शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अनकही कहानियां सूबे सिंह सुजान-भाग-1

 दो गहरे मित्र होते हैं उनमें अनेक काम एक दूसरे के अपने कार्यक्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में और अन्य व्यक्तिगत कार्यों में आपस में मेल जोल गहरा था उनकी मित्रता में जहां  अनेक संगठनों में एक कार्य करते थे वहां पर एक मित्र जो बुद्धिमान था उसने अपने आप को बुद्धिमानी के चलते चतुराई करने और स्वार्थ सिद्ध करने की आदत पड़ गई थी दोनों बराबर कार्य करते थे लेकिन एक समझदार कहिए या चतुर कहिए उस मित्र ने उस संगठन से करोड़ों रुपए कमाई की निवेश किया और पैसा दिनों-दिन  बढ़ता चला गया।

 इस प्रकार वह अपने आप को बहुत चतुर और चालक भी समझने लगा क्योंकि पैसा आने पर व्यक्ति की बद्धि और चतुराई से कार्य करती है इस प्रकार उसको लगने लगा कि वह बहुत चतुर और बुद्धिमान है वह हर कार्य में अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगा मित्रता के गहरे रिश्ते में इस प्रकार कोई अंतर नहीं पड़ा  क्योंकि उसका दूसरा मित्र कभी भी उसे नजरिए से नहीं देखता था न वह नए स्वार्थ कार्य करता था और न कभी उसको लालच आया इस प्रकार वह संगठन में हर कार्य अपने हित के बजाय संगठन के लिए समाज के लिए, मित्रता के लिए और मानव विकास के लिए करता था इस प्रकार  दूसरे मित्र ने अपना व्यक्तिगत पैसा संगठन में लगाया और सामाजिक कार्य के लिए निस्वार्थ कार्यकर्ता रह कर काम किया एक तरफ जहां एक मित्र ने करोड़ों रुपए संगठन से कमाई की वहीं दूसरे मित्र ने अपने लाखों रुपए संगठन में लगाए यह एक प्रमुख अंतर रहा उसके बावजूद भी कभी मित्रता में कोई अंतर नहीं आया यह एक अनोखा उदाहरण था परंतु जब जो व्यक्ति जैसा कार्य करता है वह भलि भांति जानता कि उसने कब क्या अच्छा किया है और क्या बुरा किया है आत्म रूप से सब पता होता है समझता है जानता है कभी ना कभी तो विवेक से वह ध्यान में आता है कब कैसे कर्तव्य निभाया है  और उसमें कहां-कहां कमियां रही वह खुद जानता है इसलिए पैसे कमाने वाला मित्र धीरे-धीरे इस बात का एहसास करने लगा कि उसने क्या किया है और मन में अंदेशा आने लगा कि यह अन्वय लोगों को न बता दे इसलिए इससे दूरी बनाने का समय आ गया है और वह खुद अपने मित्र से दूरी बनाने लगा जब दूरी बनाने लगा तो दूसरा मित्र इस बात से हैरान और आश्चर्य चकित था कि उसके व्यवहार  में यह अंतर क्यों हो रहा है और उसने इस बारे में जब उससे जानना चाहा तो वह छुपाने लगा और असली बात नहीं बता रहा था जिस कारण उनके बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगी अब मित्र यह सवाल भी समाज में कहीं जगह ख़ुद ही करने लगा कि मैंने कभी ग़लत नहीं किया है वह मुझसे ख़ुद दूर जा रहा है  जबकि न तो समाज से कोई यह सवाल उनसे पूछ रहा था परंतु वह स्वयं को उचित , इमानदार ठहराने की कोशिश करता था और समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे मित्र पर यह सवाल आने लगे जिससे वह और आश्चर्य चकित होने लगा और उनमें दूरियां बढ़ने लगी किन्तु वह मित्र कहीं कोई बात नहीं कहता था और समाज पर दूसरे मित्र की अर्नगल बातें आती थी जिसका जवाब उसके पास क्या होता? 

