करते हुए रजिस्ट्रर रिकार्ड में पेज चिपकाये पाये जिनमें उस मैडम के पति की कमियों का जिक्र था जो रेजुलेशन कपिल ने डाला था तब उसकी समझ में आया कि यह मुझे बुरा क्यों कहा जा रहा था ।
हमारे समाज के जागरूक शिक्षकगण चुप थे । वह अकेला स्वयं को साफ करने की लड़ाई लड़ रहा था । वे उसकी बातें बना बनाकर मजे ले रहे थे ।



सूबे सिंह सुजान,कुरूक्षेत्र,हरियाणा 

मोबाइल : 9416334841


काफिया,रदीफ पर बहुत कम शब्दों में जानकारी

कविता लिखने वाले नव कवियों को प्रारंभिक स्तर पर ध्यान देने योग्य बहुत थोड़ी सी बातें ।


कविता को पहले पहल तो अपने वैचारिक स्तर पर ठीक होना ही चाहिए ।बस थोड़ा बार बार दूसरों को पुराने,नये अच्छे कवियों को पढ़ें । कविता की गतिशीलता,लयात्मकता को आत्मसात करें ।

तुक या काफिया क्या है यह थोड़ा समझना चाहिए ।

जैसे पंक्तियों के अंत में हम जो लय मिलाते हैं 

आघात ।
बाप ।।
?
यह सही नहीं है 

आघात के साथ 
बात,रात,बरसात सही हो सकते हैं ।

उर्दू में हम काफिया कहते हैं जिसमें लय को निर्धारित किया जाता है और जो लयात्मक शब्द के पीछे शब्द होते हैं उन्हें रदीफ कहते हैं अर्थात जो काफिया के पीछे बार बार प्रयोग होते हैं ।
जैसे -..

मेरा शेर है 

मौसम बहुत खराब है थोड़ा संभल के चल 
चेहरा तेरा गुलाब है थोड़ा संभल के चल ।
खबरें बहुत बुरी बुरी पढ़ने में आ रही 
दुनिया हुई खराब है थोड़ा संभल के चल ।

यहाँ खराब,गुलाब,खराब निम्न शब्द काफिया हैं जो लय निर्धारित करते हैं ।
इनके पीछे के शब्द जो पुर्ावृति करते हैं "है थोड़ा संभल के चल "

यह रदीफ कहलाती है ।

खैर फिलहाल इतना सीखो,अभ्यास करो 
फिर और बताऊंगा।

सूबे सिंह सुजान

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018



कुरूक्षेत्र :- अदबी संगम कुरूक्षेत्र व सार्थक साहित्य मंच कुरूक्षेत्र का सांझा कवि सम्मेलन आज प्रेरणा वृद्ध आश्रम,आकाश नगर,सलारपुर रोड ,कुरूक्षेत्र में श्री सी आर मौद्गिल की अध्यक्षता में हुई ।


आज के कवि सम्मेलन में शशि किरण जी दिल्ली से मुख्य अतिथि रही । शहर के व्यापारी और समाजसेवी श्री जय भगवान सिंगला जी ने सभी का स्वागत किया । कार्यक्रम का संचालन शायर शमीम हयात जी ने किया ।


सर्व प्रथम श्री रत्न चंद सरदाना जी की काव्य पुस्तक "मस्त मस्त हरियाणा " का विमोचन किया गया ।


कवि सम्मेलन में कविता पाठ करने वाले कवियों में गायत्री कौशल आर्य, शकुंतला शर्मा , डॉ बृजेश कठिल, अन्नपूर्णा,डॉ बलवान सिंह , सुधीर ढांढा , करनैल खेड़ी , दीदार सिंह कीरती, आर के शर्मा, कस्तूरी लाल शाद, ममता सूद, जय भगवान सिंगला, सूबे सिंह सुजान, गुलशन ग्रोवर , जीवन बख़्शी, कविता रोहिला, रत्न चंद सरदाना, शमीम हयात , ओम प्रकाश राही, डॉ सी डी एस कौशल, डॉ रोहताश गुप्ता, रेणु खूगर, राजकुमार सैनी ,मोती राम तुर्क, संजय मित्तल,गंगा मलिक, मीना कोहली,इन्दु थापर, सभी ने अपनी बेहतरीन कविता को सुनाया ।


इसके बाद केशव मेहता की टेली फिल्म "यादें 1947" का पर्दशन किया गया सबको दिखाई गई जिसका उद्घाटन बटन दबा कर जिला उपायुक्त सुश्री सुमेधा कटारिया जी ने किया ।

जिसमें भारत विभाजन की रक्तरंजित यादें दर्शायी गई हैं ।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

लौटना

                                  लौटना  
लौटना तो होगा ही
घर से , दफ़्तर
दफ़्तर से घर,
जिंदगी का सफर.........
लौटना तो होगा ही..

