शनिवार, 15 जून 2024

और बगीचा उजड़ गया। सूबे सिंह सुजान

 एक बगीचे की देखभाल चार माली करते थे वह हर पौधे को समय पर पानी देते,खरपतवार निकाल कर बाहर करते,खाद देते और पौधे बहुत प्रसन्न थे लेकिन कुछ नये उगे पौधे उन मालियों का मज़ाक़ करने लगे और बोले कि हम आपके बग़ैर भी मज़े में रह सकते हैं आपके अहसान की जरूरत नहीं है और धीरे-धीरे उन मालियों को बाहर निकालने लगे और कुछ भेष बदले हुए शिकारियों से दोस्ती कर ली वह शिकारी बहुत से झूठे प्रलोभन देते थे।

माली अपनी इज़्ज़त को देखते हुए बगीचे से बाहर बैठ गए और कभी कभी बुजुर्ग पेड़ों को सलाह देते थे परन्तु उनकी सलाह नहीं मान कर भेष बदले शिकारियों को इज़्ज़त से बैठाया गया।

उन शिकारियों ने नये पौधों को पैसे, सड़कों को बनाने की सलाह देकर कुछ बुजुर्ग पेड़ों को काटने की सलाह दी और लालच दिया नये पौधे मान गए।एक दिन मौका देख कर उन शिकारियों ने कुछ पेड़ काट दिए और बुजुर्ग पेड़ों की बात नहीं सुनी गई अब बुजुर्ग पेड़ चिल्लाते और उनके बच्चे नये पौधे उनका मज़ाक करते थे लेकिन शिकारियों ने धीरे धीरे बहुत पेड़ काट कर बेच दिए अब कुछेक नये पौधों का नंबर आने लगा कुछ पौधे बोलने लगे तो शिकारियों के चमचे पौधे उन पर टूट कर पड़े। इस तरह अब वह बगीचा उजड़  रहा है और माली दूर बैठे रो रहे हैं और नये पौधे अपनी जान की भीख मांग रहे हैं और कुछ कर नहीं सकते क्योंकि उनमें एकता और समझ नहीं रही और शिकारी बड़े आराम से शिकार करते हैं और पौधों का ही मज़ाक करते हैं।


सोमवार, 3 जून 2024

पेड़ों के प्रति मनुष्य का दोहरा चरित्र।



 आजकल भयंकर गर्मी को देखते हुए लोग पेड़ लगाने की सलाह सोशल मीडिया पर देते हैं सोचनीय व चिंतनीय है कि यह सलाह सब दूसरों को देते हैं स्वयं को कोई नहीं देता है। लेकिन हम लोग स्वयं क्या करते हैं वह इन चित्रों में मैं आपके सामने रख रहा हूं 

हम स्वयं जो करते हैं वह है जो पेड़ वन विभाग ने सड़कों किनारे, नहरों किनारे लगाए हैं उनको इस गर्मी के मौसम में जला देते हैं इस समय उनको पानी मिलने की संभावना नहीं है क्योंकि बरसात नहीं होती और ऊपर से उनको जला देते हैं यह बेहद सोच समझकर निर्णय लिया जाता है अपने वातावरण को शुद्ध करने की जगह हम ऑक्सीजन देने वाले पेड़ पौधों को पनपने से पहले जला देते हैं यह हम वास्तविकता में करते हैं।

हर मनुष्य ही नहीं हर प्राणी की जीने की पहली जरूरत ऑक्सीजन है हम उसको दूषित तो करते ही हैं ऊपर से उसके स्रोत, पेड़ों को ही नष्ट करते हैं यह हमारी समझ प्रदर्शित हो रही है 

हमारे किसान अपने खेतों के पास सड़क किनारे, नहरों,रजबाहों के इर्द गिर्द लगाए गए पेड़ों को आग में जला रहे हैं पहले तो हमने सार्वजनिक जंगल,वन को काटा है और अब जो पेड़ लगाए जाते हैं उनको जलाया, कीटनाशक से,आग से, नष्ट भी करते हैं। 


अनेकों संस्थाएं बनी हैं जो पेड़ लगाए जाने के रिकॉर्ड दर्ज करती हैं हर साल हमने इतने पेड़ लगाए और सरकार से इस काम के एवज में धन उपार्जन करती हैं लेकिन उनके द्वारा लगाए गए कोई पेड़ पौधे वास्तविक स्थिति में उपस्थित नहीं रहते यह ढोंग केवल पैसा इकट्ठा करने का करते हैं जो ऐसी एनजीओ के मालिक हैं वह चार दिन बमुश्किल पेड़ लगाने के चित्र लेंगे और समाचारपत्र में समाचार दर्ज़ करेंगे और सरकार को वह चित्र देकर पैसा लेंगे और धरातल पर शून्य काम दिखाई देता है कितना अभद्र, अशोभनीय, अव्यवहारिक कार्य हम प्रकृति के साथ करते हैं और सोशल मीडिया व समाचार पत्रों में हम व्यवहारिक ज्ञानी स्वयं को सर्वगुण संपन्न प्रस्तुत करते हैं।


सूबे सिंह सुजान 

कुरूक्षेत्र, हरियाणा 


https://youtu.be/MxuHfupYa9Y?si=GVnn3ZhoWjrqfssZ


#पर्यावरण 

#वातावरण 

#savenature

बुधवार, 29 मई 2024

ढोंगी प्रगतिशीलता

 वे स्वयं को प्रगतिशील व मानवता का प्रहरी कहते नहीं थकते थे।

मैंने बचपन से अब तक साहित्य लेखन व साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी की है और साहित्यिक आयोजन स्वयं करवाता रहा हूं और साहित्य संस्था को अग्रणी बनाने में अपनी हर संभव से आगे बढ़ कर कोशिश करता रहा हूं।

कईं दफा वह प्रगतिशील विचारधारा के मित्र मेरे साहित्य कार्य पर भूरि भूरि प्रशंसा करते थे लेकिन 

एक बार जब उनके विचारों के प्रतिकूल विचार सामने रखे तो वह आपा खो बैठे और गालियां देने लगे मैंने उनको याद दिलाया कि आप मानवाधिकारों के प्रहरी हैं लेकिन थोड़ा सा दूसरे को कहने का अधिकार नहीं देते यह कैसा प्रगतिशील व मानवता है?

और उन्होंने गुस्से में अपनी लिखित प्रशंसा वापिस मांगी और पुनः लिखित में आलोचना कर डाली।

अर्थात उनके विचारों के साथ जो बात मेल खाती है वही कहें अन्य कुछ न कहें और यदि कोई कहे तो वह थूक कर चाट लेते हैं।


शुक्रवार, 17 मई 2024

जैसे को तैसा या ऐसे को ऐसा कहिए। दुनिया का कारोबार इनसे ही चलता है


 जैसे को ऐसा। दुनिया का कारोबार जैसे को ऐसा से चलता है। 

जो व्यक्ति जिन गुणों से युक्त होता है उसको वैसा ही पसंद आता है और तभी उनकी ठीक निभाई हो जाती है।

एक चोर को चोरी करते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि इस समय कौन कौन व्यक्ति उसको देख सकते हैं या रास्ते में मिल सकते हैं वह इस बात का पहले से ध्यान रखता है और यदि मिल भी जाएं तो उस समय में उसके जैसे ही मिलेंगे और यदि मिल गए तो उनके दोनों का लाभ इसी बात पर तय होगा कि हमारे काम एक जैसे हैं तो उनका समझौता हो जाता है और इस तरह वे दोनों साझेदार बन कर अपने काम करते हैं और झगड़े से बच जाते हैं।


इसी प्रकार अन्य काम करने वाले सभी लोग अपने अपने गुणों से भरपूर व्यक्ति को ढूंढ लेते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं और सच में इस व्यवस्था से ही दुनिया का कारोबार चलता है यदि एक गुणों के विपरीत प्रभाव वाला व्यक्ति मिल जाता है तो वह उम्र भर लड़ते रहते हैं और मालूम नहीं कब ज़्यादा हानि कर बैठते हैं।


शादी के बाद जितने संबंध विच्छेद होते हैं वह भी एक दूसरे के विपरीत गुणों के प्रभाव के  कारण होते हैं ।

हमें हर समय एकात्मकता की ख़ोज रहती है और हम एकात्मकता की दिशा में चलते हैं शिक्षा यदि एकात्मिक है तो वह मानव के लिए लाभकारी है यदि उसमें विपरीत प्रभाव है तो वह मनुष्य में दुर्भावना पैदा करेगी।

बहुत पुरानी एक कहावत है ।

जैसे को तैसा।

या हरियाणा में कहावत है कि "लंगड़े को खूंडा सौ कौस से टकरा जाता है।"

जिसका अर्थ है कि एक भाव या गुणों वाले व्यक्ति चाहे सौ कौस दूर रहते हैं लेकिन वह आपस में एक दिन मिल जाते हैं क्योंकि उनकी उनसे ही ठीक निभाई हो सकती है अन्य से नहीं हो पाती।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त गुण ही प्रकृति के संचालन में सबसे ज्यादा सहयोगी हैं।

विज्ञान और डॉक्टर कहते हैं कि जिस वातावरण में आप रहते हैं उसी वातावरण में पैदा अनाज, सब्जी,फल आदि उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, लाभकारी हैं।

क्योंकि वह समावेशी हैं वह वातावरण अनुकूल हैं इसी प्रकार मनुष्य के भाव,गुण, आदतें भी समावेशी, अनुकूल ही काम करते हैं। सृष्टि में हर वस्तु, व्यक्ति अलग अलग गुणों से सुसज्जित होकर भी अपने लिए एकात्मकता की ख़ोज में रहती हैं इससे पता चलता है कि परम आत्मा है जो सभी को सम भाव की ओर अग्रसर करती है और सबकी चाह उसी ओर अग्रसर है।


शनिवार, 20 अप्रैल 2024

ग़ज़ल - अपना अहंकार मारना होगा।

 ग़ज़ल -


अपना अहंकार मारना होगा।

हमको हमसे भी हारना होगा।।


हम जुदा किसलिए हुए यारो,

ये भी हमको विचारना होगा।


हम पुरस्कार मेहनतों को दें,

झूठा परदा उतारना होगा।


कुछ न कहना है दूसरों से हमें,

ख़ुद ब ख़ुद को सुधारना होगा।


दूर मत बैठो,पास आ जाओ,

काम बिगड़ा संवारना होगा।


सूबे सिंह सुजान


बुधवार, 17 अप्रैल 2024

सत्य सनातन

 आपको सत्य भी, फिर झूठ दिखाई देगा,

आप जो सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते।।

सूबे सिंह "सुजान"


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

आधुनिक होना मानवता के गुणों के साथ डकोसला मात्र है।


 प्रकृति द्वारा हर चीज़ व हर जीव, निर्जीव, जन्तु, तन्तु सब एक विशेष उपार्जन हेतु निर्मित किए गए हैं।

महिलाओं में विशेष अपने तरह के गुण हैं वह अपने जीवन में सदैव उनका अपने भले या स्वार्थ के लिए प्रयोग करती हैं उसी प्रकार पुरुष भी अपने विशेष गुणों का प्रयोग करते हैं।


ईमान क्या है?

स्वाभिमान क्या है?

बहुत अधिक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए नीच गुणों का प्रयोग करते हैं लेकिन बहुत कम व्यक्ति बचे हैं जो अपने स्वाभिमान के लिए अपनी आत्मा,ग़ैरत कभी नहीं बेचते वरना गैरत बेचने वालों की मंडी में भीड़ लगी है।

जागरूकता क्या है?

मनुष्य अपने जीवन में जितना यथार्थ ज्ञान अर्जित करता है वह उतना जागरूक होता है मनुष्य का जन्म के पश्चात निरंतर जागरूक होने का क्रम जारी रहता है और यह जागरूकता ही हमारे जीवन का लक्ष्य होता है कौन व्यक्ति जितनी जागरूकता प्राप्त करता है वह उतना इस सृष्टि को जान पाता है।


यदि वर्तमान समय में स्वयं को सर्वगुण संपन्न,शिक्षित मानने वाली महिलाएं भी अपने स्वार्थ के लिए अपने महिला होने के कार्ड को कहीं भी खेल पाती हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि यह प्रकृति की देन है वह सर्वगुण संपन्न होने का डकोसला मात्र है जबकि वह स्वाभिमान,ईमान नहीं है वह तो वह छोटे से स्वार्थ के लिए बेच देती हैं। रिश्ते नाते उनके लिए अपने स्वार्थ सिद्ध करने के साधन मात्र होते हैं। इस प्रक्रिया में स्वयं को सर्वगुण संपन्न,शिक्षित, आधुनिक कहना यह स्वयं व समाज के साथ छल कपट ही है। सर्वगुण संपन्न कोई व्यक्ति हो ही नहीं सकता लेकिन यह जो आधुनिकता और माडर्न होने का डकोसला है यह मानवता के गुणों के साथ घिनौना व्यवहार है।


शनिवार, 30 मार्च 2024

विज्ञान केवल जागरूकता का दूसरा नाम है।

 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में हम जो कुछ भी हासिल करते हैं वह हम ख़ोज करते हैं ख़ोज शब्द से अर्थ स्पष्ट होता है कि उक्त वस्तु, विचार, तकनीक की हमने पहचान कर ली है,जान ली है, ख़ोज ली है। लेकिन वह मौजूद तो वातावरण में पहले से ही थी यह ख़ोज हमारी जागरूकता है।

जो लोग, व्यक्ति आम आदमी से हटकर अपनी जागरूकता को बढ़ावा देते हैं वह प्रकृति को ओर ज़्यादा पहचान लेते हैं और यह पहचान लेना ही विज्ञान का दूसरा नाम है।



