हमारे देश में कुछ सेक्युलर लोगों का गुप्त ऐजेंडा होता है वह इसे लोगों के मन, बुद्धि, चित्त और संस्कृति, धर्म बदलने के लिए छिपा कर चलाते हैं।
कुछ प्रोफ़ेसर साहब और अपने लेखों में, कविता, कहानी में यह बयान करते हैं कि उर्दू ज़बान प्यार की ज़बान है और फिल्म इंडस्ट्री तो इसमें शुरू से यही कहती है।
तो अब हम पूछते हैं कि
बाक़ी जुबान तो प्यार के शब्दों में भी गाली देती हैं ?
यह दूसरी भाषाओं को नीचा दिखाने जैसा एजैंडा है लगातार यही कहा जाता है जबकि इस उर्दू में अन्य भाषाओं की अपेक्षा बहुत कम शब्द हैं
पर्यायवाची भी कम हैं इसमें कोई शक नहीं यह भाषा भारत में ही पनपी,विकसित हुई है लेकिन यह भाषा न तो अनुसंधान की वाहक बन सकी है न इसमें आधुनिकता के साथ साथ चलने की क्षमता है वैज्ञानिकता की तो और भी कमी है परन्तु हम किसी दूसरे के कहने से इसी भाषा को प्यार की भाषा कहते हैं यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है हम किस प्रकार भेदभाव करते हैं यह स्पष्ट पता चलता है लेकिन जब हम सार्थक तथ्यों पर यह बात रखते हैं तो हमीं में से लोग इस तथ्य को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए आगे ऐजेंडा खड़ा कर देते हैं और सच व तथ्य बेमौत मारे जाते हैं सच के ऊपर झूठ को हावी कर देते हैं।
हर जुबान का अपना अपना दायरा है उसका संप्रेषण है लेकिन किसी एक जुबान को कमजोर होने पर भी आवश्यकता से अधिक अनावश्यक महत्व देना उचित नहीं होता है सब भाषाओं को उनके तथ्यात्मक आधार पर तुलनात्मक समीक्षा होनी चाहिए।
सूबे सिंह सुजान