तुम नहीं भी लौटना चाहो
लेकिन लौटना तो होगा ही।

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

महँगाई का रोना छोड़ दें ।

जिन लोगों के पास कार है और रोज पैट्रोल के लिये पैसे हैं , जो लोग चार महीनों में मोबाइल बदल लेते हैं , जो लोग महँगे से महँगा सोने का आभूषण खरीदते हुये थोड़ा सा भी घबराते नहीं,  वे लोग अनाज, सब्जियों , दालों के रेट पर रोते देखे जाते हैं ।

                                            देश के लिये , देश की जनता के लिये  महँगाई पर रोना छो़ड़ दें ।
क्योंकि जो व्यक्ति आपको जीवन जीने का पहला संसाधन , रोटी, कपड़ा , मकान देता  है आप सबसे कम कीमत उसको दे रहे हैं  अपने अंदर झाँक कर देखिये सच से आँखें मिला कर देखिये।

शनिवार, 27 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि सम्मेलन व तफ्ता जारी की पुस्तक दर्द का रिश्ता व अदबी संगम कुरूक्षेत्र की पुस्तक काव्यांजलि का विमोचन हुआ।

जिला प्रशासन कुरुक्षेत्र द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पंचायत भवन कुरुक्षेत्र में कवि सम्मेलन मुशायरा का आयोजन किया गया जिसका विधिवत से उद्घाटन कुरुक्षेत्र उपायुक्त सुश्री सुमेधा कटारिया जी ने किया । कवि सम्मेलन का संचालन कैथल से पधारे डॉ प्रदुमन भल्ला ने किया ।
मुख्य अतिथि सुश्री सुमेधा कटारिया जी रही और विशिष्ट अतिथि के रूप में सी. टी. एम. श्री कंवर सिंह जी और डी.डी.पी. ओ. श्री कपिल शर्मा जी रहे।
अन्य कवियों में दिनेश बंसल पूंडरी से ,गुलशन ग्रोवर अदबी संगम के उपप्रधान,डॉक्टर संजीव अंजुम सचिव अदबी संगम कुरूक्षेत्र,सूबे सिंह सुजान ,कोषाध्यक्ष अदबी संगम कुरूक्षेत्र , गायत्री कौशल ,डॉ बलवान सिंह ,सुधीर डांडा ,ममता सूद ,कविता रोहिल्ला डॉक्टर शकुंतला शर्मा, डॉक्टर के के ऋषि, ओमप्रकाश राही ,दीदार सिंह कीर्ति, मोतीराम तुर्क,डॉ राकेश भास्कर , योगेशवर जोशी,सुधीर, बी एल अरोड़ा,आर के शर्मा,करनैल खेड़ी आदि कवियों ने अपनी देशभक्ति से परिपूर्ण रचनाएं पढ़ी । डॉ के के ऋषि ने अपनी उर्दू ग़ज़लों से सबका मन मोह लिया ।उसके बाद उन्होंने डॉ सत्य प्रकाश तफ़्ता ज़ारी की ग़ज़ल पढ़ी क्योंकि तफ़्ता ज़ारी जी की हालत बहुत नाजुक होने के कारण उनकी नयी पुस्तक से उनकी ग़ज़ल डॉ के के ऋषि ने पढ़ी ।
डॉ बलवान सिंह ने देशभक्ति कविता सुनाकर व सुजान ने देशभक्ति गीत सुनाकर,संजीव अंजुम ने ग़ज़ल,गायत्री कौशल आर्य ने कविता से सबको तालियाँ बजाने पर मजबूर किया ।

इसके साथ ही इस अवसर पर सुश्री सुमेधा कटारिया के कर कमलों से डॉ सत्य प्रकाश तफ़्ता ज़ारी का गजल संग्रह "दर्द का रिश्ता"का व अदबी संगम कुरूक्षेत्र का पांचवा सांझा काव्य संग्रह "काव्यांजलि" का विमोचन सुश्री सुमेधा कटारिया जी के कर कमलों से हुआ ।
जिसमें अदबी संगम कुरूक्षेत्र के रचनाकारों, कवियों की प्रतिनिधि रचनाएं शामिल हैं इस अवसर पर सुश्री सुमेधा कटारिया जी ने सभी कवियों को सम्मानित किया और धन्यवाद करते हुए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया उन्होंने कहा कि फेसबुक,सोशल मीडिया के समय में हमारी पुस्तक संस्कृति पर गहरा असर पड़ा है हमें कोशिश करनी होगी कि इस दौर में पुस्तक संस्कृति बनी रहे ,बच्चों से पुस्तकें दूर ना हटे पुस्तकें हमारी सबसे बड़ा मित्र होती हैं ।


शनिवार, 13 जनवरी 2018

परिचय

    परिचय
 हम परिचित व अपरिचित को
बिना मांगे ही बेहद झूठा
अपना परिचय देते हैं

यह जानते हुए भी कि सामने वाले को पता है कि तू झूठा कह रहा है ।
फिर भी हम बढ़ चढ़ा कर अपन परिचय देने में लगे रहते हैं

सबको,सबका,सब पता है ।
फिर भी .....

