दो गहरे मित्र होते हैं उनमें अनेक काम एक दूसरे के अपने कार्यक्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में और अन्य व्यक्तिगत कार्यों में आपस में मेल जोल गहरा था उनकी मित्रता में जहां अनेक संगठनों में एक कार्य करते थे वहां पर एक मित्र जो बुद्धिमान था उसने अपने आप को बुद्धिमानी के चलते चतुराई करने और स्वार्थ सिद्ध करने की आदत पड़ गई थी दोनों बराबर कार्य करते थे लेकिन एक समझदार कहिए या चतुर कहिए उस मित्र ने उस संगठन से करोड़ों रुपए कमाई की निवेश किया और पैसा दिनों-दिन बढ़ता चला गया।
इस प्रकार वह अपने आप को बहुत चतुर और चालक भी समझने लगा क्योंकि पैसा आने पर व्यक्ति की बद्धि और चतुराई से कार्य करती है इस प्रकार उसको लगने लगा कि वह बहुत चतुर और बुद्धिमान है वह हर कार्य में अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगा मित्रता के गहरे रिश्ते में इस प्रकार कोई अंतर नहीं पड़ा क्योंकि उसका दूसरा मित्र कभी भी उसे नजरिए से नहीं देखता था न वह नए स्वार्थ कार्य करता था और न कभी उसको लालच आया इस प्रकार वह संगठन में हर कार्य अपने हित के बजाय संगठन के लिए समाज के लिए, मित्रता के लिए और मानव विकास के लिए करता था इस प्रकार दूसरे मित्र ने अपना व्यक्तिगत पैसा संगठन में लगाया और सामाजिक कार्य के लिए निस्वार्थ कार्यकर्ता रह कर काम किया एक तरफ जहां एक मित्र ने करोड़ों रुपए संगठन से कमाई की वहीं दूसरे मित्र ने अपने लाखों रुपए संगठन में लगाए यह एक प्रमुख अंतर रहा उसके बावजूद भी कभी मित्रता में कोई अंतर नहीं आया यह एक अनोखा उदाहरण था परंतु जब जो व्यक्ति जैसा कार्य करता है वह भलि भांति जानता कि उसने कब क्या अच्छा किया है और क्या बुरा किया है आत्म रूप से सब पता होता है समझता है जानता है कभी ना कभी तो विवेक से वह ध्यान में आता है कब कैसे कर्तव्य निभाया है और उसमें कहां-कहां कमियां रही वह खुद जानता है इसलिए पैसे कमाने वाला मित्र धीरे-धीरे इस बात का एहसास करने लगा कि उसने क्या किया है और मन में अंदेशा आने लगा कि यह अन्वय लोगों को न बता दे इसलिए इससे दूरी बनाने का समय आ गया है और वह खुद अपने मित्र से दूरी बनाने लगा जब दूरी बनाने लगा तो दूसरा मित्र इस बात से हैरान और आश्चर्य चकित था कि उसके व्यवहार में यह अंतर क्यों हो रहा है और उसने इस बारे में जब उससे जानना चाहा तो वह छुपाने लगा और असली बात नहीं बता रहा था जिस कारण उनके बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगी अब मित्र यह सवाल भी समाज में कहीं जगह ख़ुद ही करने लगा कि मैंने कभी ग़लत नहीं किया है वह मुझसे ख़ुद दूर जा रहा है जबकि न तो समाज से कोई यह सवाल उनसे पूछ रहा था परंतु वह स्वयं को उचित , इमानदार ठहराने की कोशिश करता था और समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे मित्र पर यह सवाल आने लगे जिससे वह और आश्चर्य चकित होने लगा और उनमें दूरियां बढ़ने लगी किन्तु वह मित्र कहीं कोई बात नहीं कहता था और समाज पर दूसरे मित्र की अर्नगल बातें आती थी जिसका जवाब उसके पास क्या होता?
जो व्यक्ति जितना इमानदार होता है उसको उतना ज्यादा परेशान करने की कोशिशें की जाती हैं एक स्वार्थी और एक चतुर व्यक्ति खुद को अधिक बुद्धिमान समझने लगता है जबकि वह वास्तव में अव्यावहारिक कार्य करता है और वह खुद मूर्ख होता है लेकिन वह अपनी चतुराई के स्वभाव वश इस बात से परिचित नहीं हो पाता और उसमें अवगुण बढ़ते चले जाते हैं दूसरी तरफ जो व्यक्ति इमानदार निस्वार्थ होता है वह उतना ही पिसता चला जाता है लेकिन उसकी आत्मा कभी दुखी नहीं होती वह मन से पवित्र रहता है आत्मा से पवित्र रहता है और कभी दुखी नहीं होता परंतु दूसरी ओर चतुराई वश स्वार्थ वश किया गया कार्य ख़ुद को धीरे-धीरे समाज में शर्मशार करता है उस व्यक्ति को हर समय डर बना रहता है समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप और छुपा कर किए गए अनर्गल कार्यों का डर बना रहता है इस कारण वह अनेकों ग़लत काम करता रहता है।