जो व्यक्ति जितना इमानदार होता है उसको उतना ज्यादा परेशान करने की कोशिशें की जाती हैं एक स्वार्थी और एक चतुर व्यक्ति खुद को अधिक बुद्धिमान समझने लगता है जबकि वह वास्तव में अव्यावहारिक कार्य करता है और वह खुद मूर्ख होता है लेकिन वह अपनी चतुराई के स्वभाव वश इस बात से परिचित नहीं हो पाता और उसमें अवगुण बढ़ते चले जाते हैं  दूसरी तरफ जो व्यक्ति इमानदार निस्वार्थ होता है वह उतना ही पिसता चला जाता है लेकिन उसकी आत्मा कभी दुखी नहीं होती वह मन से पवित्र रहता है आत्मा से पवित्र रहता है और कभी दुखी नहीं होता परंतु दूसरी ओर चतुराई वश स्वार्थ वश किया गया कार्य ख़ुद को धीरे-धीरे समाज में शर्मशार करता है उस व्यक्ति को हर समय डर बना रहता है समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप और छुपा कर किए गए अनर्गल कार्यों का डर बना रहता है इस कारण वह अनेकों ग़लत काम करता रहता है।


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

ये भारी सम्मान, रख दो मुझ पर

 ये भारी सम्मान रख दो मुझ पर,

और बोले,अपमान आप रखना।

उठेंगे तुमसे नहीं पुरस्कार,

ये खेल मैदान,आप रखना।


सूबे सिंह सुजान



रविवार, 25 जनवरी 2026

समस्याएं पैदा की जाती हैं, समस्याओं को ठीक करने के लिए।

 समस्याएं पैदा की जाती हैं समस्याएं ठीक करने के लिए।

 यह प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया है जैसे बहुत अधिक गर्मी इसलिए होती है गर्मी को कम करने के लिए अर्थात अत्यधिक गर्मी होने के पश्चात मौसम में परिवर्तन होता है और बरसात होती है प्रकृति ने क्या प्रयोग किया गर्मी को ठीक करने के लिए गर्मी का ही प्रयोग किया जैसे लोहे को काटने के लिए लोहा ही इस्तेमाल किया जाता है यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं।


 इसी प्रकार समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रकृति द्वारा कुछ ऐसी प्रक्रिया की जाती हैं कि मनुष्य की कुछ समझ में शीघ्रता से नहीं आता किसी एक ऐसी समस्या को ठीक करने के लिए कुछ दूसरी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और वह समस्याएं प्रक्रिया स्वरूप में फिर उन समस्याओं को ठीक करती हैं समाज में इस प्रकार की प्रक्रिया भी निरंतर होती रहती हैं वह भी प्राकृतिक प्रक्रिया का एक बिंदु हैं 

मैं यहां पर यह भी जोड़ना चाहता हूँ, भारतीय समाज में जब जातियों में की भेदभाव समस्या पैदा हुई है वह समस्याएं कालांतर में अत्यधिक सामाजिक समानताएं और मनुष्यता के उच्च स्तरीय गुणों के निरंतर स्थिर रहने,होने के कारण पैदा हुई हैं अब उनको ठीक करने के लिए समाज में पुनः जातियों का सरलीकरण मिलन प्रक्रिया हो रही है जबकि समाज इस समय में एक जाति से दूसरी जाति में मिलना जुलना रिश्ते करना एक छोटी सोच मानते हैं परंतु यही प्रक्रिया जातियों को एकीकरण करने के लिए प्रकृति द्वारा इस्तेमाल की जा रही है जैसे हरियाणा के संदर्भ में ले तो हरियाणा के समाज में बेटियों का अत्यंत कम होना और फिर उसके प्रत्युत्तर में हरियाणा का समाज हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक से लड़कियों से शादी करने लगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया घटना घटी है जिससे विभिन्न जातियों और समाजों का एकीकरण होना प्रारंभ हो गया है और इस तरह की घटनाएं पूरे देश में, विभिन्न राज्यों में घट रही हैं अंततः यह एक तैयारी है एकीकरण , समानता,सनातन या हिंदुत्व के लिए प्रयोग किया गया है यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिस प्रकार यह समाज जातियों में बांटा गया,टूटा या विदेशी ताकतों द्वारा तोड़ा गया और अशिक्षा के कारण यह प्रक्रिया हुई थी अब इसी प्रक्रिया को ठीक करने के लिए प्रकृति द्वारा ऐसी प्रक्रियाओं का घटनाक्रम पुनर्गठन है और समाज में एकीकरण हो रहा है यह भारतीय संस्कृति के लिए भारतीय समाज के लिए हिंदुत्व के लिए सनातन के लिए पुनः जागृति काल है।