सूबे सिंह सुजान 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

लोग सारे जमा हो गये
इसलिये हादसा हो गये
सच यहाँ बोलते बोलते
लोग मुझसे खफ़ा हो गये  

SUBE SINGH SUJAN

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

जबसे रहता हूँ मैं सयानों में ग़ज़ल



ग़ज़ल
जबसे रहता हूँ मैं सयानों में
दर्द होने लगा है कानों में

आँख वालों ने देखना था ये
अंधे राजा हुए हैं कानों में

सारे शब्दों ने अर्थ बदले हैं
क्या भरें आज रिक्त स्थानों में

अब तो दिन रात गर्मी लगती है
आ गये हम नये मक़ानों में

सारी सड़कें भरी भरी रहती
कौन रहता है आशियानों में

आइये आँख खोल लेते हैं
हुस्न देखा कंई जमानों में

खूब क़ानून की समझ आयी
लोग हर रोज जाएं थानों में

वक्त रहते नहीं समझ पाते
ऐसी बीमारी है जवानों में

बेवफ़ा से वफ़ा की है उम्मीद
रहते हो आप किन जमानों में

दर्द सारा उड़ेल देता हूँ
आपके सामने,तरानों में

चल चलें, अब यहाँ से चलते हैं
दम घुटा जाए कारखानों में ।

ऐ परिन्दों जरा तुम्हीं झुकना
आदमी भी है आसमानों में ।

सूबे सिंह सुजान

बेज़ार साहब का शेर

जानता हूँ मैं तैरना,फिर भी ,
तेरी आँखों में डूब जाता हूँ ।
बाल कृष्ण बेज़ार

कुरूक्षेत्र के मशहूर उर्दू शायर श्री बाल कृष्ण बेज़ार साहब 9सितम्बर को दुनिया छोड़ गये


कुरूक्षेत्र :- कुरूक्षेत्र में उर्दू अदब की पैंतीस साल पुरानी संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक व वर्तमान में अदबी संगम कुरूक्षेत्र के प्रधान श्री बाल कृष्ण बेज़ार साहब हमारे बीच नहीं रहे ।
बाल कृष्ण बेज़ार साहब पिछले कुछ दिनों से कैंसर से पीड़ित थे लेकिन उन्होंने कभी साहित्य के प्रति अपनी इच्छाशक्ति कम नहीं होने दी उनको आठ मार्च को ही कैंसर का पता चला तो उसके बाद भी पी जी आई चंडीगढ़ में इलाज करवाते वक्त भी वे अप्रैल में पंचकूला हरियाणा साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में पहुँचे और उसके बाद जब हालत बेहद नाजुक हो गई तो हमसे कहने लगे कि मेरा वक्त आ गया है मेरे लिए आखिरी कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाए जिसे अदबी संगम कुरूक्षेत्र ने "जश्ने बेज़ार " के नाम से मई में पंचायत भवन कुरूक्षेत्र में आयोजित किया गया जिसमें दूर दराज के शायरों ने भी भाग लिया वे ताउम्र साहित्य सेवा में तत्लीन रहे बेलौस,बेलाग ज़हनीयत के मालिक व शायरी में हाजिर जवाबी , भारत ही नहीं पाकिस्तान तक के शायरों के  हज़ारों शेरों को याद रखने वाले व मंच संचालन में माहिर तथा बेखौफ व्यक्तित्व के धनी आदरणीय बाल कृष्ण बेज़ार साहब का जन्म 20.04.1941को अमीन गाँव में हुआ था और वे 76 वर्ष की आयु में कल हमारे बीच से विदा हो गये ।
उनका शेर है - "ठोकरें उसने ही खाई हैं जमाने भर की,
एक वो शख़्स जो दुनिया का भला करता था "

अदबी संगम कुरूक्षेत्र की कार्यकारिणी उनके परिवार को श्रद्धांजलि भेंट करता है और उनकी आत्मा की शांति के लिए परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता है ।

