शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

ये भारी सम्मान, रख दो मुझ पर

 ये भारी सम्मान रख दो मुझ पर,

और बोले,अपमान आप रखना।

उठेंगे तुमसे नहीं पुरस्कार,

ये खेल मैदान,आप रखना।


सूबे सिंह सुजान



रविवार, 25 जनवरी 2026

समस्याएं पैदा की जाती हैं, समस्याओं को ठीक करने के लिए।

 समस्याएं पैदा की जाती हैं समस्याएं ठीक करने के लिए।

 यह प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया है जैसे बहुत अधिक गर्मी इसलिए होती है गर्मी को कम करने के लिए अर्थात अत्यधिक गर्मी होने के पश्चात मौसम में परिवर्तन होता है और बरसात होती है प्रकृति ने क्या प्रयोग किया गर्मी को ठीक करने के लिए गर्मी का ही प्रयोग किया जैसे लोहे को काटने के लिए लोहा ही इस्तेमाल किया जाता है यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं।


 इसी प्रकार समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रकृति द्वारा कुछ ऐसी प्रक्रिया की जाती हैं कि मनुष्य की कुछ समझ में शीघ्रता से नहीं आता किसी एक ऐसी समस्या को ठीक करने के लिए कुछ दूसरी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और वह समस्याएं प्रक्रिया स्वरूप में फिर उन समस्याओं को ठीक करती हैं समाज में इस प्रकार की प्रक्रिया भी निरंतर होती रहती हैं वह भी प्राकृतिक प्रक्रिया का एक बिंदु हैं 

मैं यहां पर यह भी जोड़ना चाहता हूँ, भारतीय समाज में जब जातियों में की भेदभाव समस्या पैदा हुई है वह समस्याएं कालांतर में अत्यधिक सामाजिक समानताएं और मनुष्यता के उच्च स्तरीय गुणों के निरंतर स्थिर रहने,होने के कारण पैदा हुई हैं अब उनको ठीक करने के लिए समाज में पुनः जातियों का सरलीकरण मिलन प्रक्रिया हो रही है जबकि समाज इस समय में एक जाति से दूसरी जाति में मिलना जुलना रिश्ते करना एक छोटी सोच मानते हैं परंतु यही प्रक्रिया जातियों को एकीकरण करने के लिए प्रकृति द्वारा इस्तेमाल की जा रही है जैसे हरियाणा के संदर्भ में ले तो हरियाणा के समाज में बेटियों का अत्यंत कम होना और फिर उसके प्रत्युत्तर में हरियाणा का समाज हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक से लड़कियों से शादी करने लगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया घटना घटी है जिससे विभिन्न जातियों और समाजों का एकीकरण होना प्रारंभ हो गया है और इस तरह की घटनाएं पूरे देश में, विभिन्न राज्यों में घट रही हैं अंततः यह एक तैयारी है एकीकरण , समानता,सनातन या हिंदुत्व के लिए प्रयोग किया गया है यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिस प्रकार यह समाज जातियों में बांटा गया,टूटा या विदेशी ताकतों द्वारा तोड़ा गया और अशिक्षा के कारण यह प्रक्रिया हुई थी अब इसी प्रक्रिया को ठीक करने के लिए प्रकृति द्वारा ऐसी प्रक्रियाओं का घटनाक्रम पुनर्गठन है और समाज में एकीकरण हो रहा है यह भारतीय संस्कृति के लिए भारतीय समाज के लिए हिंदुत्व के लिए सनातन के लिए पुनः जागृति काल है।


सूबे सिंह सुजान 




शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सर्दी कुछ नहीं कहती, सर्दी से सीखो अपना ध्यान रखें

 हर मौसम को जीने दो।


देखिए। सर्दी के बारे में अफवाहें मत फैलायें।

कि सर्दी आ गई है,यह हो गया, वह हो गया।लोग ठंड से मर गए आदि आदि। सर्दी की अफवाहें मत फैलाओ अपने आप को ठीक करो कभी गर्मी की अफवाहें कभी सर्दी की बेवजह अपनी ख़बर बेचने के लिए, अपने सामान बेचने के लिए कुछ भी बोलते हैं इसलिए आम जनमानस को यह विवेक से काम लेना चाहिए।


सच में तो सर्दी पहले से बहुत कम हो गई है नाममात्र रह गई है और यह सब मानव की भौतिकवादी मशीनीकरण से हो रहा है जो प्रकृति के विरुद्ध अन्याय है जिस प्रकार हम अपने ऊपर कोई अन्याय होता है उसके लिए चिल्लाते हैं धरना प्रदर्शन करते हैं कोर्ट जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति को भी अपनी कोर्ट जाना पड़ता है और उस पर भी हम हाय-तौबा करते हैं लेकिन कितनी भी हाय-तौबा कर लीजिए प्रकृति अपने न्याय के लिए तो लड़ेगी उसका भी अपना हक़ है।