सूबे सिंह सुजान 




शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सर्दी कुछ नहीं कहती, सर्दी से सीखो अपना ध्यान रखें

 हर मौसम को जीने दो।


देखिए। सर्दी के बारे में अफवाहें मत फैलायें।

कि सर्दी आ गई है,यह हो गया, वह हो गया।लोग ठंड से मर गए आदि आदि। सर्दी की अफवाहें मत फैलाओ अपने आप को ठीक करो कभी गर्मी की अफवाहें कभी सर्दी की बेवजह अपनी ख़बर बेचने के लिए, अपने सामान बेचने के लिए कुछ भी बोलते हैं इसलिए आम जनमानस को यह विवेक से काम लेना चाहिए।


सच में तो सर्दी पहले से बहुत कम हो गई है नाममात्र रह गई है और यह सब मानव की भौतिकवादी मशीनीकरण से हो रहा है जो प्रकृति के विरुद्ध अन्याय है जिस प्रकार हम अपने ऊपर कोई अन्याय होता है उसके लिए चिल्लाते हैं धरना प्रदर्शन करते हैं कोर्ट जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति को भी अपनी कोर्ट जाना पड़ता है और उस पर भी हम हाय-तौबा करते हैं लेकिन कितनी भी हाय-तौबा कर लीजिए प्रकृति अपने न्याय के लिए तो लड़ेगी उसका भी अपना हक़ है।


जीवन बनाए रखने के लिए संतुलन अति आवश्यक है और वह संतुलन मनुष्य तो कभी नहीं बनाता वह महालालची, धूर्त श्रेणी का जीव है वह सब जीवों पर, प्रकृति के सब संसाधनों पर अपना हक़ जताता है और केवल असंतुलन पैदा करता है और ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह अंधानुकरण या कहें मूर्खता यूरोपीय देशों,समाज ने की है हम एक बात कहेंगे कि जीवन को मशीनीकरण ने आसान बनाया है, ठीक है बिल्कुल बनाया है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि रोगी भी बनाया है,असमय मृत्यु का ग्रास भी बनाया है हजारों, लाखों लोगों को मारा भी है और आयु कम कर दी है आकाश,पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को प्रदूषित कर दिया है न जाने कितने करोड़ों जीवों को असमय मारा है।

अपने लिए न्याय मांगने दौड़ते हैं और लाखों, करोड़ों जीवों को असमय मारते हैं?


इसलिए प्रकृति अपना काम अपने आप करेगी आप रोयें, चिल्लायें कुछ भी करें।

इससे अच्छा यह होगा कि आप सर्दी का आनंद लीजिए समय पर अपना प्रबंधन कीजिए हर मौसम अच्छा है उसकी सकारात्मकता को पहचानें और उसका आनंद लें।हर मौसम को जीने दो।


#हर #मौसम #को #जीने #दो

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

अमेरिका, यूरोप का कम्युनिस्ट विचारधारा नामक सांप अब उनको डंसने लगा है।

 आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जब दुश्मन अपने सर्वनाश की तरफ क़दम उठाए तो उसे रोकना, टोकना नहीं चाहिए उसके काम में व्यवधान नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह इतना उग्र हो जाएगा कि उसका सर्वनाश उसके कर्म करते हैं इसी प्रकार कम्युनिज्म ने पूरी दुनिया में आतंकवाद को पाला पोसा है कम्युनिस्ट कभी भी मुस्लिम मज़हब की जघन्य कृत्यों और कुरीतियों पर कभी एक शब्द नहीं कहते लेकिन हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति के विरोध में झूठे लेख लिखते हैं और एजेंडे चलाते हैं समाज को जातियों में, धर्म के नाम पर बांटते हैं लोगों में अफवाहें फैला कर उनके खिलाफ दुनिया से धन इकट्ठा करके लालच देकर उन्हें उनके ही देश, परिवार के विरुद्ध खड़ा करते हैं 

दुनिया में यूरोप और अमेरिका ने कम्युनिस्ट को पाला है और भारत में कांग्रेस ने पाला पोसा है और आज यही कम्युनिस्ट विचारधारा से पाले गए मुस्लिम मज़हब की कट्टरता इतनी हावी हो चुकी है कि यूरोपीय देशों में आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और अब अमेरिका के अंदर दख़ल दे दिया है अभी कुछ समय बाद आप देखेंगे न्यूयॉर्क में आतंकवाद पैर पसार लेगा और वहां नफ़रत की आंधी आएगी।