अदबी संगम कुरूक्षेत्र 
: कुरूक्षेत्र की सबसे पुरानी साहित्य संस्था अदबी संगम कुरूक्षेत्र के प्रधान श्री बाल कृष्ण बेज़ार हमारे बीच नहीं रहे ।
कुरूक्षेत्र :- कुरूक्षेत्र में उर्दू अदब की पैंतीस साल पुरानी संस्था के
संस्थापक सदस्यों में से एक व वर्तमान में अदबी संगम कुरूक्षेत्र के प्रधान
श्री बाल कृष्ण बेज़ार साहब हमारे बीच नहीं रहे ।
बाल कृष्ण बेज़ार साहब पिछले कुछ दिनों से कैंसर से पीड़ित थे लेकिन उन्होंने
कभी साहित्य के प्रति अपनी इच्छाशक्ति कम नहीं होने दी उनको आठ मार्च को ही
कैंसर का पता चला तो उसके बाद भी पी जी आई चंडीगढ़ में इलाज करवाते वक्त भी वे
अप्रैल में पंचकूला हरियाणा साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में पहुँचे और उसके
बाद जब हालत बेहद नाजुक हो गई तो हमसे कहने लगे कि मेरा वक्त आ गया है मेरे
लिए आखिरी कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाए जिसे अदबी संगम कुरूक्षेत्र ने
"जश्ने बेज़ार " के नाम से मई में पंचायत भवन कुरूक्षेत्र में आयोजित किया गया
जिसमें दूर दराज के शायरों ने भी भाग लिया वे ताउम्र साहित्य सेवा में तत्लीन
रहे बेलौस,बेलाग ज़हनीयत के मालिक व शायरी में हाजिर जवाबी , भारत ही नहीं
पाकिस्तान तक के शायरों के  हज़ारों शेरों को याद रखने वाले व मंच संचालन में
माहिर तथा बेखौफ व्यक्तित्व के धनी आदरणीय बाल कृष्ण बेज़ार साहब का जन्म
20.04.1941को अमीन गाँव में हुआ था और वे 76 वर्ष की आयु में कल हमारे बीच से
विदा हो गये ।
उनका

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

आलेख - नाम की भूख

नाम की भूख
   यूँ तो हर व्यक्ति में नाम की भूख होती है लेकिन कुछ अपरिपक्व साहित्यकारों में यह भूख चरम सीमा पर मिलती है पिछले दिनों का किस्सा यूँ घटित हुआ कि कवि सम्मेलन में शामिल कवि जब देश भक्ति पर अपनी वही पुरानी घिसीपिटी या कहिए किसी किसी की पंक्तियों को जोड़कर देश भक्ति कविता कहने लगे तो सुनने वालों को आयोजन तो बहुत अच्छा लगा लेकिन कविताएँ ज़ज्बा नहीं जगा पा रही थी श्रोताओं को मज़ा नहीं आ रहा था तो कवि चिल्ला चिल्ला कर तालियाँ माँग रहे थे और श्रोता कंजूसी करते जा रहे थे ।

खैर इसी कवियों और श्रोताओं की कमकस में कवि सम्मेलन पूर्ण हुआ तो एक पागल कवि ने जिम्मेदारी न होते हुए जब कोई जिम्मेदार अपना काम नहीं कर पा रहा था काफी समय से तो उसने कवि सम्मेलन की रिपोर्ट समाचार पत्र में जारी करने के लिए लिखने लगा
एक तो कवि सम्मेलन निर्धारित समय से देर से समाप्त हो रहा था दूसरा समाचार पत्रों में समाचार लिखने का समय लगभग जा रहा था तो उस पागल ने कवियों के नाम लिखते लिखते एक महान कवि का नाम न लिखने की भूल करते हुए विज्ञप्ति लिख डाली और अपने नाम का क्लेश कर डाला । जब समाचार पत्रों में समाचार आया तो महान कवि को बहुत गुस्सा आया और गुस्से का इजहार बहुत नाटकीय ढंग से जाहिर किया जो क़ाबिले गौर है उन्होंने सभी को कहा कि समाचार बनाने वाले ने साहित्य की बेइज्जती की है अर्थात उनका नाम न आने से साहित्य की बेइज्जती हो गई यदि उनका नाम आ गया होता तो वे फिर कुछ न देखते हुए पागल कवि को महान कहते हुए साहित्य का पुरोधा की उपाधि दे देते ।
साहित्यकारों में नाम की भूख चरम सीमा पर मिलती है इस वाक्या से पता चलता है कि सब भूखों में सबसे बड़ी भूख नाम की भूख है । 

शेर - जो पीछे से वार करता है

जो भी पीछे से वार करता है।
दुश्मनी बेशुमार करता है।।।

जिसकी अपनी नहीं कोई इज्जत,
औरों की तार-तार करता है।।  सुजान

बुधवार, 2 अगस्त 2017

एक शेर

वो मुझे पागल कहेंगें और खुश हो जाएंगें
और हम पागल बनेंगें और खुश हो जाएंगें

कोशिशें मैं भी करूँगा खुद बदलने की मगर
लोग कम से कम हंसेंगें और खुश हो जाएंगें

उनके खातिर मसख़रा बनकर गली में जाउंगा
फिर मुझे बच्चे पढ़ेंगें और खुश हो जाएंगें



सुजान

शेर

हम समझ जायें जहाँ को, ये जरूरी तो नहीं
आज तक हम पास बैठों को समझ पाये नहीं ।

सुजान

रविवार, 30 जुलाई 2017

कविता -बेटे की चाह

वो लडकियों से नफ़रत तो नहीं करते

लेकिन बेटे से प्यार तो करते हैं

वो ऐसे माँ-बाप हैं, जो

अपनी शादी के लिये

तो सुन्दर लडकी की तलाश में निकलते हैं

लेकिन अपने घर में लडकी नहीं देख सकते

बेटे की चाह में वे….