शुक्रवार, 29 मार्च 2024

आज तक जो हुआ, वही होगा। सूबे सिंह सुजान

 आज तक, जो हुआ,वही होगा।

नाम इसका ही ज़िन्दगी होगा।

हाथ ख़ाली इमानदारी के,

साथ कोई न आदमी होगा।

लूटने वाला,हंस भी लेता है,

सच्चा इंसान ही दुखी होगा।

झूठ से काम कर लिया उसने,

सबको लगने लगा,सही होगा।

इसके आकार पर न जाईये,

आज नाला है कल नदी होगा।


सूबे सिंह सुजान


सोमवार, 11 मार्च 2024

आपसे दोस्ती असाधारण

 आदमी, आदमी असाधारण

हर किसी की खुशी असाधारण।


आपसे दोस्ती असाधारण 

फिर हुई दुश्मनी असाधारण।


सूबे सिंह सु


जान

बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

जन्मदिन मनाना है। ग़ज़ल -सूबे सिंह सुजान

 तेरी खुशी के लिए जन्मदिन मनाना है

तेरी खुशी ही मेरे जीने का बहाना है।


पता नहीं मुझे तारीख़, क्या महीना था,

खुशी की बात है दुनिया में आना जाना है।


तो मास्टर ने ही इक्कीस फ़रवरी लिख दी,

अब उम्र भर इसी दिन को ही आज़माना है।


जो लोग मिलके,बिछड़ने के बाद याद आये,

जरूर उनसे ही रिश्ता कोई पुराना है।


पसंद कर मुझे या नापसंद भी करना ,

मगर यहां किसी का कुछ नहीं ठिकाना है।


ये उम्र भर के लिए बात याद रखना "सुजान"

चला जहां से, वहीं के लिए रवाना है।




सूबे सिंह सुजान

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

सब अपनी ओर रवाना हैं।

 सब जीवों की दिन रात की दौड़ सिर्फ़ अपनी ओर आकर्षित करने की है और इसका वास्तविक रूप परमात्मा है।अर्थात हम सब जीवों की दौड़ परमात्मा की ओर है हमारे रोज़मर्रा के काम, हमारी संस्कृति है वह संस्कृति परमात्मा है हमारे काम क्या हैं? क्यों हैं? हम ही अक्सर इनसे भी अज्ञात रहते हैं हम अपनी संस्कृति को पहचान नहीं पाते अर्थात अपने आप को सटीक जानते नहीं हैं और लगातार बेतरतीब तरीके से दौड़ते रहते हैं।

हम सब जीवन के रेगिस्तान में हैं और पानी के तालाब की ओर प्यासे होकर दौड़ रहे हैं। परमात्मा वह सागर है जिसमें जाकर सब नदियां मिलती हैं हर नदी सागर की ओर बहती है बहना उसकी संस्कृति है यह उसका कर्तव्य है यही उसका जीवन है और यह जीवन  सागर को समर्पित है वह सागर परमात्मा है जीना भी सब जीवों की संस्कृति है, कर्तव्य है और सब जीव अपनी संस्कृति को समर्पित हैं अपने परमात्मा को समर्पित हैं। हम सबको उसी अथाह सागर में मिलना है हमारी उससे मिलने की दौड़ ही हमारा जीवन है।


शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

वैचारिक और बौद्धिक गुंडागर्दी।

 कवि अभ्यास से नहीं हो सकते हैं कवि प्राकृतिक रूप से होता है।

प्रोफेसर होना अलग बात है और कवि होना अलग बात है।

मैंने बहुत से प्रोफेसर को कविता कहते सुना,पढ़ा है उनकी कविता में आत्मीयता, संवेदना मरी हुई होती है ऐसा लगता है शब्दों की बनावट कर रखी है। शब्दों को इधर से उठा कर उधर रख दिया है बहुत कम प्रोफेसर ऐसे होते हैं जिनमें कवित्व होता है लेकिन वर्तमान में जो प्रोफेसर हो गया वह अपने आपको सबसे बड़ा कवि स्वयं घोषित करने का अधिकार समझता है और उनके इस पाखंड में असली कवि दब जाते हैं उनके अधिकार इनकी डिग्रियों की आड़ में दब जाते हैं।

अधिकतर प्रोफेसर लोग लिखना केवल अपना अधिकार समझते हैं यह एक तरह की वैचारिक और बौद्धिक गुंडागर्दी होती है और कभी भी प्राकृतिक लेखन उनसे नहीं हो पाता।

असल में तो प्रोफेसर लोग कबीरदास, तुलसीदास,सूरदास,रसखान,खुसरो,जायसी, रामधारी सिंह दिनकर, निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, ग़ालिब व दुष्यंत कुमार को पढ़ा सकते हैं और सभी संत और जन कवि कभी अपनी डिग्री या दंभ नहीं भरते थे इसलिए वही वास्तविक रूप में जन कवि होते हैं लेकिन प्रोफेसर लोगों के लिए उनको पढ़ाना ही सही काम है लेकिन वह इनको पढ़ाते पढ़ाते स्वंय को प्रचारित करने के लिए लालायित होने लगते हैं और आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते


हैं

कवि प्राक्रतिक होता है।

 कुछ कवि ऐसे होते हैं जो कवि सम्मेलन आयोजित करवाते रहते हैं उनके स्वयं को और अन्य कवियों की प्रतिभा को निखारना आता है वह सबको अवसर देते हैं वह कार्यक्रम के लिए अनेकों प्रयास करते रहते हैं और जब तक कार्यक्रम होता है तब तक वह चिंतित रहते हैं हर प्रकार की देखरेख करने में व्यस्त रहते हैं और स्वयं की रचना को संतुलित रूप से व्यक्त करने में सक्षम इसलिए नहीं हो पाते क्योंकि वह कार्यक्रम की तैयारियां व सुचारू करने को ज्यादा महत्व देते हैं और कार्यक्रम होने के पश्चात उन लोगों से अपनी कमियां सुनने का अवसर मिलता है जिनको उन्होंने कविता कहने का उपयुक्त अवसर प्रदान किया था।यह अपनी खिल्ली स्वयं उड़ाने का काम अति साहसिक लोग ही कर पाते हैं।वह सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते रहते हैं उनको नकारात्मक लोगों के बीच रहना ही चाहिए ताकि नकारात्मक प्रभाव कम किया जा सके। नकारात्मक लोग अपने नकारा गुण को प्रकट करते रहते हैं वह कभी कुछ ऐसा काम कर नहीं पाते जो किसी अन्य के काम आ सके वह केवल सकारात्मकता में कमियां ढूंढने में व्यस्त रहते हैं और सकारात्मक लोग अपनी सकारात्मकता को लेकर बिना थके चलते रहते हैं और यही क्रम जीवन में सदैव चलता रहता है जो कि प्राकृतिक गुण है।


सोमवार, 15 जनवरी 2024

जन्म से हर कोई सवाली है।

 जन्म से हर कोई सवाली है

बुद्धि से कोई भी न ख़ाली है।

उसने पगड़ी अगर उछा


ली है,

फिर तो वो आदमी मवाली है।


सूबे सिंह सुजान

रविवार, 14 जनवरी 2024

वीर सैनिक

 ये

कौन

किसके

लिए लड़े

वीर सैनिक

हर नागरिक

को समझना होगा।


सूबे सिंह सुजान,

कुरुक्षेत्र, हरियाणा।


साहित्य विचार का रथ है


 विचार की आत्मा नव उत्कर्ष, युग चेतन , परिवर्तन है और विचार बुद्धि से निकलते हैं विचार के लिए किसी भाषा का चयन महत्वपूर्ण नहीं है उसके लिए उसका जन्म महत्वपूर्ण है वह किस जगह,किस प्रकार,किस समय व किसके माध्यम से उत्पन्न होगा यह हम तय नहीं कर पाते। लेकिन विचार का जन्म हुआ है उसका हर भाषा में स्वागत होना चाहिए यदि भाषा के आधार पर विचार को छोड़ दिया जाए तो उस विचार को त्यागने वाला ही लाभ से वंचित रहेगा। साहित्य किसी भी विचार का वहन करता है और उसको प्रसारित करता है

साहित्य विस्तृत है वह अनेकों विद्याओं का वाहक है जिसका उद्देश्य विचार को वैश्विक स्तर पर वास्तविक रूप में प्रसारित करना है ताकि जन जन को सत्य जानने का अवसर मिले।

गुरुवार, 16 नवंबर 2023

Darkness and Light both are good

 Darkness is good and light is good.

If you are conscious, there is no difference between darkness and light. If you have attained to knowledge, if you have attained to excellence, if you are virtuous, if you know how to listen, if you have become calm, if you have become fearless, if your fear is gone, then you can see the light beyond darkness and that is what is called knowledge.

Maharshi or saints are said to be those people who have become fearless, who have recognized water and fire, who can see night and day with the same vision, who do not see the difference between life and death, who cannot differentiate between themselves and others, who can see every place with the same vision.


Man expresses his thoughts from time to time, as long as he is unconscious, he adopts different subjects, ideas and what he is influenced by, he adopts it with alacrity, but the next moment another thought influences him, he adopts it. This sequence reveals our unconsciousness i.e. we are acting like an unconscious child We are doing the same activities of life as a child till the age of fifty or eighty We don't have knowledge. We have not seen the activities of life carefully, we have not made the slightest effort to understand the purpose of life.

On the contrary, some saintly people acquire knowledge, and it does not matter to a man imbued with modern material comforts even to call his knowledge hypocrisy, because he understands more of his foolish behaviour and does not react to it.

To acquire knowledge, one does not need others, but knowledge requires oneself and one has to be self - struggling. Being self-motivated is very important. Many books, teachers, intellectuals can facilitate your path for that path but cannot give you knowledge for that you have to be dynamic, struggling. Man's self-possessed ego is his enemy, that enemy is self-possessed, but man does not understand this and keeps blaming others.Modern science can give us the most material comforts, but it cannot give us spiritual beauty, spiritual peace, knowledge, behavior, proper conduct, for this we have to do meditation, spiritual practice ourselves. This is part of the cycle of life.

At one time we consider the ideas as appropriate knowledge but at another time we also discard that idea when we find it better than that, so this is also science. It's not sustainable The process of learning is temporary but what is learned is permanent. That is spiritual beauty which is learned.

A child starts learning as soon as he comes into the world and continues to learn till the end, but the constant change in the materiality of his body is only material, but the Brahma jnana, the spiritual knowledge that he has acquired through this body is in fact true knowledge.


शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

जीवन सत्य ज्ञान, आत्मिक सौंदर्य के लिए आपको ही स्वयं गतिशील, संघर्षशील होना होता है

 प्रकाश भी अच्छा है और अंधकार भी अच्छा है।

यदि आप जागरूक हैं तो अंधकार और प्रकाश में कोई अन्तर नहीं है। यदि आप ज्ञान को प्राप्त कर चुके हैं यदि आप श्रेष्ठता को प्राप्त कर चुके हैं यदि आप गुणग्राही हैं आप सुनना जानते हैं आप शांत हो चुके हैं तो आप निर्भय हो चुके हैं आपका भय समाप्त हो गया है तो आप अंधकार से पार प्रकाश देख सकते हैं और यही ज्ञान कहा गया है।

महर्षि या सन्त वही लोग कहे गए हैं जो निर्भय हो चुके थे जो जल व अग्नि को पहचान गए थे जो रात दिन को एक ही दृष्टि से देख पाते थे वह जीवन व मृत्यु में भेद नहीं देखते वह अपने व दूसरे में भेद नहीं कर सकते हैं जो हर जगह को एक समान दृष्टि से देख पाते हैं।


मनुष्य समय समय पर अपने विचार व्यक्त करता है जब तक वह अबोध है वह तब तक अलग-अलग विषयों, विचारों को अपनाता है और जिससे प्रभावित होता है उसको तत्परता से अपनाता है परन्तु अगले क्षण दूसरा विचार प्रभावित करता है तो उसको अपनाता है यह क्रम हमारी अबोधता को प्रकट करता है अर्थात हम अबोध बालक की तरह क्रिया कर रहे हैं हम पचास या अस्सी वर्ष की आयु तक भी एक बच्चे की तरह ही जीवन क्रियाएं कर रहे हैं हमें ज्ञान की आभास नहीं हुआ है हमने जीवन क्रियाओं को ध्यान से नहीं देखा है हमने जीवन उद्देश्य को समझने का तनिक प्रयास नहीं किया है।

इसके विपरित कुछ सन्त लोग ज्ञान को प्राप्त होते हैं और आधुनिक भौतिक सुख विज्ञान से लथपथ मनुष्य उसके ज्ञान को पाखंडता भी कहता है तो उसको कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि वह उसके मूर्ख व्यवहार को अधिक समझता है और उस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी अन्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ती बल्कि ज्ञान के लिए स्वयं की आवश्यकता होती है और वह स्वयं ही संघर्षशील होना होता है स्वयं ही गतिशील होना अति आवश्यक है। अनेकों पुस्तकें, आचार्य, बुद्धिजीवी उस मार्ग के लिए आपके रास्ते को सुगम तो बना सकते हैं लेकिन आपको ज्ञान नहीं दे सकते उसके लिए आपको ही गतिशील,संघर्षशील होना होता है। मनुष्य के स्वयं पाले गए दंभ, अहम् ही उसके शत्रु हैं वह शत्रु स्वयं पाले गए हैं लेकिन मनुष्य यह नहीं समझ पाता और दूसरों को दोष देता रहता है।आधुनिक विज्ञान हमें अत्यंत भौतिक सुख सुविधाएं दे सकता है लेकिन आत्मिक सौंदर्य, आत्मिक शांति, ज्ञान, व्यवहार, उपयुक्त आचरण नहीं दे सकता इसके लिए हमें मनन, आत्मिक अभ्यास स्वयं ही करना होता है यही जीवन चक्र में समाहित है।

