गुरुवार, 4 जून 2026

पेड़ पौधे लगाए जाते हैं और फिर जलाए, काटे जाते हैं

 पर्यावरण ख़राब है यह सब कहते हैं लेकिन क्यों ख़राब है? 

कैसे ख़राब है? कौन ख़राब कर रहे हैं? 

और कैसे सुधारें? 

और सबसे बड़ी बात जो सुधारने की कोशिश कर रहा है उसका सहयोग कोई कर रहा है या उसका भी अपमान कोई कर रहा है अर्थात उसको सुधार करने से कैसे झूठे ऐजेंडा चला कर रोक रहे हैं?? 


यह सवाल बहुत हैं एक जागरूक नागरिक तो समझ सकता है और बहुत लोग धीरे-धीरे समझ भी रहे हैं।


जिस दिन इन जागरूक लोगों की संख्या और बढ़ जाएगी तो सुधार भी होगा।


लेकिन सबसे मुख्य बात यह है कि पर्यावरण में सुधार सबसे ज्यादा और तीव्रता के साथ प्रकृति ही करती है और मनुष्य पर्यावरण का केवल नुकसान व ह्रास ही करते हैं।


सब प्राणियों में मनुष्य ही प्रकृति का विनाशक है।


दूसरे पहलू पर ग़ौर करें कि सरकार ने एक पेड़ मां के नाम।

इस अभियान को बेसिक स्तर पर नई पौध अर्थात स्कूलों में बच्चों के बीच चलाया है और पिछले सात आठ सालों से यह कार्यक्रम चल रहा है 


हर साल लाखों पेड़ लगाए जा रहे हैं सरकार के आज तक के सबसे ज्यादा सकारात्मक प्रयास हुए हैं।


लेकिन इस मुहिम को जिन लोगों ने नहीं अपनाया और इसमें सहयोग नहीं किया?   क्या वह पर्यावरण के प्रति सकारात्मक हैं??? 


👉 लेकिन झूठ के सारे ऐजेंडा वह चलाते हैं लेकिन सकारात्मक एक भी काम नहीं करते हैं?? 


तो क्या आम सामान्य नागरिक इस बात को नहीं समझते? 

समझते हैं जनाब।

लेकिन बहुत धीरे-धीरे धीरे-धीरे समझते हैं और उसके परिणाम हमारे सामने धीरे धीरे आ भी रहे हैं।


👉पिछले करीब सत्तर सालों से बहुत से झूठे और आधारहीन नरेटिव चला कर ग़लत आदमी, ग़लत सोच को ही सही बनाकर पेश किया गया है!!!! 


देखिए!!!! सड़क किनारे, नहरों, राजबाह व पंचायत की ख़ाली जमीनों पर सरकार वन विभाग द्वारा जितने भी पेड़ लगाए गए थे उन सभी पेड़-पौधों को इसी झूठे ऐजेंडा के तहत तैयार की गई छवि द्वारा नष्ट कर दिया, जला दिए, कीटनाशक दवा द्वारा सुखा दिए गए हैं 

और वह छवि 👉 कि किसान मसीहा है किसान ही भोजन देता है इस बात में धरातल की ही नहीं प्राकृतिक सच्चाई है कि वह अनाज उगाता है लेकिन इसी बड़ी छवि की आड़ में उसी ने पर्यावरण को हर संभावना से दरकिनार किया है।


तो क्या एक अच्छा काम करने वाले ने कोई एक ग़लत काम कर दिया तो इसकी बुराई नहीं करें?? 

या उसको सज़ा न दी जाए?? 


बस इसी छवि का अनावश्यक रूप से दोहन करते हुए सब पेड़ पौधे नष्ट कर दिए जाते हैं और उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता यदि कहें तो उस पर ऐजेंडाधारी राजनीतिक लोग व दल उसका दुरूपयोग करते हैं और सरकार का पेड़ लगाने की मुहिम को तो शून्य में धकेल दिया जाता है साथ ही टैक्स देने वाली जनता का पैसा और सरकारी बजट भी पेड़ पौधे के साथ सूख जाता है और अन्य कार्यों से भी वंचित रह जाते हैं।


👉हम सही को सही और ग़लत को ग़लत नहीं कह पाते हैं?? और इसका कारण सत्य को झूठ में बदलने की जो विदेशी ताकतों द्वारा ऐजेंडा चलाने और उनके अनुयाई दलों द्वारा भारत में संचालित होने से हुआ है।


उन विदेशी ताकतों ने पहले भी भारत का दोहन किया है और अब भी अपने व्यापारिक हितों के लिए प्रयोग करते रहे हैं।