तांत्रिकों तक जा पहुंचते हैं

और अपनी बुद्दि को ठेके पर दे देते हैं

और फिर शुरू करते हैं

दूसरों के बेटों का क़त्लेआम

और फिर भी बेटा नहीं पाते

लेकिन जब कोई दिखने में बेवकूफ

और सच में सही तांत्रिक मिलता है

जो उनकी रग को पहचान कर

करता है डाक्टरी इलाज……..,…………

और उस पुरूष को पहचान कर

उसकी स्त्री से करता है सम्बन्ध

और कर देता है उसे गर्भवती

मिलता है उनको पुत्ररत्न

वे खुश हो जाते हैं

तांत्रिक की विधा पर

न्योछवर करते हैं और भी बहुत कुछ

लेकिन वो स्त्री जानती है

कि कैसे प्राप्त हुआ है पुत्र

और पहचानती है पुरूष की मानसिकता को

नहीं बोलती कभी भी बडा सच

कैसा उबड-खाबड और समुद्र सा है

उसका सीना…..

कौन जाने क्या –क्या होता है

उसके सीने के पार भी…………….

…….सूबे सिंह सुजान…..

एक शेर

क्या खूब ये अँधेरे उजालों से कह गये
हम बिन तुम्हारी बोलिए इज्जत कहाँ कहाँ?


सुजान

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

ग़ज़ल

क्या आपके दिल में है,बता क्यों नहीं देते ?
पर्दे को निगाहों से उठा क्यों नहीं देते ?

यह  किसलिये अहसान के नीचे है दबाया?
मुझको मेरी कमियों की सज़ा क्यों नहीं देते ?

कुछ गलतियाँ करवाती हैं मज़बूरियाँ सबसे
तुम तो  हो बड़े गलती भुला क्यों नहीं देते?

हालाँकि सराबोर मुहब्बत से हूँ लेकिन
मौसम ये बहारों के मज़ा क्यों नहीं देते?
यह कौन भला  शख्स मेरे पीछे पड़ा है
सब पूछते हैं मुझसे,बता क्यों नहीं देते ?

जिस शख़्स को आँखों में मुहब्बत से छुपाया
उस शख्स को दुनिया से मिला क्यों नहीं देते ?

यह  दर्द महब्बत का मुहब्बत के लिए है
इस दर्द को तुम और बढ़ा क्यों नहीं देते ?

ए सुजान कभी सामने रोना न किसी के
सीने में हुआ जख़्म दिखा क्यों नहीं देते ?

    सूबे सिंह "सुजान",कुरूक्षेत्र   हरियाणा

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

Teachers transfer after physiologic

जो अंतर जिला स्थानांतरण हुए हैं यह होने से पहले कुछ शिक्षकों की समस्या थी और लगातार संघ पर दबाव बनाया जा रहा था लेकिन आज यह होने के बाद पता चलता है कि यह तो शिक्षा के व क्षेत्र विशेष के हक़ों पर जबर्दस्ती रूप से आधिपत्य हो गया । मैं अपने निजी विचार से नई अंतर जिला जे बी टी स्थानांतरण को उपयुक्त नहीं मानता यह शिक्षा के लिए नुकसानदायक भी रहेगा ।
लेकिन जो अन्य जिलों के शिक्षक यह सोच रहे हैं कि वे स्कूलों में कम आयेंगें  
वे गलतफहमी में हैं । अब शिक्षक समाज सरकार के सकारात्मक बदलाव को अपना रहा है और जो स्थानीय शिक्षक उनके साथ स्कूलों में हैं मेरा उनसे अनुरोध है कि वे उन्हें स्कूल एडजेस्ट,फरलो  जैसी सुविधा बिल्कुल न दें । यह सबसे ज्यादा आपके,शिक्षा,बच्चों के लिए अच्छा रहेगा । पुरानी मानसिकता को बदलना जरूरी है वरना नुकसान में रहेंगे ।

    सूबे सिंह सुजान

शनिवार, 18 जुलाई 2015

शनिवार, 24 जनवरी 2015

kitta

शायद ये खासियत हो, जिया हूँ कमी के साथ
वो पढ रहें मुझको बडी सादगी के साथ।
ऐसा नहीं है सिर्फ़ खुदा आदमी के साथ
ये जानवर,जमीन खुदा है सभी के साथ।
######‪#‎सूबे‬ सिंह सुजान ######