हम एक समय में जिन विचारों को उपयुक्त ज्ञान मान लेते हैं लेकिन दूसरे समय में ही उस विचार को उससे बेहतर मिलने पर त्याग भी देते हैं तो विज्ञान भी यही है यह स्थाई नहीं है सीखने की प्रक्रिया ही अस्थायी है लेकिन सीखा हुआ स्थाई होता है वह आत्मिक सौंदर्य होता है जो सीखा हुआ है।

एक बच्चा दुनिया में आने पर ही सीखना प्रारंभ करता है और अंतिम समय तक सीखता ही रहता है लेकिन उसके शरीर की भौतिकता में जो बदलाव निरंतर होता आया है वह भौतिक मात्र है परन्तु जो ब्रह्म ज्ञान,आत्मिक ज्ञान इस शरीर के माध्यम से उसने प्राप्त किया है वह वस्तुत सत्य ज्ञान है वह ही इस शरीर का उद्देश्य है उसी ज्ञान के लिए ही इस शरीर को धारण किया गया है उस आत्मिक ज्ञान सौंदर्य का आनन्द परम आनन्द है।


सूबे सिंह सुजान






मंगलवार, 19 सितंबर 2023

नज़्म - यह सड़क भी, सड़क नहीं तुम हो।


 नज़्म- यह सड़क भी, सड़क नहीं तुम हो।


तुमसे मिलने के सब बहानों को,

मैंने सड़कों पे रख दिया तन्हा।

हर मुलाकात उस सड़क से है,

देखा था, जिसपे तुमको चलते हुए,

जबकि यह बन गई अनेकों बार,

कितने ढाबे, दुकानें और शोरूम,

खुल गए हैं किनारे बेतरतीब,

और साईन बोर्ड रख दिए हैं

लोगों ने इस सड़क के बीचों-बीच,

पेड़ काटे, दुकानों की खातिर,

बिछ गए जाल,तारों खंभों से,

आज जब मैं गुजरता हूँ यहां से,

मैंने बस स्टॉप की तरफ देखा,

जिसके नीचे मैं देखता था तुम्हें,

कितना जर्जर,दबा हुआ सा है

तुम नहीं आते अब इधर शायद!

हाँ मगर बावजूद इसके भी,

यह सड़क इतनी खूबसूरत है

जो मुझे देख मुस्कुराती है

और फ़िदा हूँ मैं,आज तक इस पर,

यह सड़क भी, सड़क नहीं तुम हो।

!

सूबे सिंह सुजान




शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

आ गई गालियां मेरे हिस्से

 क्योंकि ईमान दोस्त है मेरा,

आ गई गालियां मेरे हिस्से।

शेर अच्छे रक़ीब कहते हैं,

आती हैं तालियां मेरे हिस्से।


सूबे सिंह सुजान

कुरूक्षेत्र

बुधवार, 30 अगस्त 2023

रक्षाबंधन प्रतिज्ञा

 डोर रेशम की नहीं, भाई बहन का प्यार है 

सत्य पथ का साथ दो,कहता यही त्योहार है।

स्वार्थों को छोड़कर, भाई बहन ये सोच लो,

आपसे जुड़कर बनेगा,देश का विस्तार है।

धर्म ही कर्तव्य है,इस अर्थ को पहचान लो,

यह सनातन संस्कृति, संस्कार का आधार है।


सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

शागिर्दों के किस्से किस्त 1


 उर्दू अरूज़ के उस्ताद शायर के तीन शागिर्द उनसे अपनी लिखी ग़ज़ल दिखाने,समझने जाते रहते थे।

एक बार का क़िस्सा बना कि एक पहले से जाने वाले शागिर्द की किसी ग़ज़ल में कुछ कमियां थी, जो कि लगभग हर शायर की ग़ज़ल में किसी न किसी सूरत अरूज़ के नियमानुसार आ ही जाती हैं दूसरे और तीसरे शागिर्द जब भी उस्ताद के पास जाते तो अपना तो कुछ ख़ास लिखा हुआ न होता तो उस्ताद के दिमाग़ को डाइवर्ट करते हुए उनके पहले शागिर्द पर नुक़ता उठाते हुए कहते यह क्या ग़ज़ल हुई जनाब इसमें रदीफ दोष है और फलां फलां कमियां गिनाते और चले जाते।

अपना लिखा कुछ ख़ास होता नहीं था।

जब पहले शागिर्द साहब अपनी धुन में मगन रहते तो उनको फिर तकलीफ़ होती और फिर से कोई नुक्ताचीनी निकालते और अपनी आदतों का विकास कर लेते।

जब उनकी इस आदत के सब्र का बांध टूट गया तो वो दोनों उस्ताद से बोले जनाब उनकी ग़ज़लों में बेइंतहा नुक़्स हैं आप उनको अपनी उस्तादी से खारिज़ करें, हमसे देखा नहीं जाता। उस्ताद बहुत बोले थे कम बोलते थे और उनकी बातों में आ जाते थे लेकिन उसके बाद भी उस्ताद ने अपने शागिर्द को कुछ नहीं कहा तो वे दोनों पहले शागिर्द से मिलकर अपनी साज़िशों की पड़ताल करने लगे बोले - पता चला है कि आपको उस्ताद ने आपको अपनी उस्तादी लिखने से मना कर दिया? यह सुनकर उसको अचंभा हुआ वह भी अपने उस्ताद की तरह भोला भाला था और दांव पेंच समझता नहीं था और सीधा यही सवाल उस्ताद से किया, उस्ताद बोले वह लोग यह ज़िक्र कईं बार कर चुके हैं अब आप देखो क्या करें?

उसने कहा जो हुक्म आपका आदरणीय मेरे सर माथे।

उस्ताद साहब एकदम विचलित से हुए बोले नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है यह उनकी बात है। शागिर्द बोले आदरणीय आज एक बात मैं भी कहने की गुस्ताख़ी कर सकता हूं?

बोले - कहिए कहिए -वह जो फलां क़िताब है जिसमें एक हम शागिर्द ने आपकी हू ब हू कुछ ग़ज़लें उठा कर प्रकाशित कर रखी हैं और दूसरे ने पाकिस्तान के शायरों के मिसरे उठा कर आपको ग़ज़ल सुना रखी हैं तो मेरी अपने ख्याल की ग़ज़ल में कुछ कमियां आई हैं जो सीखने के सही मापदंड हैं तो क्या मुझे सज़ा जायज़ है तो जरूर दीजियेगा।

यह सुनकर उस्ताद सदमे में आए बोले उनकी पुस्तक में मेरी ग़ज़ल?

उसने कहा जी हजूर कुछ में आपके मिसरे हूबहू दर्ज हैं तो कुछ तो पूरी की पूरी ग़ज़ल कॉपी पेस्ट है वह बोले ऐसा कैसे हो सकता है? उसने कहा अभी देखें और उन्होंने पुस्तक उठाई और शागिर्द ने दिखाया तो उस्ताद सदमे में आए!!!

हद है ऐसा भी हो सकता है!!!

ओह ओह!

और बोले आपसे मुआफ़ी चाहता हूं कि उनके कहने में आकर आपके बारे में मैंने ऐसा सोचा।


सूबे सिंह सुजान

कुरूक्षेत्र हरियाणा 



सोमवार, 7 अगस्त 2023

गंदे चुटकले सुनाने वाले कवि नहीं नंगे व गंदे लोग होते हैं इनसे बचिए


 कवि सम्मेलन में जो लोग चुटकुले सुनाते हैं वह स्वयं ताली बजाने के लिए भी कहते हैं और जो लोग उनकी बात मान लेते हैं अर्थात अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं किया और सुनकर हँसते हैं एक तो जो व्यक्ति चुटकुले सुना रहा है वह स्वयं को कवि बता रहा है जबकि वह कवि नहीं है और हम सब जो वह कह रहा है वह मान लेते हैं इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है कि वह व्यक्ति चुटकुले ऐसे सुनाता है कि उनमें कहीं भी कोई बात,तथ्य, विचार,तर्क,संभावना नहीं है सिर्फ वह फुहड़ता,गाली, लड़कियों व लड़कों के जननांगों पर गाली द्विअर्थी संवाद में देते हैं और लड़कियां वहां बैठी हुई बहुत हंसती हैं वह ख़ासतौर पर औरतों पर नंगेपन के चुटकुले सुनाते हैं और हम बिना समझे हंस रहे हैं।

हास्य-व्यंग्य बहुत सकारात्मक और सटीक विधा है आप हास्य व्यंग को कबीरदास,दुष्यंत कुमार,धूमिल और न जाने कितने असंख्य शायरों की शायरी में देख सकते हैं लेकिन उनमें कहीं भी फुहड़ता,नंगापन नहीं है लेकिन अत्यधिक चिंतित करने वाली बात यह है कि हम वही लोग वहां बैठकर कैसे हंस लेते हैं जो हमारे ऊपर, हमारी संस्कृति, संस्कार, विश्वसनीयता पर हमला होता है हमें उसको सहन ही नहीं करना था लेकिन हम हंस रहे हैं?


कवि वह होता है जो काव्य के माध्यम से आपकी बुद्धि का योग करवाता है जो आपकी बुद्धिमत्ता को प्रखर करता है आपकी बुद्धि को खेल खिलाता है ताकि वह स्वस्थ रहे

और इसके लिए नये विचार या पुनः विचारों को अभ्यास में लाना या बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना होता है सामाजिक,देशकाल, व्यवहार, प्रेम, मनोरंजन, श्रृंगार,सदाचार, भक्ति,जीवनशैली,जीवन तत्वों के बारे सटीक बौद्धिकता को जागरूक करता है। 

यदि हम कुछ समय के लिए उच्च विचार विमर्श को सुनना शुरू करेंगे तो हमें उसमें आनंद भी आएगा और ज्ञान अर्जित भी होगा। उच्चता, श्रेष्ठता को समझने में आनंद है जो उच्च बुद्धिजीवी होते हैं वह गहरी अर्थपूर्ण कविता, ग़ज़ल, कहानी को सुनना व कहना पसंद करते हैं जो लोग केवल गंदे चुटकले पर हंसते हैं या सुनाते हैं वह दोनों प्रवृति के लोग निम्न चरित्र को अपनाना और प्रस्तुत करना पसंद करते हैं।


सूबे सिंह सुजान 


सोमवार, 3 जुलाई 2023

किसान खेती और पशुपालक दूध उत्पादन करना छोड़ देंगे

 बकरी, भेड़,गाय, भैंस पालकों को दूध उत्पादन करने पर, उसके उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिलता है और किसान को अनाज पैदा करने पर उसका उपयुक्त मूल्य नहीं मिलता है या कहें कि उत्पादन में लागत ज्यादा आ रही है।

यह दोनों लोग हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकता पूरी करते हैं और इसके लिए समाज को सबसे पहले उपयुक्त खर्च करना चाहिए।

लेकिन सब कुछ इसके ही विपरीत होता आ रहा है।

समाज का बुद्धिजीवी वर्ग जिसे हम पढ़ा लिखा मानते हैं वह इस तथ्य को या तो समझता नहीं है या जानबूझकर नाटक करता है और इन दोनों लोगों का शोषण करता है।


दूध उत्पादक और अनाज उत्पादक जो अपनी मेहनत शुद्ध वस्तु को तैयार करने में लगाता है हमारा समाज उसको सही मूल्य कभी नहीं देता लेकिन जो इनसे दोनों वस्तु लेकर बीच में मिलावट करता है,उसे अशुद्ध करता है उसको मूंहमांगी कीमत सहजता से दे देता है।

इस कारण कुछ सदियों से यह दोनों उत्पादक अपनी पीढ़ियों से यही काम करवाते करवाते वर्तमान तकनीकी युग में अत्यधिक अनुपयोगी खर्च से अपनी क़मर तोड़ चुका है और समाज इस तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं देता या जानबूझकर शोषण करता है।

इसके परिणामस्वरूप भविष्य में पूरे विश्व में संभव है कि यह दोनों वर्ग खेती करना व दूध उत्पादन करना छोड़ रहे हैं वर्तमान समाजिक परिस्थितियों से अवगत होता है कि इन वर्गों की युवा पीढ़ी विदेश गमन बहुत तेजी से कर रही है और जो यहां पर हैं वह अपने पुस्तैनी काम छोड़ रहे हैं इससे प्रतीत होता है कि कुछ समय पश्चात खेत ख़ाली रहेंगे और पशु उस ज़मीन में चरा करेंगे यह प्रकृति की प्रतिध्वनि प्रक्रिया है और अब धरती वापिस लौटना चाह रही है और यह बहुत आवश्यक भी है सृष्टि को सामंजस्य स्थापित करने के लिए यह करना पड़ता है यह स्वाभाविक व स्वचालित प्रक्रिया है

इस मंथन में हमें यह पता चलता है कि जो वर्ग पढ़ा लिखा माना जाता है या कहें कि वही यह स्वयं घोषित करता है वह प्राक्रतिक प्रक्रिया में मूर्ख ज्यादा प्रतीत होता है क्योंकि वह अत्यधिक स्वार्थी है।

बुधवार, 21 जून 2023

सनातन ही जीवन की उत्पत्ति है

 जीवन की उत्पत्ति में अलग अलग तत्वों का समावेश है इसलिए सनातन संस्कृति में प्रारंभ से पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश को देवता और देवी के रूप में पूजा जाता है यहां पर पूजने के अर्थ यही हैं जो इतना श्रेष्ठ या उत्तम है कि उसका कोई दूसरा विकल्प हमारे पास नहीं है इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम है।उसका वरण करना जीवन को अपनाकर उसको नमस्कार करके धन्यवाद ज्ञापित किया जाना चाहिए यह कृतज्ञ होना है।

