गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

उनकी नींद में खलल पड़ता है।

 दरअसल हमारे शिक्षक वर्तमान समय में मीठा ज़हर का इस्तेमाल करते हैं यह चाहते हैं इन्हें काम करने के लिए भी कोई न कहे 

और यूनियन इनके आराम का प्रबंध करे।


यह मीठा ज़हर धीरे धीरे स्कूलों को बंद करने का मुख्य कारण है।

यह सोचते हैं कि जो स्कूलों में काम करने को कहें उनका विरोध करो।

और इसी का परिणाम धीरे धीरे आ रहा है।


मुझसे तो यह शिकायत बहुत लोगों को है मैं ऐसा कह देता हूं।

यूनियन के लोगों से बलि की उम्मीद करते हैं कि सब काम उनके लिए करें और इनको सामने न आना पड़े।


आप तो हम अपने स्कूल की समस्या लिखकर नहीं दे सकते हैं और स्कूल में कोई गांव का सामान्य,निर्धन व्यक्ति काम आए तो सब लिखित में चाहिए? 

फिर सब नियम याद आ जाते हैं लेकिन स्कूलों को बेहतर करने के लिए, बच्चों की सुविधाओं के लिए एक अधिकारी के सामने नहीं जा सकते, किसी को लिख कर शिकायतें नहीं कर सकते हैं? 

संगठन की कॉल पर धरना प्रदर्शन में नहीं आ सकते? 


मतलब जो मानसिकता भगतसिंह की फांसी के समय थी, वही मानसिकता ज़्यादा बलवती हो रही है 

कि मरने के लिए कोई और जाए हमें न जाना पड़े।

लेकिन समस्या दूर करने के लिए कोई और आएं।


मुझसे यह बात कहने पर शिकायत बहुत शिक्षकों को है।

इससे जाहिर होता है कि मैं उनके सोए ज़मीर पर थोड़ी दस्तक देने की कोशिश करता हूं लेकिन वह उन्हें बुरी लगती है क्योंकि उनकी नींद में खलल पड़ता है।


सूबे सिंह सुजान




उर्दू ज़बान और प्यार का झूठा प्रोपगंडा

 हमारे देश में कुछ सेक्युलर लोगों का गुप्त ऐजेंडा होता है वह इसे लोगों के मन, बुद्धि, चित्त और संस्कृति, धर्म बदलने के लिए छिपा कर चलाते हैं।

कुछ प्रोफ़ेसर साहब और अपने लेखों में, कविता, कहानी में यह बयान करते हैं कि उर्दू ज़बान प्यार की ज़बान है और फिल्म इंडस्ट्री तो इसमें शुरू से यही कहती है।

तो अब हम पूछते हैं कि 

बाक़ी जुबान तो प्यार के शब्दों में भी गाली देती हैं ?

यह दूसरी भाषाओं को नीचा दिखाने जैसा एजैंडा है लगातार यही कहा जाता है जबकि इस उर्दू में अन्य भाषाओं की अपेक्षा बहुत कम शब्द हैं 

पर्यायवाची भी कम हैं इसमें कोई शक नहीं यह भाषा भारत में ही पनपी,विकसित हुई है लेकिन यह भाषा न तो अनुसंधान की वाहक बन सकी है न इसमें आधुनिकता के साथ साथ चलने की क्षमता है वैज्ञानिकता की तो और भी कमी है परन्तु हम किसी दूसरे के कहने से इसी भाषा को प्यार की भाषा कहते हैं यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है हम किस प्रकार भेदभाव करते हैं यह स्पष्ट पता चलता है लेकिन जब हम सार्थक तथ्यों पर यह बात रखते हैं तो हमीं में से लोग इस तथ्य को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए आगे ऐजेंडा खड़ा कर देते हैं और सच व तथ्य बेमौत मारे जाते हैं सच के ऊपर झूठ को हावी कर देते हैं।

हर जुबान का अपना अपना दायरा है उसका संप्रेषण है लेकिन किसी एक जुबान को कमजोर होने पर भी आवश्यकता से अधिक अनावश्यक महत्व देना उचित नहीं होता है सब भाषाओं को उनके तथ्यात्मक आधार पर तुलनात्मक समीक्षा होनी चाहिए।


सूबे सिंह सुजान 


मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

वामपंथी द्वारा सूबे सिंह सुजान

 वह लोग जिसे असभ्य कह रहे हैं 

एक दिन पहले उसे वही लोग सच्चा बताते हैं?

वही लोग उसे सही ठहराते हैं फिर वही लोग उसे असभ्य कहते हैं ?


इन लोगों की इन हरकतों से पता चलता है 

कि इनको सच का शायद पता ही नहीं है यह एक धूर्तता के शिकार हैं यह सच के विरुद्ध काम करते हैं और मूर्खता को पालते हैं।


यह ग़रीबी के कारण बनते हैं तरक्की को रोकते हैं और लोगों को उनकी गरीबी से बाहर निकालने के सपने दिखाते हैं।


यह लोग कभी कुछ काम नहीं करते पाए जाते हैं यह काम करने वालों के पीछे जरूर पड़े रहते हैं।


यह लोग ख़ुद को बुद्धिमानी का तमग़ा ख़ुद ही देते हैं और इतिहास से साज़िश करते, साहित्य से धोखाधड़ी करते हुए पकड़े जाते हैं।


यह लोग कौन हैं??? 

बताओ? यह लोग कौन हैं? 

#कौन


सूबे सिंह सुजान