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

बिछडा हुआ साल

फिर से तारीखें लौट जायेंगी

दर्द दीवारों में दरार हुआ

घर हमारा नहीं,घरों जैसा

इक कबूतर अभी फ़रार हुआ

नई कहानी- कछुआ व खरगोश की दौड।

सोच में सकरात्मक बदलाव के लिये आप नई कहानी को प्रयोग करके देखें, ख़ास तौर पर छोटे बच्चों पर विशेष प्रभाव होगा।।—कथा--   एक बार कछुआ और खरगोश की दौड होती है।पहली बार दौड में कछुआ धीरे धीरे चलता है अपनी चाल से तो खरगोश सोचता है कि मैं आराम से जीत जाऊँगा,कछुआ बहुत देर से आएगा तब तक मैं सो लेता हूँ । और कछुआ धीरे-धीरे चलकर दौड के निर्धारित स्थान पर पहुंच जाता है और खरगोश हार जाता है। लेकिन कछुआ कहता है कि नहीं यह तो मेरे साथ धोखा हुआ है मैं सो गया था वरना कछुआ तो मुझसे कभी जीत ही नहीं सकता। मुझे एक मौका और दिया जाए। कछुआ तैयार हो जाता है और फिर से दौड होती है इस बार खरगोश जीत जाता है कछुआ हार जाता है, तो इस बार कछुआ कहता है नहीं –नहीं मेरे साथ धोखा हुआ है दौड दुबारा से होनी चाहिये, और इस तरह फिर से दौड होती है और कछुआ दौड के स्थान में बदलाव करने को कहता है जो मान लिया जाता है। दौड शुरू होती है तो रास्ते में नदी आती है जिसे कछुआ तैर कर पार कर लेता है लेकिन खरगोश नहीं कर पाता तो खरगोश  हार जाता है। इस बार  खरगोश फिर से कहता है नहीं-नहीं मेरे साथ धोखा हुआ है दौड दुबारा की जाये।

                 और इस तरह फिर से तीसरी बार दौड होती है लेकिन इस बार बडी अजीब घटना होती है जब नदी आती है और खरगोश पानी में नहीं तैर पाता तो मायूस हो जाता है उसे मायूस देखकर कछुआ कहता है आओ खरगोश भाई मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं आपको नदी पार करवाता हूँ और खरगोश उसकी पीठ पर बैठ जाता है और दोनों नदी पार कर लेते हैं नदी पार करके जब खरगोश दौडने लगा तो कछुआ मायूस हो जाता है तो उसकी मायूसी पर खरगोश कहता है आ मेरे प्यारे मित्र मेरी पीठ पर बैठ जा और दोनों एक साथ दौड जीत लेते हैं  इस बार उन्होने एक नई बात सीखी कि हम तो दोनों के काम आ सकते हैं अर्थात जो काम खरगोश को नहीं आता वो कछुआ कर लेता है और जो काम कछुवे को नहीं आता वो खरगोश कर लेता है इस तरह हम आपस में अपने सारे काम ठीक प्रकार से कर सकते हैं।  और उन्होने कसम खाई कि वे अब कभी भी हार जीत की दौड नहीं खेलेंगे बल्कि एक दूसरे के काम आने वाली दौड ही खेलेंगे।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

अपने शोलों ने जलाया हमको,

………तरही ग़ज़ल…………..

बूढा ही कहता है बेटा हमको

बेटी ही कहती है पापा हमको

मत उछलने दो बडों की इज्जत 

ठीक समझाती है बुढिया हमको

वक़्त ने आज बताया हमको

बेवफ़ाओं ने सताया हमको

जिसने भी प्यार से देखा हमको 

एक दिन उसने ही लूटा हमको

एक उम्मीद हमारी भी थी 

आई लव यू कोई कहता हमको

हम समन्दर में चले जायेंगे

मिल गया है कोई दरिया हमको

आपको हमने महब्बत समझा 

आपने बेवफ़ा समझा हमको 

आग अन्दर की भडकती जाये

“अपने शोलों ने जलाया हमको”

………..सूबे सिंह सुजान…………..

2 1 2 2 1 1 2 2 2 2

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सोमवार, 8 सितंबर 2014

बेमौसमी बादल

अब खतरनाक हो गया बादल
या कहें बेलगाम है पागल

कोई तो इन्द्र को ये समझाये,
कर रहा है किसान को घायल

आसमाँ ने कहा शराबी है,  

मेघ नाचे है बाँध कर पायल 

ओ रे मूर्ख खडी फ़सल को देख,

बालियों में है धूधिया चावल 

गडगडाहट करे, डराये है,

बिजलियाँ हो रही तेरी कायल 

 

मौलिक व अप्रकाशित

बुधवार, 3 सितंबर 2014

हिन्दी गीत

आओ हिन्दी पढें-पढायें हम..