और वर्तमान समय में जब सरकार इच्छाशक्ति, स्वाभिमान से कार्य करने लगी तो यही विदेशी ताकतें बिलबिला उठी हैं और भारत को अस्थिर करने में लगी हुई हैं 


👉हमें जागना होगा और देशहित में आगे आना होगा अपनी युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनाना होगा और बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना होगा।


👉 धर्म का अर्थ कर्तव्य है 

👉और यह केवल सनातन संस्कृति में ही अर्थ प्रयुक्त होता है लेकिन यह अर्थ प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा संचालित है।


👉हमारा कर्तव्य हर काम के प्रति सकारात्मक है तो हम न्याय कर रहे हैं यदि नकारात्मक है तो हम अन्याय कर रहे हैं।


👉 यदि हम खेती में प्रयुक्त ज़मीन को पांच साल के लिए ख़ाली छोड़ दें तो आप पायेंगे कि प्रकृति पांच सालों में उस ज़मीन पर अपने आप लाखों पेड़ उगा देगी और पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा।।।


लेकिन क्या आप ऐसा कर पाएंगे????

बस यही मुख्य कारण है कि हम पर्यावरण को शुद्ध न करने में सब शामिल हैं।


सूबे सिंह सुजान 




गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

उनकी नींद में खलल पड़ता है।

 दरअसल हमारे शिक्षक वर्तमान समय में मीठा ज़हर का इस्तेमाल करते हैं यह चाहते हैं इन्हें काम करने के लिए भी कोई न कहे 

और यूनियन इनके आराम का प्रबंध करे।


यह मीठा ज़हर धीरे धीरे स्कूलों को बंद करने का मुख्य कारण है।

यह सोचते हैं कि जो स्कूलों में काम करने को कहें उनका विरोध करो।

और इसी का परिणाम धीरे धीरे आ रहा है।


मुझसे तो यह शिकायत बहुत लोगों को है मैं ऐसा कह देता हूं।

यूनियन के लोगों से बलि की उम्मीद करते हैं कि सब काम उनके लिए करें और इनको सामने न आना पड़े।


आप तो हम अपने स्कूल की समस्या लिखकर नहीं दे सकते हैं और स्कूल में कोई गांव का सामान्य,निर्धन व्यक्ति काम आए तो सब लिखित में चाहिए? 

फिर सब नियम याद आ जाते हैं लेकिन स्कूलों को बेहतर करने के लिए, बच्चों की सुविधाओं के लिए एक अधिकारी के सामने नहीं जा सकते, किसी को लिख कर शिकायतें नहीं कर सकते हैं? 

संगठन की कॉल पर धरना प्रदर्शन में नहीं आ सकते? 


मतलब जो मानसिकता भगतसिंह की फांसी के समय थी, वही मानसिकता ज़्यादा बलवती हो रही है 

कि मरने के लिए कोई और जाए हमें न जाना पड़े।

लेकिन समस्या दूर करने के लिए कोई और आएं।


मुझसे यह बात कहने पर शिकायत बहुत शिक्षकों को है।

इससे जाहिर होता है कि मैं उनके सोए ज़मीर पर थोड़ी दस्तक देने की कोशिश करता हूं लेकिन वह उन्हें बुरी लगती है क्योंकि उनकी नींद में खलल पड़ता है।


सूबे सिंह सुजान




उर्दू ज़बान और प्यार का झूठा प्रोपगंडा

 हमारे देश में कुछ सेक्युलर लोगों का गुप्त ऐजेंडा होता है वह इसे लोगों के मन, बुद्धि, चित्त और संस्कृति, धर्म बदलने के लिए छिपा कर चलाते हैं।

कुछ प्रोफ़ेसर साहब और अपने लेखों में, कविता, कहानी में यह बयान करते हैं कि उर्दू ज़बान प्यार की ज़बान है और फिल्म इंडस्ट्री तो इसमें शुरू से यही कहती है।

तो अब हम पूछते हैं कि 

बाक़ी जुबान तो प्यार के शब्दों में भी गाली देती हैं ?