इसके अर्थ अपने आप में एकदम स्पष्ट व सटीक हैं वह अलग बात है कि हम कालांतर में यह विस्मृत कर गए या हमें किसी स्वार्थ वश किसी ने किसी नदी की तरह बांध बना बना कर अलग-अलग दिशाओं में नहर बना कर मोड़ दिया गया था और हम सटीक तथ्य को ही विस्मृत कर गए।

लेकिन दूसरी जगह यदि आप दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि एक व्यक्ति, विचार को ही प्रमुखता दी जाती रही है और एक को ही श्रेष्ठ माना गया है और एक का जहां भी विस्तार होगा वह अहम, अहंकार, घमंड और अत्याचार से भरा होगा।

सत्य है कि जीवन एक तत्व से नहीं चल सकता है सभी तत्वों का समावेश ही जीवन है। लेकिन हैरत है कि जब हम सभी तत्वों के समिश्रण से जी रहे हैं तो भी एक को श्रेष्ठ मानते रहते हैं यह वास्तव में घोर मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

सोमवार, 19 जून 2023

संघर्ष बनाम पेंशन

 पुरानी पेंशन बहाली संघर्ष समिति साइकिल यात्रा हरियाणा में निकाल रही है जब एक दिन हम भी उसमें भाग लेने गए तो आँखों देखा हाल बयां करने से न रहा गया। संगठन के तमाम पदाधिकारियों ने कहा था कि हम तीन से चार हज़ार लोग स्वागत में खड़े होंगे लेकिन सामने जाकर देखने पर पता चला कि वहां पेंशन की मांग को लेकर अत्याधुनिक तकनीक से लैस वाहन ज़्यादा संख्या में खड़े थे इसके विपरीत लोग बहुत कम थे ऐसा लगा कि जैसे पुरानी पेंशन इन वाहनों, कार, मोटरसाइकिल,एक्टिवा व बड़े बड़े बंगले व कोठियों को चाहिए और इसलिए ये वाहन अपनी मांग करने के लिए जुटे थे। लोगों में एक प्रतिशत महिलाएं थी और नियानवें प्रतिशत घर पर उन एक प्रतिशत का मज़ाक़ उड़ाने में मशगूल रही। पुरुष की संख्या भी 8 प्रतिशत के आसपास रही और सभी सम्मानित पदाधिकारी अपने अपने मन में राजनेता होने का भ्रम और अहम दोनों पालकर सीने को फुला कर चल रहे थे तो वहीं जितने लोग स्वागत में खड़े थे वह केवल अपनी अपनी फोटो उतारने के लिए जद्दोजहद में ज्यादा मशगूल थे जैसे ही फोटो उतरी तो उनका पता नहीं चलता था कि किस रास्ते से गए हैं कुछ फोटो सोशल मीडिया पर ऐसी भी दिखाई दी जो अपने घर के आसपास ही ली गईं थीं और स्टेटस पर जगह पा रही थी लेकिन इसके बावजूद जितने भी लोग पहुंचे सब पेंशन योजना लागू होने से आस्वस्त दिखाई दे रहे थे। इस क्रम में विपक्षी दलों के एम एल ए व नेता आकर बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे उनको जैसे घर बैठे सर्वोत्कृष्ट व्यंजन मिल गया था और हम सब पेंशन योजना लागू होने की खुशी में देर रात तक घर लौटते हुए अपनी भूमिका पर बहुत खुश हो रहे थे।

शुक्रवार, 26 मई 2023

ग़ज़ल - मंच पर चुटकुले सुना देना

 मंच पर,चुटकुले, सुना देना,

चुटकुलों को, ग़ज़ल बता देना।


मेरी यादों को तुम,जला देना,

और फिर ख़ाक को उड़ा देना।


कितना मुश्किल है,याद करना भी,

दर्द की आग को हवा देना।


कीजिए कुछ इलाज़, मेरे हकीम,

मैंने, ग़म खा लिया,दवा देना।


तेरा ग़म, एक गीला कचरा है,

कुछ, सुखाकर,इसे जला देना।


चापलूसी में, कितना मुश्किल है,

ग़ल्तियों पर कोई सज़ा देना।


इस तरक्की में, लोग भूल गए,

दूसरों को भी रास्ता देना।


सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 18 मई 2023

हज़ारों पेड़

 हज़ारों पेड़ परेशान आँधियों को देख,

ग़रीब चूल्हा मगर इस खुशी में झूम उठा।


सूबे सिंह सुजान 

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

कैक्टस और टेसू ने कठोरता और गर्मी को चुना है

 कैक्टस के फूल की अपनी ही तरह की, अपनी ही मर्जी की ख़ूबसूरती है उन्होंने खिलने का मौसम भी ऐसा चुना है जिसमें मौसम परिवर्तन होता है और फ़सल पक कर कटती है लेकिन इस दुनिया में बैसाखी पर्व पर इस फूल से बेहतरीन ख़ूबसूरती भी देखी जा सकती है और इस मौसम अनुसार कपड़े पहनना और रंगों का चयन करना यह क्या कम खूबसूरत होगा। यह देखकर कईं बार हम आह भरकर रह जाते हैं और खूबसूरती को मुखरित नहीं करते लेकिन पहचान लेते हैं।


दूसरे टेसू, अर्थात पलाश ने भी यही मौसम चयन किया है वह ढाक के पेड़ पर खिलता है ढाक का पेड़ देखने में अन्य पेड़ के सामने उतना सुन्दर नहीं है लेकिन उसके टेसू देखते ही बनते हैं उसका रंग कितना चटक, कितना तीखा होता है ढाक की कणी अर्थात गोंद भी लगभग इसी रंग में होती है और उसका आयुर्वैदिक गुण और भी लाभदायक होता है। 

लेकिन दूसरी ओर कैक्टस भी कांटे लिए होता है उसको हाथ लगाना बहुत मुश्किल है अर्थात बेहद खूबसूरत फूल की रक्षा में पहरेदार कांटे ही होते हैं प्रकृति ने हर जगह ऐसा ही बनाया है क्योंकि कठोरता ही सुंदरता की बेहतर सुरक्षा कर सकती है शायद मंदिरों में पत्थरों को सुरक्षा के लिए लगाया गया है यह भी प्रकृति का निर्णय होगा।


सूबे सिंह सुजान 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

फितरत

 *फितरत*


लोगों को काम करवाने के लिए जो व्यक्ति अच्छा लगता है लेकिन पुरस्कार देने के लिए वो नहीं चाहिए क्योंकि पुरस्कार तो ख़ुद के लिए चाहिए।

लेकिन उनकी तो फितरत है जिनको अपने कसीदे पढ़ते हुए शर्म नहीं आती कि काम कुछ किया नहीं होता और अपनी बढ़ाई अपने मुंह कर रहे होते हैं परन्तु उनकी क्या मज़बूरी है जिनको पुरस्कार देना है और जबकि काम जिनको कहा उन्होंने किया नहीं और जिसने किया है उससे बात तक करने में परहेज़ रहता है?


आदमी इस तरह स्वार्थी होता है और इस स्वार्थ में लिप्त रहते उसको सही व ग़लत में फ़र्क नज़र नहीं आता।

और प्रकृति अपना काम करती रहती है हम प्रकृति में कमियां ढूंढते रहते हैं जबकि कमियां पाती नहीं हैं परन्तु आदतन अपने आपको बेहतरीन कहने के आदी होते हैं।

गुरुवार, 23 मार्च 2023

सवाल भी हमीं हैं जवाब भी हमीं हैं।

 सारे सवाल हमें स्वयं से करने थे लेकिन हम सारे सवाल दूसरों से करने में समय नष्ट करते रहते हैं।

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सारे जवाब भी हमें ही देने थे

लेकिन हम दूसरों से मांगने में समय नष्ट करते रहते हैं।


वे लोग असली अपराधी हैं

जो ग़लत मानसिकता को तैयार करके मानव से मानवता,

समाज से सामाजिकता,

वातावरण से स्वच्छता,

राष्ट्र से राष्ट्रीयता,

प्रेमी, प्रेमिका से प्रेम,

व्यवहार से व्यवहारिकता,

हृदय से सहृदयता,

आग से उष्णता,

जल, वायु से निर्मलता,

ऐसी अनेक वस्तुओं से उनके होने का विशेष गुण अपने स्वार्थ के लिए विशेष रूप से छीन रहे हैं।


विज्ञान हमने नहीं बनाया है अपितु प्रकृति की प्रक्रिया में मौजूद है हम उसे जानने के प्रयासों में रत हैं और वर्तमान में हम शीघ्रता से जान पा रहे हैं।


©सूबे सिंह सुजान

रविवार, 12 मार्च 2023

लघुकथा - आशीर्वाद

 स्कूल का एक शिक्षक अपनी प्रधानाचार्या डॉ ममता को उनके द्वारा कक्षाओं में भेजे गए हिन्दी भाषा में लिखे नोट में आशीर्वाद शब्द की वर्तनी में मात्रा की त्रुटि बता रहा था और प्रधानाचार्या महोदया उस त्रुटि को यह कहकर सही बता रही है कि मैं हिन्दी साहित्य में पी एच डी हूँ। मुझसे गलती हो ही नहीं सकती लेकिन उस शिक्षक ने उक्त मात्रा को सही करके लिख दिया और अपनी कक्षा में पढ़ाने लगा।


सूबे सिंह सुजान


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

बहुत मसरूफ़ होकर याद उसकी भूल जाता हूं

 लगाना हाज़िरी हर रोज़ अपनी भूल जाता हूं।

बहुत मसरूफ़ होकर याद उसकी भूल जाता हूं।


समझ बैठा, महब्बत में तुम्हारी, कुछ महब्बत है,

ज़माने ने,मगर कर ली तरक्की भूल जाता हूं।


सूबे सिंह सुजान


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

जो अज्ञानी है वह सवाल करता है

 जिस बात को, गुत्थी को जब आदमी जान लेता है या समझ लेता है तो फिर उसके बारे किसी से सवाल नहीं करता।

जिस प्रकार बच्चा जब तक जिस चीज़ को नहीं जान लेता तब तक वह बार बार पूछता रहता है और जान लेने के बाद दुबारा पूछता नहीं।

हर ज्ञान की बात इसी प्रकार हैं।


इसी प्रकार भगवान है जब तक मनुष्य उनको जान नहीं लेते तब तक लगातार प्रश्न करेंगे और जो जान लेते हैं वह प्रश्न करना बंद कर देते हैं।

इस प्रक्रिया में हमारे ज्ञान, बुद्धि का भी पता चलता है कि हम कितना समझ सकते हैं और कितना नहीं क्योंकि प्रकृति सबके लिए समान रूप से व्यवहार करती है

सूरज कभी अपनी धूप अलग अलग नहीं देता, फूल खुश्बू सबको बराबर देते हैं यह लेने वाले पर निर्भर है वह किस प्रकार ग्रहण करता है किसी को खुश्बू आते ही आत्मविभोरता प्राप्त होती है तो कोई उसमें मीन मेख़ निकालता रह जाता है वह खुश्बू को उसकी सार्थकता में ग्रहण नहीं कर पाते और आलोचना में समय नष्ट करने लगते हैं।

अर्थात अज्ञानी ही हमेशा सवाल करते हैं और ज्ञानी उनके जवाब देते हैं।


बेसबब दिल में दर्द भर आया

 बेसबब दिल में दर्द भर आया

मुझको कोई नहीं नज़र आया


बेवजह लाद ली थी चेहरे पर,

मुस्कुराहट उतार कर आया।


शुक्रिया आपने दिए धोखे,

मुझको गुस्सा न आप पर आया


दिल लगाना बहुत जरूरी है,

होश भी दिल लगाने पर आया।


ए ख़ुदा इसकी भी ख़बर ले ले,

तेरे दर एक बेख़बर आया।


मेरा बिगड़ैल दिल भटकता था,

ठोकरें खा के राह पर आया।


है शुरुआत मुश्किलों भरी,

आगे आगे सहल सफ़र आया।


सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

प्रकृति करती है

 सब काम प्रकृति करती है। मनुष्य जितने भी काम करता है वह सब प्रकृति की प्रक्रिया पर करता है वह सब काम प्रकृति का हिस्सा है।

मनुष्य जितने काम करता है जैसे काम करता है प्रकृति उसको वैसा ही परिणाम देती है।

बुधवार, 11 जनवरी 2023

पूर्ण ही अपूर्ण है और अपूर्ण ही पूर्ण है।

 मैं यह सोच कर कविता लिखता हूं कि कुछ नया कह पाया, फिर अगले दिन, फिर कोई और कविता लिखता हूं लेकिन हर बार यह सोचकर लिखा कि जो मेरे अंदर लिखने की, कहने की प्यास, भावना है वह लिख सकूं,कह सकूं परंतु यह क्रम चलता रहता है जो अधूरापन है वह पाटने की कोशिश लगातार चली है लेकिन क्या वह कभी पूरी हुई? कभी नहीं।

यदि मैंने कुछ अच्छा सा कह लिया और कुछ समय यह अहसास होता है कि बस यही सबसे बेहतर है इससे आगे कुछ नहीं कह सकता, लेकिन फिर कुछ समय बाद वही कहने की प्यास, उतावलापन उभर आता है।

दुनिया में जाने कितने ऋषि,संत, कवि, लेखक अपनी अपनी बात कहते हुए चले गए सब इसी क्रम में कहते रहे और वह प्यास,भूख आज भी कायम है और रहेगी।

यही जीवन है यह जीवन जीने का, चलने का, क्रम निरंतर जारी है और रहेगा।

हम सब प्यासे हैं और प्यासे ही रहेंगे जब लोग कहते हैं कि प्रेम में तुम्हें पाकर मैं सब कुछ पा लूंगा, मुझे तू चाहिए और कुछ नहीं वह पागलपन एक प्यास है वह व्यक्ति कुछ समय बाद फिर उससे ऊब जाता है और हर जगह देखता है और तो और उससे छुटकारा चाहते हैं और फिर कुछ और चाहता है फिर वही प्यास है।

यही क्रम जन्म लेने और मरने का है हम सब जन्म लेते हैं और उसके बाद सब चाहते हैं कि हम कभी न मरें,कभी न बीमार हों सारी तरह की विधि,योग,विज्ञान,औषधी अपनाते हैं लेकिन आखिर मर जाते हैं हमारा जन्म कुछ पाने की लालसा है एक प्यास है लेकिन यह कभी पूरी नहीं होती लेकिन जो बीच का क्रम रहा वह हमें पता है वह पता भी तभी तक है जब तक हैं आगे क्या होगा नहीं पता।

हम सब अधूरे हैं हम सब प्यासे हैं हम सबने जन्म लिया है,हम सब मरेंगे हम सब पूर्ण हैं मगर हम सब अधूरे हैं।

हम आकाश हैं जो न शुरू का पता न अंत का पता,हम सब गिनती हैं जहां से मान लिया कि एक से शुरू हुई बस वहीं से शुरू हो गई ख़त्म कहां होगी हमें नहीं पता 

हम सब खिलने वाला फूल हैं जो खिलेगा,जो खिल चुका है,जो बिखर चुका है,जो विलीन हो गया है।

सब साहित्य अधूरा है सब विज्ञान अधूरा है भूख अधूरी है रास्ते अधूरे हैं,सब भगवान पूरे हैं और सब भगवान अधूरे हैं।


मैंने हल्दी की गांठ को लगाया और उससे अनेक हल्दी की गांठ बन गई यह हल्दी की गांठ कहां से आई थी क्या यह गांठ कभी ख़त्म हो गई तो क्या फिर हल्दी नहीं उग सकेगी? 