मिलके हिन्दी के गीत गायें हम....

जैसा लिखते हैं वैसा उच्चारण,

इसलिये हिन्दी को करें धारण

विश्व को आओ सच बतायें हम..

मिलके हिन्दी के गीत गायें हम.....

सभ्यता लिप्त हिन्दी भाषा में

एक इतिहास जिसकी गाथा में 

अपनी गाथायें मत भुलायें हम...

आओ हिन्दी पढें-पढायें हम.....

संस्कृत रक्त में समायी है

देव भाषा वही बनायी है

अपने सम्मान को बढायें हम..

आओ हिन्दी पढें पढायें हम....

मौलिक व अप्रकाशित

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

दोहा-

दोहा--

संकल्प सागर जल है, संकल्प आसमान।

जीते जी ना छोडिये, संकल्प है महान ।।

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

लोगों को ईद पर खुशी होगी

चाँद की आँख में नमी होगी

लोगों को ईद पर खुशी होगी

 

चाँद हर रोज देखता है तुम्हें,

आपकी आज बेबसी  होगी

 

जिंदगी रोज खून से लथपथ,

आज कैसे ये जिंदगी होगी

 

गर्दनें काट कर दिखाते हो,

क्या खुशी फिर भी ईद की होगी

 

अन्ध-विश्वास से लडाई है,

अब लडाई ये रोकनी होगी 

 

छोड दो अपना-अपना कहना उसे,

इस तरह खत्म दुश्मनी होगी

 

आज इनसानियत है खतरे में,

क्या वजह है ये सोचनी होगी

 

इस तरफ ओट करके बैठे हो,

इस तरफ कैसे रोशनी होगी

 

छोड दो अपना कहना दुनिया को,

सारी दुनिया फिर आपकी होगी ।

………….सूबे सिंह सुजान………….

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

शनिवार, 14 जून 2014

ग़ज़ल-खिला – खिला सा तेरा चेहरा अच्छा लगता है।

कभी कभी मेरे सीने में दर्द उठता है

किसी की यादों का अहसास जिंदा रहता है।

किसी की याद ग़ज़ल बनके लफ़्ज़ों में ढली है

बसा हो दिल में जो,शायर वही तो कहता है।

मैं आज अपने किसी ख़्वाब को कुचल आया,

कि अब नहीं मुझे वो ख़्वाब तंग करता है।

तुम्हारा ख़्वाब नहीं देखता मरूथलों को,

वो बार बार समन्दर में ही बरसता है।

बहुत दिनों से शिकायत है इस जमाने से,

मेरी खुशी को जमाना कंहा समझता है।

हमेंशा याद रखो जिन्दगी की सच्चाई,

जो फूल खिल गया वो एक दिन बिखरता है।

जो बेसबब तेरे चेहरे पे मुस्कुराहट हो,

खिला –खिला सा तेरा चेहरा अच्छा लगता है।

300140_249701778415678_104664827_n

शुक्रवार, 30 मई 2014

वो कल मुझे मिला था, मुझे इतना याद है….

वो कल मुझे मिला था मुझे इतना याद है।
कुछ इन्तजार था मुझे इतना याद है।।
वो बेखबर सा खोया हुआ देखता रहा,
मुझसे उसे गिला था मुझे इतना याद है।
उसने मुझे तो रोक लिया दोस्तो, मगर,
आगे भी रास्ता था मुझे इतना याद है।
हर बात से मुकर रहा है हमसफर मगर,
छुप-छुप के देखता था मुझे इतना याद है।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

sujankavi: ऊर्दू अ़रूज के शायर प्रोफेसर- सत्य प्रकाश “तफ़्ता”...

sujankavi: ऊर्दू अ़रूज के शायर प्रोफेसर- सत्य प्रकाश “तफ़्ता”...:   प्रोफेसर  सत्य प्रकाश “तफ़्ता” ज़ारी  ऊर्दू अ़रूज़ के, ऊर्दू अदब में जाने माने (हस्ताक्षर) शाइर हैं। वे स्वर्गीय क़िब्ला डा.ओम प्रकाश अग्र...

sujankavi: (लघुकथा)—( डियर)

sujankavi: (लघुकथा)—( डियर): वे दोनों शादीशुदा थे और गवर्न्मेंट सर्विस में काम करते थे उनमें किसी तरह का कोई अफेयर्स जैसा कुछ नहीं था तथा दोनों नये विचारों के थे  औरत खु...