क्योंकि अमेरिका और यूरोप ने जो कम्युनिस्ट विचारधारा का सांप पाला है वह भारत और एशिया को बर्बाद करने के लिए पाला था अब यह सांप अमेरिका और यूरोप को डंसने उनके घर में पहुंच गया है आज लंदन सुरक्षित नहीं है लंदन से पिछले एक साल में बारह हजार मिलिनेयर लोग चले गए हैं इस बढ़ते आतंकवाद, मुस्लिमकरण के चलते। 

जब तक हम किसी बात को मन बना कर समझते नहीं हैं जब तक हम सच को समझते नहीं, झूठ और सच का अंतर नहीं समझते या जानते हुए भी बोलते नहीं तो हम अपराध कम नहीं कर सकते उसको बढ़ने का अवसर दे रहे होते हैं और यह काम भारत में ख़ुद सेक्युलर हिन्दू समाज ने किया है।और यही काम यूरोप और अमेरिका के कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों ने किया है जिसके घातक परिणाम अब उनको भुगतान करने होंगे।


रविवार, 26 अक्टूबर 2025

नयी ग़ज़ल। सूबे सिंह सुजान

 घबराइए नहीं कभी भी कामकाज से 

हर काम कीजिए सदा अपने मिज़ाज से।

सच के लिए विवाद नहीं, चर्चा ही करो, 

पीछे हटें न हम किसी भी ऐतराज से।

जो बात हम करें,तो सकारात्मक करें,

नीयत को ठीक करके ही प्रण कर लें आज से।

हमको बदलना होगा, नये वक्त के लिए,

बेशक मिली थी, कमियां हमें इस समाज से।

व्यापार का भी धर्म और संस्कार खूब है,

हम मूलधन को छोड़ बहुत खुश हैं ब्याज से।


सूबे सिंह सुजान 





नयी ग़ज़ल। अभी हुई।बहुत दिनों बाद ग़ज़ल हुई है।

जब नये विचारों, मानकों, प्रतीकों की तलाश, प्यास होती है तो बड़ी मुश्किल से कुछ दिखाई पड़ता है बहुत मेहनत की भागदौड़ बहुत शांत भी करती है।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

अपनी गरिमा को व्यक्ति ख़ुद नीचे गिरा लेते हैं।


 हर व्यक्ति का अपना एक अलग अलग स्वभाव, व्यक्तित्व होता है वह उसी प्रकार,कि जिस प्रकार उसकी शक्ल अलग-अलग, बुद्धि अलग अलग होती है।

लेकिन यह तो सामान्य बात है परन्तु हैरानी तब ज़्यादा होती है जब व्यक्ति के गिरने या उठने का स्तर भी अलग-अलग देखने को मिलता है यह उठ कर या बैठना नहीं है यह चारित्रिक, वैचारिक स्तर का उठना व बैठना है इससे भी गंभीर बात तब होती है जब वह कोई उच्च स्तरीय अधिकारी के पद पर कार्यरत होकर एक सामान्य नागरिक से भी नीचले स्तर पर जानते हुए भी गिर पड़ता है।

सामाज के लिए गंभीर प्रश्न तब बन जाता है जब उच्च स्तरीय अधिकारी और उच्च चरित्र प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति यह अशोभनीय कार्य करते हैं और  वह अपने स्तर पर अपने करीबी लोगों के लिए अनेकानेक नाजायज़ कार्य करते हैं और जो व्यक्ति उनको सही राह बताए और वह उसको न अपनाकर उसी के विरुद्ध तुच्छ मानसिकता के साथ बातचीत करते हैं यह समाज में अति संवेदनहीनता को प्रदर्शित करता है और बहुत दुःखद यह होता है कि सम्मुख बैठे समाज के गणमान्य कहलाने वाले खामोश रहते हैं जबकि कुछ दिनों बाद उनका भी यह नंबर आएगा यह वह भी नहीं सोचते जबकि जानते हैं कि ऐसा होता आया है लेकिन स्वार्थ वश वह सोचते हैं शायद मेरा नहीं दूसरे का नंबर आएगा।