यह हल्दी अधूरी है यह बार बार लगाई जायेगी और काटी जाएगी मगर यह फिर भी उगेगी।

अनंत ही पूर्ण है अनंत ही अपूर्ण है।


सूबे सिंह सुजान 

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

हमीं ने हमीं को परेशान करके

 हमीं ने, हमीं को परेशान करके

ज़माने को छोड़ा है हैरान करके।


हमीं को समस्या का हल चाहिए था,

हमीं चल पड़े उसको अनजान करके।


उन्हें अपनी कीमत को समझाया ऐसे,

दिखाना पड़ा हमको बलिदान करके।


महब्बत समझ में नहीं आई मुझको,

बहुत दुःख हुआ तेरा अरमान करके।


मेरे दर्द सारे हवा हो गए हैं,

खुशी जो मिली, आपका ध्यान करके।  


सूबे सिंह सुजान 




सोमवार, 19 दिसंबर 2022

स्वतंत्रता की सारी कोशिशों के बावजूद

 स्वतंत्रता की सारी कोशिशों के बावजूद हर कोई किसी न किसी के अधीन होता है। जब मनुष्य अपने आप को बिल्कुल आजाद करने में सफल कर पाता है तो वह फिर लौटकर आता है और किसी न किसी के आश्रय में जाकर ज़्यादा संतुष्टि पाता है। 


सूबे सिंह सुजान

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

सृजनात्मकता और ग्रहणशीलता अलग अलग हैं।

 जब एक चित्रकार अपनी कूची से किसी नये चित्र, नयी शक्ल या भाव भंगिमा को जन्म देता है तो यह एक तरह का माँ की तरह नयी कृति का जन्म होता है इसी को सर्जनात्मकता, बुद्धिमत्ता कहा जाता है।


और यदि एक अच्छा गणित या भाषा शिक्षक अच्छा पढ़ाता है तो वह अच्छा ग्रहणकर्ता है परन्तु बुद्धिजीवी नहीं है क्योंकि उसने प्रखरता के साथ ग्रहण किया है सृजन नहीं किया है।

लेकिन आज के दौर में इस ग्रहणकर्ता को बुद्धिजीवी मान कर इसकी ज्यादा सुनी व मानी जाती है और यह इस सहारे अच्छा व्यापार करता है।

सूबे सिंह सुजान 

शनिवार, 12 नवंबर 2022

वाचन शक्ति चैनल को सब्सक्राइब करें

 https://youtu.be/v6OOKWoCgDc

इस शेर पे ताली तो बनती है।👌👍🙏

😃🤭😃 डॉ के के ऋषि साहब से रुबाई, ग़ज़ल के साथ साथ मुशायरों पर कुछ चुनिंदा बातें सुनिये।

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धन्यवाद

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

हमें खेत जंगल बनाने पड़ेंगे। सूबे सिंह सुजान

 धुआं जम गया है, हवा की कमी से।

कोई जैसे नाराज़ है ज़िन्दगी से।।


न अब धूप अच्छी न मौसम खुला है,

गगन को,धरा को, ढका है नमी से।।


हवा,आग, पानी खफा हो गए हैं,

शिकायत है आकाश को आदमी से।


हमीं ने बनाये, उदासी भरे दिन,

कि मौसम मिले आज बेमौसमी से।


हमें खेत जंगल बनाने पड़ेंगे,

हमारी हवा ठीक होगी उसी से।


सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

मनुष्य का क़िरदार कम से कम मौसम की तरह तो होना चाहिए।

 मनुष्य का किरदार,

    हर व्यक्ति हर स्थिति में स्वयं को परिभाषित करता है वह जहां जब जैसे विचार प्रकट करता है समाज के बारे अन्य व्यक्तियों के बारे में उस समय में वह अपने विचारों को ही परिभाषित करता है वह चाहता है कि ऐसा हो वैसा हो उन सब बातों में उसके अपने विचार होते हैं वह अपनी बात को लागू करवाना चाहता है मनुष्य का किरदार इस प्रकार का है लेकिन हम अपनी सुविधानुसार बदलते रहते हैं यह कई मायनों में ठीक हो सकता है परंतु मनुष्य का किरदार इतना तो रहना चाहिए जैसे एक फल है आम का फल जब तक उसे ठीक प्रकार से पकने का अवसर मौसम स्थिति चाहिए वह उसके लिए आवश्यक है अति आवश्यक है यदि हम फल पकने के समय से पहले ही उसको तोड़ दे या मौसम को बदल दें तो वह फल अपनी मिठास अपने प्राकृतिक रूप में नहीं पक सकता अर्थात हमें इतना समय यथा स्थिति में अवश्य बिताना होगा की एक कार्य पूर्ण हो सके उस कार्य के जो लक्ष्य हैं उनको प्राप्त किया जा सके।

मनुष्य को कम से कम मौसम की तरह तो रहना चाहिए, जितना समय मौसम अपने परिवर्तन में समय लेता है वह यथा योग्य है वह अचानक नहीं बदलता,वह वातावरण को साथ लेकर शैन शैन बदलता है।

 मनुष्य को गिरगिट की तरह नहीं बदलना चाहिए यह कहावत इसीलिए कहीं गई है कि एक कार्य को पूर्ण होने दिया जाना जरूरी है हमें अपने किरदार में अपने जमीर को इतना तो यथास्थिति बनाए रखना होगा वही हमारा सत्य होगा एक मौसम के अनुसार हमें फल के पकने का इंतजार तो करना होगा इसी प्रकार मनुष्य को अपनी आदतों में सामाजिक ढांचे में तब तक अपना किरदार वस्तुस्थिति में रखना चाहिए जब तक वह कार्य संपन्न हो जाए जब तक वह वादा पूरा हो जाए जब तक वफा निभा दी जाए ।


©सूबे सिंह सुजान

सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

वायु प्रदूषण और दिल्ली के लोग

 दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है सोशल मीडिया पर लोगों को चिंता हो रही है ।


यह वास्तव में बढ़िया मजाक है ।


हम कितने भोले बनते हैं कमाल है ।

प्रकृति का नियम है कि जैसा करोगे वैसा ही परिणाम मिलेगा 

क्या हमने अब तक यह भी नहीं सीखा?


डिग्रियाँ तो बहुत हैं हमारे पास??


व्यवहार बिल्कुल नहीं है?


दिल्ली जैसे बड़े शहर के लोगों का प्रकृति से कोई वास्ता ही नहीं है तो उन्हें कैसे पर्यावरण की जरूरत महसूस हो गई जब पूरा दिन रात आप सब लोग मशीनों में रहते हैं आपको गाँवों से बदबू आती है आपको जंगल अच्छे नहीं लगते आपको खेतों में काम करने वाले किसानों से दिक्कत है आप किसानों को मूर्ख मानते हैं तो आपको मुफ्त में मिलने वाली हवा ही क्यों चाहिए?

जब आप कार,ए सी, गैसा सब कुछ पैसे से ले सकते हैं तो हवा भी लीजिए न????


प्रकृति के साथ रहने वाले लोग आपको गंवार लगते हैं तो आप शुद्ध वायु किससे माँगते हैं?

जब आप रहते ही ऐसी जगह पर हैं जहाँ आप केवल कार्बनडाई आक्साइड पैदा करते हैं आपका लेश मात्र भी सहयोग नहीं है ऑक्सीजन के लिए तो आप किस हक से माँगते हैं?

आप जब केवल प्रकृति को नष्ट करने के कार्य करते हैं तो आप किस हक से शुद्ध वायु माँगते हैं और दोष किसान को देते हैं जो आपके पेट भरने के लिए अनाज पैदा करता है और वो भी आप उसको उसकी मेहनत का पूरा दाम नहीं देते जबकि कंपनियों को आप हर चीज का पूरा दाम देते हैं ??

और वह कंपनी आपको खाद्य पदार्थों में मिलावट करके भी दे तो आपको उस कंपनी पर भरोसा है लेकिन किसान पर नहीं होता ??


हमें अपने व्यवहार में बदलाव की जरूरत है न कि दूसरों से शिकायत की ।

घूमती रहती है अपने इश्क में वो हर घड़ी

ग़ज़ल 

वो तो कहते हैं,ये दरवाजा कभी खुलता नहीं।

और सच ये है, कि उसने खोल कर देखा नहीं।।


घूमती रहती है अपने इश्क में,वो हर घड़ी

इस ज़मीं की आदतें सूरज कभी समझा नहीं।


आँख से आँसू का बहना है जरूरी दोस्तों,

जो कभी बहता नहीं,कहते उसे दरिया नहीं ।


हर ग़ज़ल कविता में उसकी बात गहरी होती है,

उसको ये लगता है, मैं उसको कभी लिखता नहीं।


बोलता तो है वो अब, मैं इसलिए ख़ामोश हूं,

जब तलक मैं बोलता हूं,वो मेरी सुनता नहीं।


ज़िन्दगी भर जैसा चलता है,सफर चलता रहे,

सब मुसाफिर मारे जाते हैं,सफर मरता नहीं।



©®सूबे सिंह सुजान, कुरूक्षेत्र हरियाणा


सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

राम रोज़ जन्म नहीं लेते, हां रावण रोज़ जन्म ले लेता है।

 पतन तो सहज है।उत्थान सहज नहीं है।

रावण रोज़ जन्म लेता है,राम रोज़ जन्म नहीं लेता।

राम के लिए हमें क्षण क्षण परिश्रम करना करना होगा। लेकिन हम तत्परता से,तत्लीनता से, निरंतर परिश्रम नहीं कर सकते, ध्यान से, भक्ति से, इसलिए राम जन्म नहीं ले पाते,रावण हमारे आराम, सुविधा से जन्म लेता है और हम हर रोज़ सुविधा बढ़ाने में लगे हैं अर्थात रावण को जन्म लगातार दे रहे हैं । ध्यान से, भक्ति से , चिंतन से, ज्ञान व सहजता आती है।


पतन के लिए हम कोई विशेष अभ्यास नहीं करते, कोर्स नहीं करते लेकिन वह फिर भी हमें आता है।


जैसे रोशनी हर तरफ बिखरती है वैसे जिन्दगी हर तरफ बिखरती है। जिन्दगी को जितना बिखराओ उतना बिखर जाती है। और उतना ही मजा जिन्दगी देती है। लेकिन ये उस मजा लेने वाले को ही पता है। हर किसी को नहीं।  और लोग यही सोचते रहते हैं कि हम समझदार हैं जबकि दुनिया में जितना देखा जाये दुनिया को उतना ही मजा है। जिसने दरवाजे के भीतर ही दुनिया देखी है उसे बाहर की दुनिया का क्या पता है।


सूबे सिंह सुजान 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

मेरे बचपन मे पिता ने एक थप्पड़ मारा था।

 ग़ज़ल 

ज़िन्दगी के मोड़ पर,ग़म की महक आती रही,

थी कहीं कच्ची, कहीं पक्की सड़क आती रही।


रेलगाड़ी उनकी धीरे धीरे गुजरी थी मगर,

पटरियां सब ठीक थी, फिर भी धमक आती रही।


लोग मेरी टहनियों पर पाँव रखकर चढ़ गये,

और ज्यादा मेरे चेहरे पर चमक आती रही।


टूटी फूटी सड़कें थी, और खूबसूरत पेड़ थे,

उस सफर की याद मुझको अब तलक आती रही।


मैं सफर को कार में या रेलगाड़ी में करूँ,

मुझको उसकी चूडियोँ की ही खनक आती रही।


मेरे बचपन में पिता ने एक थप्पड़ मारा था,

आज तक कानों में आवाज़ें कड़क आती रही।


सूबे सिंह सुजान 

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

नज़र नज़र से मिला रहे हो

 नज़र नज़र से मिला रहे हो।

के दिल में क्या है बता रहे हो।


हथेलियों को सजा रहे हो 

जनाब किसको लुभा रहे हो।


बहुत चढ़ावा चढ़ा रहे हो?