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

(लघुकथा)—( डियर)

वे दोनों शादीशुदा थे और गवर्न्मेंट सर्विस में काम करते थे उनमें किसी तरह का कोई अफेयर्स जैसा कुछ नहीं था तथा दोनों नये विचारों के थे  औरत खुद को ज्यादा खुले विचारों वाली मानती थी। और अन्य पुरूष मित्र से बात करने में परहेज नहीं करती थी इसलिये दोनों फोन पर मैसेज  करके भी कंई बार बात करते थे। और फेसबुक भी यूज करते थे लेकिन आपस में फेसबुक पर मित्र नहीं थे। लेकिन मयूच्वल मित्रों के माध्यम से कंई पोस्ट पढ लेते थे। पुरूष मित्र बहुत ही खुले विचारों का था लेकिन वह कभी किसी से यह नहीं कहता था कि मैं खुले विचारों का हूँ। तथा अक्सर अपने में खोया रहता था हालांकि यह घमण्ड की श्रेणी में नही आता। वह कभी औरतों की बातें ठीक से नहीं समझ पाता था, उसकी अपनीअलग दुनियां थी। एक दिन उसने स्त्री मित्र के किसी अच्छे मैसेज को पढने के बाद धन्यवाद स्वरूप थैन्क्स डियर लिख दिया। तभी पलट के मैसेज आया कि आपको बात करने की तमीज नहीं है। वह सकपका गया और कुछ नहीं कह सका सिर्फ ओह……..।के सिवा।

                                                                                                                                                                                                      

                     उसके बाद उसने मैसेज करने की हिम्मत छोड दी। हालांकि उधर से भी कोई जवाब नहीं आया। लगभग महीने भर बाद उन दोनों के मयूच्वल मित्र की किसी पोस्ट पर सामान्य बात पर पुरूष मित्र ने अपने दार्शनिक अन्दाज में लिखा कि – जो नाम के मीठे होते हैं वे सच में भी मीठे व प्यारे हों ये जरूरी तो नहीं। और उनकी उसी मित्र ने वह पोस्ट पढने के बाद फिर वही गुस्सा जाहिर किया और बीच के मित्र को कहा कि उनसे कहिये कि माफी मांगे। अब वह यह नहीं समझ पाया कि किस बात की माफी, खैर बीच के मित्र के अनुरोध पर वह माने और मैसेज के जरिये माफी की अपील की जो कि खारिज़ कर दी गई पलट के मैसेज आया कि यह माफी नही है क्योंकि यह किसी के कहने पर मांगी गई है। उसने पुनः लिखा कि मैं निपट मूर्ख हूँ दिगभ्रमित हूँ,मुझे ये भी नहीं मालूम कि मैं किन शब्दों का प्रयोग करके माफी मांगू, समझ नहीं पा रहा हूं मेरे शब्दकोश में डियर का अर्थ प्यारा ही था। मैं नहीं समझ सका था कि इसके कुछ अलग-अलग व्यक्ति के लिये अलग-अलग अर्थ होते हैं। कृपया करके मुझे निशब्द होने की इजाजत दें अन्यथा मुझे मेरी सजा बतायें मैं सजा कबूल करता हूँ ।

                                                                                                                                                                                                    लेखक- सूबे सिंह सुजान 

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

पिता जी

DSC00120_mini

पिता जी जब बूढे हुये तो चोट मिली और अंतिम सात महीने चोट ने दुख दिया और फिर चल बसे।

मुस्कुराहट सकारात्मक शक्ति है।

जीवन में मुस्कुराहट बहुत जरूरी है। मुस्कुराते हुये को देखकर ,सब अनायास ही मुस्कुरा देते हैं। मानव अपनी सब परेशानियों से बचना चाहता है जब कोई परेशान हो और समस्या का हल न मिल रहा हो तो सामने उस समय कोई मुस्कुरा भर दे तो उसकी चिंता गायब हो जाती है। और सारा तनाव रफूचक्कर हो जाता है। इसलिये मनुष्य को मुस्कराते रहना चाहिये। मुस्कुराहट गमों का इलाज तो है ही साथ ही रोगों से दूर भी रखती है। लेकिन मुस्कुराहट को पाने के लिये हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखना पडता है। सोच में सकारात्मकता ही हमें चिंताओं से दूर रखती है। यदि उच्च विचारों के सानिंदय में रहेंगे तो हमें सकारात्मकता की प्रेरणा मिलती है।सदैव से ऋषियों मुनियों ने सत्य का साथ देने,सद्गुरूओं के साथ आचार-विचार करने की शिक्षा दी है। इसलिये मुस्कुराहट एक सकारात्मक शक्ति है जो मनुष्य को जीवन जीने की शक्ति प्रदान करती है।और कठिनाईयों को कम करती है।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

जब राजनीति हाथ पसारे दिखाई दे…

जब राजनीति हाथ पसारे दिखाई दे।

जब अपना भी किनारे-किनारे दिखाई दे।।

उस वक़्त राजनीति में नेता को छान लो,

बेदाग,साफ जो हो उसे नेता मान लो ।।