यह दूसरी भाषाओं को नीचा दिखाने जैसा एजैंडा है लगातार यही कहा जाता है जबकि इस उर्दू में अन्य भाषाओं की अपेक्षा बहुत कम शब्द हैं 

पर्यायवाची भी कम हैं इसमें कोई शक नहीं यह भाषा भारत में ही पनपी,विकसित हुई है लेकिन यह भाषा न तो अनुसंधान की वाहक बन सकी है न इसमें आधुनिकता के साथ साथ चलने की क्षमता है वैज्ञानिकता की तो और भी कमी है परन्तु हम किसी दूसरे के कहने से इसी भाषा को प्यार की भाषा कहते हैं यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है हम किस प्रकार भेदभाव करते हैं यह स्पष्ट पता चलता है लेकिन जब हम सार्थक तथ्यों पर यह बात रखते हैं तो हमीं में से लोग इस तथ्य को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए आगे ऐजेंडा खड़ा कर देते हैं और सच व तथ्य बेमौत मारे जाते हैं सच के ऊपर झूठ को हावी कर देते हैं।

हर जुबान का अपना अपना दायरा है उसका संप्रेषण है लेकिन किसी एक जुबान को कमजोर होने पर भी आवश्यकता से अधिक अनावश्यक महत्व देना उचित नहीं होता है सब भाषाओं को उनके तथ्यात्मक आधार पर तुलनात्मक समीक्षा होनी चाहिए।


सूबे सिंह सुजान 


मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

वामपंथी द्वारा सूबे सिंह सुजान

 वह लोग जिसे असभ्य कह रहे हैं 

एक दिन पहले उसे वही लोग सच्चा बताते हैं?

वही लोग उसे सही ठहराते हैं फिर वही लोग उसे असभ्य कहते हैं ?


इन लोगों की इन हरकतों से पता चलता है 

कि इनको सच का शायद पता ही नहीं है यह एक धूर्तता के शिकार हैं यह सच के विरुद्ध काम करते हैं और मूर्खता को पालते हैं।


यह ग़रीबी के कारण बनते हैं तरक्की को रोकते हैं और लोगों को उनकी गरीबी से बाहर निकालने के सपने दिखाते हैं।


यह लोग कभी कुछ काम नहीं करते पाए जाते हैं यह काम करने वालों के पीछे जरूर पड़े रहते हैं।


यह लोग ख़ुद को बुद्धिमानी का तमग़ा ख़ुद ही देते हैं और इतिहास से साज़िश करते, साहित्य से धोखाधड़ी करते हुए पकड़े जाते हैं।


यह लोग कौन हैं??? 

बताओ? यह लोग कौन हैं? 

#कौन


सूबे सिंह सुजान 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अनकही कहानियां सूबे सिंह सुजान-भाग-1

 दो गहरे मित्र होते हैं उनमें अनेक काम एक दूसरे के अपने कार्यक्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में और अन्य व्यक्तिगत कार्यों में आपस में मेल जोल गहरा था उनकी मित्रता में जहां  अनेक संगठनों में एक कार्य करते थे वहां पर एक मित्र जो बुद्धिमान था उसने अपने आप को बुद्धिमानी के चलते चतुराई करने और स्वार्थ सिद्ध करने की आदत पड़ गई थी दोनों बराबर कार्य करते थे लेकिन एक समझदार कहिए या चतुर कहिए उस मित्र ने उस संगठन से करोड़ों रुपए कमाई की निवेश किया और पैसा दिनों-दिन  बढ़ता चला गया।