 ख़ुदा को रिश्वत खिला रहे हो।


नज़र हटा लीजिए ज़रा सी, 

क्यों मेरी धड़कन बढ़ा रहे हो।


 अदा तुम्हारी है खूबसूरत,

 तुम आँखों से मुस्कुरा रहे हो।


 ये गीत तो वक्त ने लिखा है,

 कि तुम जिसे गुनगुना रहे हो।


ये वक्त कैसे गुजर रहा है,

तुम आज चल कर दिखा रहे हो।


वही तो खड्ड़े हैं जिंदगी में, 

जिसे तरक्की बता रहे हो।


सूबे सिंह सुजान

शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

ज़िन्दगी को संवारने के लिए, मुश्किलों से गुजरना पड़ता है।

 खुश्बुओं को बिखरना पड़ता है।

और फूलों को मरना पड़ता है।


ज़िन्दगी क्या है जानने के लिए



,

ज़िन्दगी में उतरना पड़ता है।


कोई आवाज़ दे अगर दिल से,

हमको दिल से ठहरना पड़ता है


उनसे मिलने के हैं सबब इतने,

हमको सजना, संवरना पड़ता है।


जिनको ऊंचाई ज़िन्दगी में मिली,

उनको झर झर के झरना पड़ता है।


ज़िन्दगी को संवारने के लिए,

मुश्किलों से गुजरना पड़ता है।


मौत कैसी है जानने के लिए,

एक दिन सबको मरना पड़ता है।


पेट की आग को मिटाने को,

रोज़ कुछ काम करना पड़ता है।


है बना ऐसा, आदतन पानी,

उसको ख़ुद ही निखरना पड़ता है।


ख़ुद ब ख़ुद मुंह में फल नहीं आते,

तोते को फल कुतरना पड़ता है।


गलतियां ही सिखाती हैं जीना,

आदमी को सुधरना पड़ता है।


डर किसी चीज़ का नहीं होता,

अपनी इज़्ज़त से डरना पड़ता है 


झूठ जब काम अपने आए "सुजान",

हमको सच से मुकरना पड़ता है।


सूबे सिंह सुजान


कुरूक्षेत्र हरियाणा

9416334841


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सोमवार, 12 सितंबर 2022

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर 2022

 हिन्दी भाषा कितनी विकसित है यह तो किसी से छिपा नहीं है यदि कोई कहता है कि ऐसा नहीं है तो सच में वह हिन्दी भाषा को जानता नहीं है और अपनी अज्ञानता के कारण ऐसा कहते हैं।

हिन्दी भाषा संस्कृत से विकसित है और वर्तमान समय तक सब भाषाओं में वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित और सटीक है इतनी सटीकता अन्य भाषाओं में नहीं है लेकिन अंग्रेजी भाषा का व्यवहार इसलिए विश्व में प्रसारित व प्रचारित है क्योंकि वह धनाढ्य वर्ग की भाषा रही है और यह वर्ग धन के बल पर ऐसा करता आया है।


आज के समय में हिन्दी भाषा को हिन्दी ग़ज़लकार ज्यादा समृद कर रहे हैं वे उर्दू भाषा के लोगों में हिन्दी का प्रयोग व प्रचार प्रसार ज्यादा कर रहे हैं जिससे धीरे धीरे उर्दू की जगह हिन्दी ने ले लिया है और इसमें हिन्दी ग़ज़लकारों का ज्यादा योगदान है लेकिन दुखद यह है हिन्दी साहित्य अकादमी ग़ज़लकार को हेय दृष्टि से देखती है और उतना सम्मान नहीं देती। यह वर्तमान समय में विचारणीय है। अकादमी को इस विषय को उठाना चाहिए। 

हिन्दी भाषा के शिक्षण में अध्यापकों, शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है समय समय पर शिक्षकों का योगदान भी रहा है लेकिन पिछले दो तीन दशकों में हिन्दी शिक्षण में बहुत कमियां रही हैं जिससे स्तरीय हिन्दी शिक्षण नहीं हो सका है सोशल मीडिया के समय के साथ हिन्दी अध्यापकों ने अपनी कोई प्रयौगिक भूमिका नहीं निभाई, बल्कि उससे अपने आप को दूर कर लिया । जिस कारण आज सोशल मीडिया पर बच्चों ने स्वयं अपने आप को स्थापित करने के लिए प्रयास किए और हिन्दी भाषा में त्रुटियां अधिक बढ़ गई हैं। सबसे अधिक भूमिका विश्विधालयों व प्रोफेसर की होनी चाहिए थी और उन्होंने यह नहीं निभाई है जब ऐसे ऐसे अपराधों की सज़ा हमारे नियम नहीं दे पाते तो समय स्वयं इन अपराधों की सज़ा देता है।


सकारात्मक यह है कि स्वयं हिन्दी अपना प्रचार कर रही है वह अपनी वैज्ञानिकता के आधार पर वैश्विक स्तर पर आ रही है और आ जाएगी क्योंकि अंधी होते संसार को संस्कारित हिन्दी कर रही है यह समय के हाथ में है।


सूबे सिंह सुजान

कुरूक्षेत्र हरियाणा

9416334841


रविवार, 11 सितंबर 2022

हंसना

 हमें जिस बात पर हँसना नहीं था 

उसी पर बेवजह हँसने लगे हैं ?

#सुजान

ज़िन्दगी रह गई उमस होकर

 ज़िन्दगी रह गई उमस होकर

आप मिलना मुझे सरस होकर।


एक।  तेरे   बग़ैर।  गुजरा  है,

एक दिन भी कईं बरस होकर ।

प्यार में दर्द, हर जगह पाया,

रह गया मैं तहस-नहस होकर ।


सारी दुनिया की ठोकरें खायी,

आ गया तेरे दर विवश होकर ।


आदमी खोखला है अन्दर से,

आप भी देखना सहस होकर ।


ये है हासिल,तनुक मिज़ाजी का

बोलना बंद है बहस होकर ।


सूबे सिंह सुजान

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

दुख में पुरुष ख़ामोश और स्त्री ज़ोर से रो पड़ती है।

 दुख: में पुरुष ख़ामोश हो जाता है और स्त्री ज़ोर से रो पड़ती है।


दुख को कम करने के लिए रोना जरुरी है इसलिए स्त्री रोती है और यह समझदारी है।


पुरुष की प्रकृति कठोर होती है उसे सहने के लिए बनाया गया है इसलिए वह ख़ुद पर सहता है वह दुख को अपने पर झेलता है यही उसकी प्रकृति है हृदय तो पुरुष का भी बहुत कोमल होता है लेकिन वह समझता देर से है। बहुत बार पुरुष भी बहुत रोना चाहता है लेकिन अपनी प्राकृतिक, सामाजिक व्यवस्था के कारण रो नहीं सकता।


प्रकृति ने स्त्री को बहुत अधिक नर्म,कोमल,हृदय से और भी कोमल बनाया है वह पल में प्रलय है

वह जन्मदात्री है और बीज कोमल मिट्टी,नमी, समुचित आकाश, वायु, प्रकाश के संतुलन में पौधा बनता है।


सूबे सिंह सुजान

बुधवार, 17 अगस्त 2022

स्वयं को हर जगह देख सकते हैं

 किसी भी रूप में स्वयं को देखा जा सकता है।

यदि आप अपने बीते दिनोंं को देखना चाहते हैं तो बहुत आराम से दिखाई देगा, यदि आप देखेंगे तो।

आपको जो कुछ भी दिखाई दे रहा है कहीं भी नज़र घुमाओ, जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह तुम्हारी तरह ही है या था या होगा।


पृथ्वी पर उपस्थित हर कण बिल्कुल सटीक आप की तरह है

आप किसी मनुष्य,जानवर या वनस्पति किसी में भी देख सकते हैं वह सब आपकी तरह हू ब हू है। लेकिन देखने के लिए आपको स्वयं को एक ध्यान में रखना होगा एक प्रकृतिवादी बनकर, क्योंकि जैसी प्रकृति है वैसा बनना होगा वास्तव में आप ऐसे ही हैं लेकिन मनुष्य की निर्मित भौतिक वस्तुओं पर हमें गर्व की अनुभूति होती है जिसे हम छोड़ नहीं पाते, जबकि हम यह भूल जाते हैं हम भी उसी प्रक्रिया में है जिसमें सब उपस्थित वस्तुएं हैं।

शनिवार, 13 अगस्त 2022

क्या हम जरूरतमंद की मदद करते हैं?

 अपने कपड़े, रोज नए पहनने जरूरी हैं बनिस्बत किसी के साथ इन्सानियत निभाना।

हम लोग प्रतिदिन अपनी ऐश्वर्या के अनेक कार्य, अनेक बिना जरूरत के काम करते हैं जैसे-: हर रोज़ नए नए कपड़े बदलना, सौंदर्य प्रसाधन, गाड़ी होते हुए भी अन्य गाड़ियां लेना, बेवजह सड़क पर गाड़ियों को चलाना, बच्चों को फिजूलखर्ची के लिए पैसे देना आदि हम बहुत खर्च करते हैं जिनके किए बगैर भी ज़िन्दगी जी जा सकती है।

लेकिन हम किसी जरूरतमंद को ज़रुरत के समय यदि वह कोई मदद मांगे तो मदद करने से जवाब दे देते हैं।

हम ऐसा करते समय ज़रा सा भी नहीं सोचते?

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

भावना

 बिना भावना कोई रिश्ता नहीं है

मगर भावना का दिखावा नहीं है।

जमे बर्फ अच्छी,तो पिघले भी अच्छी,

नदी क्या बनेगी,जो झरना नहीं है।


सूबे सिंह सुजान

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

शिक्षक का सम्मान ही विभाग व अधिकारियों का सम्मान है

 शिक्षक के सम्मान में ही विभाग व अधिकारी का सम्मान है। सारा शिक्षा विभाग आखिर बच्चों और शिक्षक पर आधारित है शिक्षक को स्कूल में ही रहने दिया जाए और उसका सम्मान करना ही शिक्षा विभाग के अधिकारियों का सम्मान है 

यदि शिक्षक अधिकारियों का होटलों में अपने खर्चे पर बड़े स्तर पर पार्टी देकर सम्मान करते हैं तो यह ठीक नहीं है बल्कि यह समाज को, शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने जैसा है। 


शिक्षक को सम्मानित करने में ही अधिकारियों का बड़प्पन है एक सुसंस्कृत, सुशिक्षित संस्कारवान अधिकारी कभी शिक्षकों से निवेदन करके सम्मानित होना पसंद नहीं करेंगे और इसी तरह कोई भी सुसंस्कृत सुशिक्षित संस्कारवान शिक्षक भी अपने स्कूल में बच्चों को छोड़कर अधिकारियों की चापलूसी नहीं कर सकता यदि करते हैं तो वह अपने कर्तव्य से विमुख हो चुका है।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

कुप्रथा (लघुकथा)

 कॉलेज की दो छात्राएं आपस में घनिष्ठ सहेली थी कोमल और सुल्ताना। दोनों अपनी सभी निजी बातें शेयर करती थी सुल्ताना,कोमल से अक्सर कहती कि तुम्हारे बहुत मज़े हैं तुम पूरी स्वतंत्रता से रह सकती हो।  हर तरह के कपड़े पहन सकती हो, कहीं जा सकती हो, लेकिन हमें तो बुर्के में रहना पड़ता है और हमें सामाजिक रूप से आज़ादी नहीं दी जाती है। यह वामपंथी विचारधारा मीडिया में हिन्दू धर्म में बहुत कमियां बताती है लेकिन हमारे समाज की कुरीतियों को समर्थन करती है पता नहीं हमारे समाज की कुरीतियों को उजागर क्यों नहीं करती वरना कुछ तो सुधार हमारे समाज में भी होता ।

कोमल कहने लगी लेकिन तुम अपने परिवार में कहती क्यों नहीं  कि मुझे मेरी मर्ज़ी का पहनावा पहने दो,इस पर सुल्ताना बोली चुप रहो बहन इतनी बात कहने पर हमारे साथ, हमारे घर के पुरुष न जाने कैसे कैसे उत्पीड़न करते हैं और तुम्हें यह कहते सुन लिया कि मुझे यह सलाह दे रही है तो तुम्हें भी परेशान करेंगे। इसलिए चुपचाप ज़ुल्म सहना ही हमारा भाग्य है।


रविवार, 3 जुलाई 2022

बिल गेट्स सभी को नहीं बनना चाहिए

सब लोग बिल गेट्स बनना सोचते हैं जबकि यह ठीक नहीं है। यदि मान लिया जाए, सब गिल बिल गेट्स बन जाएं तो दावा है ! किसी को भी खाना नहीं मिल पाएगा । लोग भोजन को तरस जाएंगे जब अमीरों की संख्या ज्यादा हो जाती है तो समाज में अशांति, असंतोष, भूखमरी फैल जाएगी। इसलिए प्रकृति ने हर चीज़ का संतुलन बनाया है और यही मानव बुद्धि के साथ भी है संतुलन हर जगह जीवन के लिए जरूरी है।

मंगलवार, 7 जून 2022

ग़ज़ल - जिसने दुनिया को समझा है।

जिसने दुनिया को समझा है, उसको सब कहते पगला है। उसने दुनिया को समझा है, जो ख़ुद,ख़ुद से खूब लड़ा है। वैसे तो वो अच्छा लगता है, पर चेहरे पर चार बजा है। मेरे मात पिता लड़ते हैं, वैसे उनमें प्यार बड़ा है। सच में दुनिया यूँ लगती है, जैसे शंकर नाच रहा है। चिल्लाने से क्रोध बढ़ेगा, "चुप रहने में और मज़ा है।" वायु हमेशा ऊपर उठती, पानी नीचे को बहता है। पूछो तो सारे सच्चे हैं, परख़ो, हर कोई झूठा है। सूबे सिंह "सुजान" कुरूक्षेत्र हरियाणा