जीवन बनाए रखने के लिए संतुलन अति आवश्यक है और वह संतुलन मनुष्य तो कभी नहीं बनाता वह महालालची, धूर्त श्रेणी का जीव है वह सब जीवों पर, प्रकृति के सब संसाधनों पर अपना हक़ जताता है और केवल असंतुलन पैदा करता है और ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह अंधानुकरण या कहें मूर्खता यूरोपीय देशों,समाज ने की है हम एक बात कहेंगे कि जीवन को मशीनीकरण ने आसान बनाया है, ठीक है बिल्कुल बनाया है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि रोगी भी बनाया है,असमय मृत्यु का ग्रास भी बनाया है हजारों, लाखों लोगों को मारा भी है और आयु कम कर दी है आकाश,पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को प्रदूषित कर दिया है न जाने कितने करोड़ों जीवों को असमय मारा है।

अपने लिए न्याय मांगने दौड़ते हैं और लाखों, करोड़ों जीवों को असमय मारते हैं?


इसलिए प्रकृति अपना काम अपने आप करेगी आप रोयें, चिल्लायें कुछ भी करें।

इससे अच्छा यह होगा कि आप सर्दी का आनंद लीजिए समय पर अपना प्रबंधन कीजिए हर मौसम अच्छा है उसकी सकारात्मकता को पहचानें और उसका आनंद लें।हर मौसम को जीने दो।


#हर #मौसम #को #जीने #दो

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

अमेरिका, यूरोप का कम्युनिस्ट विचारधारा नामक सांप अब उनको डंसने लगा है।

 आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जब दुश्मन अपने सर्वनाश की तरफ क़दम उठाए तो उसे रोकना, टोकना नहीं चाहिए उसके काम में व्यवधान नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह इतना उग्र हो जाएगा कि उसका सर्वनाश उसके कर्म करते हैं इसी प्रकार कम्युनिज्म ने पूरी दुनिया में आतंकवाद को पाला पोसा है कम्युनिस्ट कभी भी मुस्लिम मज़हब की जघन्य कृत्यों और कुरीतियों पर कभी एक शब्द नहीं कहते लेकिन हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति के विरोध में झूठे लेख लिखते हैं और एजेंडे चलाते हैं समाज को जातियों में, धर्म के नाम पर बांटते हैं लोगों में अफवाहें फैला कर उनके खिलाफ दुनिया से धन इकट्ठा करके लालच देकर उन्हें उनके ही देश, परिवार के विरुद्ध खड़ा करते हैं 

दुनिया में यूरोप और अमेरिका ने कम्युनिस्ट को पाला है और भारत में कांग्रेस ने पाला पोसा है और आज यही कम्युनिस्ट विचारधारा से पाले गए मुस्लिम मज़हब की कट्टरता इतनी हावी हो चुकी है कि यूरोपीय देशों में आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और अब अमेरिका के अंदर दख़ल दे दिया है अभी कुछ समय बाद आप देखेंगे न्यूयॉर्क में आतंकवाद पैर पसार लेगा और वहां नफ़रत की आंधी आएगी।

क्योंकि अमेरिका और यूरोप ने जो कम्युनिस्ट विचारधारा का सांप पाला है वह भारत और एशिया को बर्बाद करने के लिए पाला था अब यह सांप अमेरिका और यूरोप को डंसने उनके घर में पहुंच गया है आज लंदन सुरक्षित नहीं है लंदन से पिछले एक साल में बारह हजार मिलिनेयर लोग चले गए हैं इस बढ़ते आतंकवाद, मुस्लिमकरण के चलते। 

जब तक हम किसी बात को मन बना कर समझते नहीं हैं जब तक हम सच को समझते नहीं, झूठ और सच का अंतर नहीं समझते या जानते हुए भी बोलते नहीं तो हम अपराध कम नहीं कर सकते उसको बढ़ने का अवसर दे रहे होते हैं और यह काम भारत में ख़ुद सेक्युलर हिन्दू समाज ने किया है।और यही काम यूरोप और अमेरिका के कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों ने किया है जिसके घातक परिणाम अब उनको भुगतान करने होंगे।