 इस प्रकार वह अपने आप को बहुत चतुर और चालक भी समझने लगा क्योंकि पैसा आने पर व्यक्ति की बद्धि और चतुराई से कार्य करती है इस प्रकार उसको लगने लगा कि वह बहुत चतुर और बुद्धिमान है वह हर कार्य में अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगा मित्रता के गहरे रिश्ते में इस प्रकार कोई अंतर नहीं पड़ा  क्योंकि उसका दूसरा मित्र कभी भी उसे नजरिए से नहीं देखता था न वह नए स्वार्थ कार्य करता था और न कभी उसको लालच आया इस प्रकार वह संगठन में हर कार्य अपने हित के बजाय संगठन के लिए समाज के लिए, मित्रता के लिए और मानव विकास के लिए करता था इस प्रकार  दूसरे मित्र ने अपना व्यक्तिगत पैसा संगठन में लगाया और सामाजिक कार्य के लिए निस्वार्थ कार्यकर्ता रह कर काम किया एक तरफ जहां एक मित्र ने करोड़ों रुपए संगठन से कमाई की वहीं दूसरे मित्र ने अपने लाखों रुपए संगठन में लगाए यह एक प्रमुख अंतर रहा उसके बावजूद भी कभी मित्रता में कोई अंतर नहीं आया यह एक अनोखा उदाहरण था परंतु जब जो व्यक्ति जैसा कार्य करता है वह भलि भांति जानता कि उसने कब क्या अच्छा किया है और क्या बुरा किया है आत्म रूप से सब पता होता है समझता है जानता है कभी ना कभी तो विवेक से वह ध्यान में आता है कब कैसे कर्तव्य निभाया है  और उसमें कहां-कहां कमियां रही वह खुद जानता है इसलिए पैसे कमाने वाला मित्र धीरे-धीरे इस बात का एहसास करने लगा कि उसने क्या किया है और मन में अंदेशा आने लगा कि यह अन्वय लोगों को न बता दे इसलिए इससे दूरी बनाने का समय आ गया है और वह खुद अपने मित्र से दूरी बनाने लगा जब दूरी बनाने लगा तो दूसरा मित्र इस बात से हैरान और आश्चर्य चकित था कि उसके व्यवहार  में यह अंतर क्यों हो रहा है और उसने इस बारे में जब उससे जानना चाहा तो वह छुपाने लगा और असली बात नहीं बता रहा था जिस कारण उनके बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगी अब मित्र यह सवाल भी समाज में कहीं जगह ख़ुद ही करने लगा कि मैंने कभी ग़लत नहीं किया है वह मुझसे ख़ुद दूर जा रहा है  जबकि न तो समाज से कोई यह सवाल उनसे पूछ रहा था परंतु वह स्वयं को उचित , इमानदार ठहराने की कोशिश करता था और समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे मित्र पर यह सवाल आने लगे जिससे वह और आश्चर्य चकित होने लगा और उनमें दूरियां बढ़ने लगी किन्तु वह मित्र कहीं कोई बात नहीं कहता था और समाज पर दूसरे मित्र की अर्नगल बातें आती थी जिसका जवाब उसके पास क्या होता? 

जो व्यक्ति जितना इमानदार होता है उसको उतना ज्यादा परेशान करने की कोशिशें की जाती हैं एक स्वार्थी और एक चतुर व्यक्ति खुद को अधिक बुद्धिमान समझने लगता है जबकि वह वास्तव में अव्यावहारिक कार्य करता है और वह खुद मूर्ख होता है लेकिन वह अपनी चतुराई के स्वभाव वश इस बात से परिचित नहीं हो पाता और उसमें अवगुण बढ़ते चले जाते हैं  दूसरी तरफ जो व्यक्ति इमानदार निस्वार्थ होता है वह उतना ही पिसता चला जाता है लेकिन उसकी आत्मा कभी दुखी नहीं होती वह मन से पवित्र रहता है आत्मा से पवित्र रहता है और कभी दुखी नहीं होता परंतु दूसरी ओर चतुराई वश स्वार्थ वश किया गया कार्य ख़ुद को धीरे-धीरे समाज में शर्मशार करता है उस व्यक्ति को हर समय डर बना रहता है समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप और छुपा कर किए गए अनर्गल कार्यों का डर बना रहता है इस कारण वह अनेकों ग़लत काम करता रहता है।


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

ये भारी सम्मान, रख दो मुझ पर

 ये भारी सम्मान रख दो मुझ पर,

और बोले,अपमान आप रखना।

उठेंगे तुमसे नहीं पुरस्कार,

ये खेल मैदान,आप रखना।


सूबे सिंह सुजान



रविवार, 25 जनवरी 2026

समस्याएं पैदा की जाती हैं, समस्याओं को ठीक करने के लिए।

 समस्याएं पैदा की जाती हैं समस्याएं ठीक करने के लिए।

 यह प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया है जैसे बहुत अधिक गर्मी इसलिए होती है गर्मी को कम करने के लिए अर्थात अत्यधिक गर्मी होने के पश्चात मौसम में परिवर्तन होता है और बरसात होती है प्रकृति ने क्या प्रयोग किया गर्मी को ठीक करने के लिए गर्मी का ही प्रयोग किया जैसे लोहे को काटने के लिए लोहा ही इस्तेमाल किया जाता है यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं।


 इसी प्रकार समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रकृति द्वारा कुछ ऐसी प्रक्रिया की जाती हैं कि मनुष्य की कुछ समझ में शीघ्रता से नहीं आता किसी एक ऐसी समस्या को ठीक करने के लिए कुछ दूसरी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और वह समस्याएं प्रक्रिया स्वरूप में फिर उन समस्याओं को ठीक करती हैं समाज में इस प्रकार की प्रक्रिया भी निरंतर होती रहती हैं वह भी प्राकृतिक प्रक्रिया का एक बिंदु हैं 