शनिवार, 4 जून 2022

मनुष्य विज्ञान का भरपूर प्रयोग कर रहा है लेकिन जीवन को नष्ट कर रहा है।

लोग असली दूध पीना ही नहीं चाहते, दरअसल लोग नकली दूध को पसंद करते हैं। नकली दूध कम कीमत में बाजार में उपलब्ध होता है। असली दूध यदि चाहिए तो वह ₹200 तक प्रति लीटर ही असली दूध मिल सकता है। आज बहुत तेजी से हमारे गांवों में पशु पालन करने वाले लोग पशुपालन धंधे को बंद कर रहे हैं। यह बहुत तेजी से हो रहा है और वास्तविकता यह है हालात ऐसे बन गए हैं कि पशुपालकों को यह धंधा बंद कर ही देना चाहिए ताकि हमारे समाज को अक्ल आए कि असली दूध की कीमत कैसे मिलती है असली दूध कैसे प्राप्त होता है क्योंकि जो पशुपालक आज असली दूध पशुओं से तैयार करते हैं वह प्रतिवर्ष आर्थिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं, कर्जे में डूब रहे हैं। दरअसल लोग पैसा उगाना पसंद करते हैं खाना,भोजन के लिए फसलें उगाना पसंद ही नहीं करते, आज समय ऐसा आ गया है कि हम फलों के पौधे लगाना पसंद नहीं करते लेकिन अच्छा फल पसंद करते हैं। इसी प्रकार पशुपालन बंद हो रहा है और दूध अच्छा सब चाहते हैं पूरे समाज में पैसा उगाने की दौड़ जारी है लोग पैसा पैसा उगा रहे हैं और भोजन खत्म हो रहा है वास्तविक जो भोजन मिट्टी से पैदा होता है वह खत्म हो रहा है धीरे-धीरे समय ऐसा आने वाला है कि लोग पैसे पैसे लेकर घूमेंगे और भोजन नहीं मिलेगा। इस तरह से भुखमरी आएगी और पृथ्वी पर मनुष्य बहुत कम रह जाएगा और वास्तविकता में यह होना प्राकृतिक है। निश्चित है। यह होना भी चाहिए क्योंकि मनुष्य पृथ्वी की अनदेखी कर रहा है मिट्टी को जहरीला बना रहा है मृदा मिट्टी खत्म हो चुकी है भोजन के लिए फसलें अब मिट्टी नहीं दे पाएगी, हमने अंधाधुंध जंगलों को नष्ट कर दिया, मिट्टी से सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर दिया है। मनुष्य विज्ञान का भरपूर प्रयोग कर रहा है लेकिन जीवन को नष्ट कर रहा है।

सोमवार, 23 मई 2022

परिवर्तन की गति में तीव्रता,विनाश की आहट है।

मनुष्य ने अपने जीवन और पृथ्वी के धरातल से आकाश तक परिवर्तन की गति इतनी तीव्र कर दी है कि जीवन में और पृथ्वी पर कभी भी दुर्घटनाएं घट सकती हैं इसके लिए मनुष्य को अपनी पुरानी पीढ़ियों से सीखते रहना होगा अपने जीवन की धरोहरों को जितना हो सके सुरक्षित रखें। आज जो पुराने लोग बचे हैं उनसे सीखना जरूरी है उनके काम करने के तरीकों को, खानपान की आदतों को, पर्यावरण को सुरक्षित करने,मृदा संरक्षण,भोजन, पेड़ पौधों,व मनुष्य में संस्कारों को सुरक्षित रखने के तौर तरीकों को सीखते रहना चाहिए वरना मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा ज्यादा नुक्सान झेलना पड़ सकता है।

रविवार, 22 मई 2022

ग़ज़ल - अपने बचपन में लौटते रहिये

अपने बचपन में लौटते रहिये, बच्चों के साथ खेलते रहिये। अपने माता पिता और रिश्तों को, बैठकर थोड़ा सोचते रहिये। बेवजह भी खुशी मिलेगी बहुत, उंगलियों को मरोड़ते रहिये। हां! बहुत भागदौड़ रहती है, ज़िन्दगी है, तो दौड़ते रहिये। आपको, जब नहीं कोई सुनता, आप ही आप बोलते रहिये। अपने बचपन में लौटने के लिए, कुछ खिलौनों से खेलते रहिये। जन्म से मौत तक सफ़र अपना, ज़िन्दगी क्या है सोचते रहिये। दृष्टि परमात्मा की पाओगे, निर्बलों को उभारते रहिये।

जो अपने आप उगता है हम सब वो घास हैं।

जो अपने आप उगता है हम सब वो घास हैं। इसीलिए हम एक दूसरे के पास हैं। जीवन नियमित है जीवन का नियम है एक दूसरे की समीपता प्रकृति के हर कण में जीवन के गुण मौजूद रहते हैं। जीवन उत्पन्न होना और जीवन नष्ट होना यही प्रकृति की प्रक्रिया है। जिसमें मनुष्य भी है हम एक दूसरे के पास रहते हैं एक दूसरे के पास रहने का गुण प्रकृति में निहित है। एक दूसरे के पास रहना प्रकृति से प्राप्त गुण है। यह हर प्राणियों में मिलेगा। पेड़-पौधे, जीव जंतु और मनुष्य में, पक्षी, पक्षियों के पास रहेंगे। पेड़- पौधे, पेड़ - पौधों के पास रहेंगे। पशु ,पशुओं के साथ रहेंगे यह प्रकृति में निहित है यह जीवन है मनुष्य के अंदर या अन्य प्राणियों के अंदर दया, क्षमा भाव होना, मनुष्य के पास रहना यह प्राकृतिक गुण है। इसी गुण में जीवन निहित है। इसी गुण में से प्रेम उत्पन्न होता है इसी गुण से दया, क्षमा उत्पन्न होती है जो मनुष्य में वन्य प्राणियों में सभी में निहित है। इसका अंश अलग-अलग मात्रा में हो सकता है परंतु दयालुता, क्षमा भाव, प्रेम भाव सभी प्राणियों में मौजूद है। यह प्रकृति निहित है इसी से जीवन का निर्माण और जीवन का चलना संभव होता है। जीवन अपने आप उगता है और अपने आप निरंतरता के भाव में रहता है। इसी प्रकार जीवन का निर्माण होता है मनुष्य स्वयं की दिनचर्या में व्यस्त होने के कारण, अपने अल्प ज्ञान के कारण यह भाव रखता है कि जीवन हमसे चलता है परंतु ऐसा नहीं है जीवन का पैदा होना प्रकृति निहित था और है एवं रहेगा। जीवन की निरंतरता प्रकृति निहित है हमें जीवन को सूक्ष्मता से देखना होगा जीवन का निर्माण किस प्रकार हो रहा है यह सूक्ष्मताओं का भाव प्रकृति में निहित है। जिसकी पहचान ऋषि-मुनियों ने समय-समय पर की है अनेक विद्वानों साहित्यिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक लोगों ने जीवन की सूक्ष्मता के गुणों की पहचान करने के प्रयास किए हैं। जिससे जीवन को महसूस किया जाता है और उसकी प्रकृति का पता चलता है। एक जीव की उसी जीव के प्रति समीपता, निकटता, सूक्ष्मता जीवन में उल्लास, प्रेम, आनंद को भरती है और जीवन की निरंतरता में सहयोग करती है यह प्रकृति ने सभी जीवों में गुण पैदा करने की क्षमता प्रदान की है और उसका प्रयोग करने की विशिष्टता प्रदान की है।

प्लास्टिक और मोनिका भारद्वाज के बच्चे

शिक्षकों के धरना प्रदर्शन में कुछ बच्चे अपनी माताओं के साथ बैठे थे कुछ शिक्षक कोल्डड्रिंक सब शिक्षकों को दे रहे थे तो जब सब कोल्डड्रिंक ले रहे थे तभी दो बच्चों ने कोल्डड्रिंक लेने से मना कर दिया सब शिक्षक अनुरोध करने लगे कि बच्चे ले लो लेकिन वह मना करते रहे पहले सोचा कि कोल्डड्रिंक नहीं पीते होंगे लेकिन मैं पास ही बैठा था मैंने पूछा कि बच्चे क्या बात कोल्डड्रिंक नहीं पीते? बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल, हम प्लास्टिक का कोई भी समान प्रयोग नहीं करते इसलिए नहीं पीते। अब हैरान होने को और क्या चाहिए जब 5-6 साल का बच्चा यह बात कहे। लेकिन दूसरी तरफ़ शिक्षक थे जो प्लास्टिक के गिलासों में कोल्डड्रिंक पी रहे थे और ज़रा सा भी अहसास नहीं था कि हम क्या कर रहे हैं? इन बच्चों का लालन पालन मोनिका भारद्वाज और उनके पर्यावरणविद् पिता ने किया है जो पर्यावरण को समर्पित हैं यदि इस तरह सब लोग अपने बच्चों को शिक्षित करें तो अपनी पृथ्वी को,भोजन पैदा करने वाली मिट्टी को बचाया जा सकता है और जीवन को, पर्यावरण, पृथ्वी को ज्यादा सनय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। हमें इस परिवार, बच्चों से प्ररेणा लेनी चाहिए।

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

सार्वजनिक क्षेत्रों को बचाने के लिए सरकार को काम करना सबसे पहले चाहिए।

सुबह सुबह एक प्राइवेट स्कूल की वैन गांव के बीचोबीच तंग रास्ते पर एक बच्चे के बिल्कुल घर के सामने रुकी,बच्चा बिठाया, बच्चे की माता खुश कि उसका बच्चा सुरक्षित। दस कदम के बाद दूसरे घर के आगे रुकी और फिर तीसरे घर... और वैन की पीछे दस बारह मोटरसाइकिल,एक कार, टैक्टर ट्राली आगे निकलने के इंतजार में परेशान थे। अब इस दृश्य का आंकलन कीजिए अनेकों वाहनों से वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण लगातार हो रहा है। जीवन में यदि एक मिनट के लिए आक्सीजन न मिले तो जीवन समाप्त हो सकता है अर्थात सबसे ज़रूरी आक्सीजन है भोजन से भी पहले। लेकिन हमारी अव्यवस्था ने, सुविधाओं के ढोंग ने पर्यावरण,व बच्चों का जीवन नर्क कर दिया है। जो बच्चा जितना ज्यादा सुविधा में बचपन जीएगा वह उतना कम सीख पाएगा। जबकि दूसरी तरफ प्रत्येक गांव में सरकार ने सरकारी स्कूली शिक्षा का प्रबंध किया है । परंतु हम दोगुना पर्यावरण नष्ट कर रहे हैं हम समय का सदुपयोग नहीं कर पा रहे शिक्षा का सदुपयोग नहीं कर पा रहे ।व्यवस्था को दुरह बना दिया गया है। सार्वजनिक शिक्षा ही सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक, पर्यावरण की हितैषी हो सकती है। अलग अलग सुविधा देना एक तरह से अलग अलग वर्ग तैयार करना है जो सामाजिक समरसता,देश की एकता को खंडित करती है। देश भर में एक पाठ्यक्रम, एक जैसी सुविधाएं, एक जैसी सरकारी स्कूली शिक्षा का पैटर्न होना अति आवश्यक है।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

गतिमय ही जीवन है।

सब कुछ गतिमय होना चाहता है भावनाएँ भी स्थिर नहीं रहती पृथ्वी से लेकर,पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ गतिमय कम या ज्यादा होती हैं गति जीवन है । गति में निरंतरता भी चाहिए परंतु तीव्रता हमेशा नहीं चाहिए हमेशा की तीव्रता शीघ्र विनाशकारी होती है परंतु स्थिरता भी जड़ता है । सूर्य गतिमय नहीं है परंतु सूर्य अपनी स्थिरता से भी प्रकाश के माध्यम से ,अपनी उष्मा से आकाश में हर जगह उपस्थित है सृष्टि नियमों पर आधारित है सम्पूर्ण आकाश व पृथ्वी के हर कण में नियम व्याप्त हैं नियमों का आवश्यकता अनुसार परिवर्तन दृष्टव्य है नियमों का खेल स्वयं संचालित है व यही जीवन आधार भी है । मनुष्य द्वारा,राज्यों द्वारा संविधान भी सृष्टि से संग्रहीत है जिससे स्पष्ट होता है जीवन को सुविधाओं सहित व अधिक आयु तक जीना नियमों में रहकर ही संभावित है । प्रेम होना भी नियमित है ।

रविवार, 10 अप्रैल 2022

उसने कहा कि फूलों,बहारों को देखना

उसने कहा कि फूलों,बहारों को देखना फिर पेड़ और नदी के किनारों को देखना मैंने कहा कि फूल, कभी आते तो करीब हम सीख जाते,खूब नजारों को देखना । तेरे करीब आ रही बहती हुई नदी बहकर "सुजान" उसके इशारों को देखना । वो चाँद है मगर मैं तो सूखा सा खेत हूँ उसके नसीब में है हजारों को देखना । दिल में कभी कभी ये भी आ जाता है "सुजान " ग़ज़लें न सुनना,चाँद सितारों को देखना । सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

पेड़ और खंभों में जंग

सड़क किनारे लगे पेड़, जिनके ऊपर से बिजली की तारें गुजरती हैं। पहले उनकी ऊपर से झंगाई की गई फिर कईं बार बिजली ने करंट मारा, फिर कुछ सूख गए फिर कुछ काट दिए गए। धीरे धीरे सड़क किनारे अब बिजली के खंभे दिखाई देते हैं।