रविवार, 26 अक्टूबर 2025

नयी ग़ज़ल। सूबे सिंह सुजान

 घबराइए नहीं कभी भी कामकाज से 

हर काम कीजिए सदा अपने मिज़ाज से।

सच के लिए विवाद नहीं, चर्चा ही करो, 

पीछे हटें न हम किसी भी ऐतराज से।

जो बात हम करें,तो सकारात्मक करें,

नीयत को ठीक करके ही प्रण कर लें आज से।

हमको बदलना होगा, नये वक्त के लिए,

बेशक मिली थी, कमियां हमें इस समाज से।

व्यापार का भी धर्म और संस्कार खूब है,

हम मूलधन को छोड़ बहुत खुश हैं ब्याज से।


सूबे सिंह सुजान 





नयी ग़ज़ल। अभी हुई।बहुत दिनों बाद ग़ज़ल हुई है।

जब नये विचारों, मानकों, प्रतीकों की तलाश, प्यास होती है तो बड़ी मुश्किल से कुछ दिखाई पड़ता है बहुत मेहनत की भागदौड़ बहुत शांत भी करती है।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

अपनी गरिमा को व्यक्ति ख़ुद नीचे गिरा लेते हैं।


 हर व्यक्ति का अपना एक अलग अलग स्वभाव, व्यक्तित्व होता है वह उसी प्रकार,कि जिस प्रकार उसकी शक्ल अलग-अलग, बुद्धि अलग अलग होती है।

लेकिन यह तो सामान्य बात है परन्तु हैरानी तब ज़्यादा होती है जब व्यक्ति के गिरने या उठने का स्तर भी अलग-अलग देखने को मिलता है यह उठ कर या बैठना नहीं है यह चारित्रिक, वैचारिक स्तर का उठना व बैठना है इससे भी गंभीर बात तब होती है जब वह कोई उच्च स्तरीय अधिकारी के पद पर कार्यरत होकर एक सामान्य नागरिक से भी नीचले स्तर पर जानते हुए भी गिर पड़ता है।

सामाज के लिए गंभीर प्रश्न तब बन जाता है जब उच्च स्तरीय अधिकारी और उच्च चरित्र प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति यह अशोभनीय कार्य करते हैं और  वह अपने स्तर पर अपने करीबी लोगों के लिए अनेकानेक नाजायज़ कार्य करते हैं और जो व्यक्ति उनको सही राह बताए और वह उसको न अपनाकर उसी के विरुद्ध तुच्छ मानसिकता के साथ बातचीत करते हैं यह समाज में अति संवेदनहीनता को प्रदर्शित करता है और बहुत दुःखद यह होता है कि सम्मुख बैठे समाज के गणमान्य कहलाने वाले खामोश रहते हैं जबकि कुछ दिनों बाद उनका भी यह नंबर आएगा यह वह भी नहीं सोचते जबकि जानते हैं कि ऐसा होता आया है लेकिन स्वार्थ वश वह सोचते हैं शायद मेरा नहीं दूसरे का नंबर आएगा।


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

भावनाओं से व्यापार करना कानूनी जुर्म घोषित होना चाहिए

 जीवन शैली में सभ्यता , संस्कृति व धर्म का महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसके पश्चात संविधान व कानून का योगदान आया है लेकिन यदि संविधान का प्रयोग अलग अलग व्यक्तियों के लिए उनकी अलग-अलग मान्यता के लिए जानबूझकर साज़िश के तहत किया जाने लगता है तो संविधान का उल्लंघन भी जानबूझकर किया जाता है तो संविधान का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

और जब किसी एक पक्ष की जानबूझकर की गई गल्तियो में दूसरे पक्ष को भी शामिल करके अपनी बात कहना व प्रचारित करना भी एक तरह का जुर्म है और यह जुर्म अर्थात यह बात इस तरह कहना साजिशतन सिखाया जाए तो यह संविधान व कानून में अपराध श्रेणी में शामिल करके सजा दिया जाना चाहिए न कि उनकी भावनाओं की बात व विचारों की स्वतंत्रता कह कर टाल दिया जाए क्योंकि आप दूसरे पक्ष को जानबूझकर बात में हिस्सा बना कर जुर्म करने वाले के पक्ष को कमजोर करके उसे बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

जब कश्मीर में भारत के राज् चिन्ह अशोक चक्र जो हटाया, तोड़ा, जलाया जाता है जो कि बरसों से पहले वहां पर अंकित है तो उसके अपराध में उन अपराधियों को सीधा अपराधी न कह कर ,उनकी बात के बीच में दूसरे पक्ष को ले आते हैं, जिसका कोई तर्क नहीं है तो आप जुर्म करने वाले पक्ष को जानबूझकर बचाने की साज़िश कर रहे हैं।

ऐसा भारत की अदालतों में अक्सर हमारे वकील,जज लोग करते हैं और इसी तरह मीडिया भी सरेआम अपने विचारों की स्वतंत्रता का सहारा लेकर दूसरे पक्ष पर अपने विचार जबरदस्ती थोपते हुए उसे घसीट लेते हैं यह वास्तव में एक साज़िश का पहलू होता है।




सूबे सिंह सुजान