मैं यहां पर यह भी जोड़ना चाहता हूँ, भारतीय समाज में जब जातियों में की भेदभाव समस्या पैदा हुई है वह समस्याएं कालांतर में अत्यधिक सामाजिक समानताएं और मनुष्यता के उच्च स्तरीय गुणों के निरंतर स्थिर रहने,होने के कारण पैदा हुई हैं अब उनको ठीक करने के लिए समाज में पुनः जातियों का सरलीकरण मिलन प्रक्रिया हो रही है जबकि समाज इस समय में एक जाति से दूसरी जाति में मिलना जुलना रिश्ते करना एक छोटी सोच मानते हैं परंतु यही प्रक्रिया जातियों को एकीकरण करने के लिए प्रकृति द्वारा इस्तेमाल की जा रही है जैसे हरियाणा के संदर्भ में ले तो हरियाणा के समाज में बेटियों का अत्यंत कम होना और फिर उसके प्रत्युत्तर में हरियाणा का समाज हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक से लड़कियों से शादी करने लगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया घटना घटी है जिससे विभिन्न जातियों और समाजों का एकीकरण होना प्रारंभ हो गया है और इस तरह की घटनाएं पूरे देश में, विभिन्न राज्यों में घट रही हैं अंततः यह एक तैयारी है एकीकरण , समानता,सनातन या हिंदुत्व के लिए प्रयोग किया गया है यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिस प्रकार यह समाज जातियों में बांटा गया,टूटा या विदेशी ताकतों द्वारा तोड़ा गया और अशिक्षा के कारण यह प्रक्रिया हुई थी अब इसी प्रक्रिया को ठीक करने के लिए प्रकृति द्वारा ऐसी प्रक्रियाओं का घटनाक्रम पुनर्गठन है और समाज में एकीकरण हो रहा है यह भारतीय संस्कृति के लिए भारतीय समाज के लिए हिंदुत्व के लिए सनातन के लिए पुनः जागृति काल है।


सूबे सिंह सुजान 




शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सर्दी कुछ नहीं कहती, सर्दी से सीखो अपना ध्यान रखें

 हर मौसम को जीने दो।


देखिए। सर्दी के बारे में अफवाहें मत फैलायें।

कि सर्दी आ गई है,यह हो गया, वह हो गया।लोग ठंड से मर गए आदि आदि। सर्दी की अफवाहें मत फैलाओ अपने आप को ठीक करो कभी गर्मी की अफवाहें कभी सर्दी की बेवजह अपनी ख़बर बेचने के लिए, अपने सामान बेचने के लिए कुछ भी बोलते हैं इसलिए आम जनमानस को यह विवेक से काम लेना चाहिए।


सच में तो सर्दी पहले से बहुत कम हो गई है नाममात्र रह गई है और यह सब मानव की भौतिकवादी मशीनीकरण से हो रहा है जो प्रकृति के विरुद्ध अन्याय है जिस प्रकार हम अपने ऊपर कोई अन्याय होता है उसके लिए चिल्लाते हैं धरना प्रदर्शन करते हैं कोर्ट जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति को भी अपनी कोर्ट जाना पड़ता है और उस पर भी हम हाय-तौबा करते हैं लेकिन कितनी भी हाय-तौबा कर लीजिए प्रकृति अपने न्याय के लिए तो लड़ेगी उसका भी अपना हक़ है।


जीवन बनाए रखने के लिए संतुलन अति आवश्यक है और वह संतुलन मनुष्य तो कभी नहीं बनाता वह महालालची, धूर्त श्रेणी का जीव है वह सब जीवों पर, प्रकृति के सब संसाधनों पर अपना हक़ जताता है और केवल असंतुलन पैदा करता है और ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह अंधानुकरण या कहें मूर्खता यूरोपीय देशों,समाज ने की है हम एक बात कहेंगे कि जीवन को मशीनीकरण ने आसान बनाया है, ठीक है बिल्कुल बनाया है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि रोगी भी बनाया है,असमय मृत्यु का ग्रास भी बनाया है हजारों, लाखों लोगों को मारा भी है और आयु कम कर दी है आकाश,पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को प्रदूषित कर दिया है न जाने कितने करोड़ों जीवों को असमय मारा है।

अपने लिए न्याय मांगने दौड़ते हैं और लाखों, करोड़ों जीवों को असमय मारते हैं?


इसलिए प्रकृति अपना काम अपने आप करेगी आप रोयें, चिल्लायें कुछ भी करें।

इससे अच्छा यह होगा कि आप सर्दी का आनंद लीजिए समय पर अपना प्रबंधन कीजिए हर मौसम अच्छा है उसकी सकारात्मकता को पहचानें और उसका आनंद लें।हर मौसम को जीने दो।


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