कहानी और कविता

अब कहानी और कविता हो रही हैं छोटी, दर्द, तन्हाई, ज़ियादा से ज़ियादा लम्बी। वनस्पति घटने लगी, रास्ते कितने खुश हैं, वक्त, हमने भी तुम्हारी नई दुनिया देखी।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

ग़ज़ल, मैं नये हौंसले बनाऊंगा

मैं नये, हौंसले बनाऊंगा और कुछ रास्ते बनाऊंगा। तुम नहीं, दर्द को समझते हो, आदमी,दूसरे बनाऊंगा। ताकि हम दर्द अपने खुजलायें, इसलिए खरखरे बनाऊंगा कुछ दिनों से उदास बैठा हूं, मंज़िलों के पते बनाऊंगा। अपने हाथों को पीटना तुम सब, मैं नहीं झुनझुने बनाऊंगा। सूबे सिंह "सुजान"

रविवार, 27 फ़रवरी 2022

सच के हिमायती को तिरस्कार का घूंट पिलाया जाता है, पुरस्कार का नहीं।

जब कंई बार दोस्तों के साथ कार में सफर कर रहा होता हूँ तो बातचीत बंद होने पर मुझे अचानक नींद आ जाती है । इस पर दोस्त मजाक भी कर लेते हैं यह उनका नजरिया व सोच को या केवल मजाक को ध्यान में रखकर कहते होंगे । लेकिन जब मैं अपना जवाब दाखिल करता हूँ (रात भर माता को हर एक घंटे बाद देखना फिर सोने की कोशिश करना,फिर माँ की बार बार कराहट की आवाजें फिर करवट देना,तो नींद तो बहुत आती होगी न मुझे) तो वे मेरे जवाब को शायद अनसुना करते हैं या वे हकीकत जानना नहीं चाहते या ऐसी दुरूह हकीकत को अनसुना करते हैं और पलटकर एक भी जवाब नहीं होता मजाक के सिवाए और उनके पास के सारे संवेदना के शब्द भी मर जाते हैं जैसे वे संवेदना रहित हों । दूसरा हिस्सा मेरा दिन भर ऐसे काम करने का रहा होता है जिसमें कार्यस्थल पर भी दूसरों के हिस्से का काम अनुरोध पर मना न कर सकना, यूनियन के वे काम जो मुफ्त में उन लोगों के लिए करना जो लोग धन संपदा से संपन्न होते हैं संगठन के वे काम जिनको करने में केवल अपना समय,धन व शक्ति लगानी होती है प्रत्युतर में उन्हीं लोगों से उपहास पाना होता है जिनके लिए वे सारे काम कर लेते हैं यह उन लोगों की तुच्छ मानसिकता का पैमाना होता है लेकिन यह पैमाना जानते कितने लोग हैं ? सच के हिमायती,समाज के हिमायतियों को तिरस्कार का घूंट पिलाया जाता है न कि पुरस्कार का । https://youtu.be/ob2jtAXCGaE Mehar Chand Dhiman and virender rathor YouTube channel live

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

ग़ज़ल- हर बात तुम्हारी मुझको याद रही बरसों

ग़ज़ल हर बात तुम्हारी,मुझको याद रही बरसों। चुपचाप बही,इस दिल में ग़म की नदी बरसों।। मैं याद तुम्हें करने में,भूल गया ख़ुद को, जीवन की खुशी मेरी, गुमनाम हुई बरसों। इस मोड़ खड़ा होकर,हर रोज़ निहारा है, इस गांव के स्टेशन पर, गाड़ी न रुकी बरसों। इक आह! महब्बत ने,बारूद बनाया है, अब युद्ध बनी तन्हाई,आग दबी बरसों। हर शब्द में, अपने दिल को, खोलने की सोची, दिल खोल नहीं पाया, ग़ज़लें तो लिखी बरसों। मैंने ये उदासी, तन्हाई में पकाई है, अब फूल खिलेंगे,दी आंसू ने नमी बरसों। सूबे सिंह "सुजान" कुरूक्षेत्र

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

यह मनुष्य का जीवन

 

हमारे मन में कुछ जगह,शहर, गांव पक जाते हैं।

वैसे जगह तो सब वैसी ही होती हैं..

ऐसे ही कुछ लोग हमारे मन में पक जाते हैं और हमें लगता है कि अब ये हमारे किसी काम के नहीं, इसलिए उनसे संपर्क तोड़ दिया जाता है।यह जीवन मनुष्य का है।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

गहरे लोग

 ह्रदय की गहराई कौन नाप सकता है? यह तो कोई कोई समझ सकता है उसके जैसा या उससे भी ज्यादा गहरा कोई समझ सकता है।

हर जीव जंतु, पेड़ पौधे को आख़िर पकना होता है और उसके बाद बीज बनना होता है।

लेकिन ऐसे भी हैं कि बहुत कुछ पेड़ पौधों,जीव जंतुओं को फल नहीं आ पाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनको फल आ गए हैं तो फिर बीज नहीं बनते।

यह सबका अलग अलग भाग्य है बिल्कुल उसी प्रकार जिस तरह हम सबकी शक्लें अलग अलग हैं व गुण भी अलग-अलग हैं। इसी तरह मनुष्यों में शारीरिक तौर पर कुछ लोग पतले, कुछ मोटे, कुछ बौने, लम्बे,ढील ढौल से अलग अलग दिखाई देते हैं तो कुछ लोग बुद्धि स्तर पर भी अलग अलग विचारों के होते हैं तो कुछ लोग मानसिक स्तर पर भी अलग-अलग स्तरों व भावनाओं से अद्वितीय होते हैं।


गहराई के भी अपने अपने प्रकार होते हैं कटोरी या गिलास या घड़ा इनकी अपनी अपनी व अलग अलग काम आने वाली गहराई होती है जो कि अपने स्तर पर पूर्ण रूप से सफल है,काम आने वाली है अर्थात सार्थक है।

वहीं आप जोहड़, तालाब, सरोवर, दरिया,नहर, नदी और समुद्र की गहराईयों को भी अपने अपने स्तर पर अद्भुत व सफल काम आने वाली पाओगे।

इन्हीं सब गहराइयों का आप दूसरे सिरे से देखें तो यह गहराइयां अपने आप में पूर्ण हैं परन्तु सब व्यक्तियों के लिए एक जैसी काम नहीं आती,न हर पशु या पक्षी के लिए समानता से एक जैसी काम आ सकती हैं। परंतु किसी भी गहराई में लेश मात्र भी कमी नहीं है।

क्या आप ऐसा ही व्यक्तियों के बारे में सोच सकते हैं? बिल्कुल ऐसे ही प्रकार व चरित्र व्यक्तियों में देखने को मिलेंगे।इस सब के बावजूद प्रकृति ने कहीं भी कोई अपराध नहीं किया है इस भाव के समीप आने के लिए मनुष्य को बहुत गहरा होना होता है जो जितना गहरा हो जाता है वह उतना इस भाव को समझ पाता है। प्रकृति ने किसी भी जीव जंतु पेड़ पौधे में कहीं भी पक्ष या विपक्ष नहीं किया है।

अपितु यह सब जीवन को संचालित करने के स्तर निर्माण किए गए हैं और इन्ही स्तरों से जीवन सार्थक संचालित हो सकता है और हुआ है वरना इनके बदलाव से यह जीवन संभव नहीं है। इसलिए एक भजन में कहा गया है कि ईश्वर जो कुछ भी करता है अच्छा ही करता है।यह प्रकृति का नियम है, निस्वार्थ भाव का निर्णय है।

जीवन हमारे द्वारा संचालित हो रहा है लेकिन हमसे ही संचालित नहीं होता है जीवन स्वयं संचालित है जीवन के संचालन में अनेक शक्तियों का प्रयोग हो रहा है जो हमसे संबंधित दिखाई न देकर भी हमें संचालित कर रही हैं सूर्य, चंद्र,पवन,आकाश, पृथ्वी आदि तो समक्ष हैं परंतु असीमित ज्ञात,अज्ञात असंख्य शक्तियां जीवन को गतिमान बनाए हुए हैं। इन्हीं असीमित ज्ञात अज्ञात शक्तियों को जानने में मनुष्य लगा है और इनको जानने से हमें ज्ञान होता है। यही शक्तियां जानना, पहचानना ही ज्ञान है।

इसी प्रकार प्रेम है। प्रेम के अंदर इसी प्रकार संपूर्ण सृष्टि का श्रृंगार, वैभव,कष्ट,सुख, अपरिचित,परिचित, अपरिमित, असीमित आनंद का अनुभव होता है। यही प्रेम, मनुष्य की गहराई की मापन प्रणाली है।

प्रेम के माध्यम से जीवन को असीमित किया जा सकता है।


सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

ग़ज़ल- अब कहानी ख़बर सी लगती है।

 अब कहानी, ख़बर सी लगती है

बच्चों को एक डर सी लगती है।

यूँ खुशी भी मिली है हमको ,मगर,

दर्द की भी नहर सी लगती है।

काम दर काम गर, करेंगे हम,

ज़िन्दगी फिर सफ़र सी लगती है।

क्या नया दौर आ गया यारो,

बस्ती बस्ती नगर सी लगती है।

उनमें भी भावनाएं बाक़ी हैं,

झोंपड़ी जिसको घर सी लगती है।

जिसका दीवाना मैं रहा बरसों,

वो मुझे बेख़बर सी लगती है।

बद्दुआ,जितनी उसको देता हूँ,

उसको मेरी उमर सी लगती है।


सूबे सिंह सुजान

बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

शहर के लोग

 नगर में संभ्रांत लोगों की जगह सेक्टर कहलाते हैं। सुबह-सुबह उन्हीं सड़कों से गुज़र रहा था लगभग हर सड़क पर घरों से बाहर सफाई करने के बाद पानी को सड़क पर फ़ैला दिया था और कुछ जगह तो लगातार बहाया गया था।


आने जाने वाली हर गाड़ी से पानी के छींटें पैदल यात्रियों, आसपास के साधनों और घरों पर पड़ते थे।

ऐसी स्थिति में हर सड़क भी बहुत जल्दी टूट जाती है। नगर के ऐसे इलाके में हर व्यक्ति स्वयं को पढ़ा लिखा तो समझता है लेकिन समझ कितनी है यह व्यवहार से स्पष्ट होता है व्यवहार केवल वही नहीं होता जो हम आपस में बातचीत या लेन देन को करते हैं, वरन् व्यवहार हर पेड़ पौधों से,पशु पक्षी,सड़कों, गलियों और देश, राष्ट्र की सम्पत्ति, सुन्दरता से भी सरोकार रखता है।


सूबे सिंह सुजान कुरूक्षेत्र हरियाणा

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

मानव इतिहास यादाश्त का गठजोड़ है।

 यादाश्त एक युद्ध की तैयारी होती है।


मनुष्य हर तरह की यादों को याद रखने से ही हर काम में आगे बढ़ता है।

मानव इतिहास या किसी भी विषय का इतिहास यादाश्त का गठजोड़ मात्र है और यह यादों का गठजोड़ ही हमें जीवन की निरंतरता देता है, जीवन ही नहीं बल्कि भौतिक विज्ञान, सुविधाएं, साहित्य, कलाओं, संस्कृति सब तरह की निरंतरता यादें ही देती हैं।

जो कठोर यादें होती हैं वह याद रखना और भी ज्यादा ज़रूरी होती हैं लेकिन मानव स्वभाव इस बारे उलट काम करता है वह बुरी या कठोर यादों को जल्दी भूलने की कोशिश करता है लेकिन कभी भूला भी नहीं पाता और भूलने की बेवजह कोशिशों में समय बर्बाद करता रहता है।

जबकि बुरी व कठोर यादें हमारे ज्यादा काम आती हैं वह हमें नया सीखने को तैयार करती हैं वह हमें किसी भी काम के होने से पहले आगाह करती हैं कि आने वाले समय में पुनः ऐसी कठोरता आने से पहले आप उसको समय पर सटीक जवाब दे सकते हैं या आप उससे सामना करने को तैयार रह सकते हैं और अपने लिए सहायक अवसर तलाश कर सकते हैं।


युद्ध श्रेत्र में सैनिक इसी प्रकार काम करते हैं वह अपनी की हुई गलतियों को याद रखते हैं और अपनी क्षमताओं को विकसित करते हैं।

हर क्षेत्र में इसी प्रकार उन्नति होती आई है।

जीवन को प्रेरणा कटु यादों से मिलती है जिस व्यक्ति ने अपने जीवन को जितना ज्यादा कठोरता से जीया है वह उतना ज्यादा कठिनाइयों का सामना कर पाया है और अन्य मानवों के लिए एक रास्ता तैयार करके गया है जिससे मनुष्य को सीखने का अवसर मिला है।

लेकिन अपने जीवन में हर मनुष्य को हर काम या व्यवहार स्वयं सीखना व करना पड़ता है परन्तु आसानी यही होती है कि पहले से मनुष्यों द्वारा किए गए कार्यों का लिखित, विकसित कार्य मौजूद होता है जिससे वह जल्दी सीख पाता है और उस पहले किए गए कार्यों में और अपने द्वारा किए गए कार्यों को जोड़ देता है।

यही मानवता का इतिहास है।

यादाश्त मनुष्य का मनौवैज्ञानिक विषय है और इस विषय पर मनुष्य कम काम करता है जबकि अन्य विज्ञानों पर ज्यादा काम करता रहा है

और सच्चाई यह है कि हर काम व विज्ञान को सुविधाजनक बनाने के लिए या बेहतर करने के लिए मनौवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील होना जरूरी है यही मनौवैज्ञानिक विषय हर विज्ञान या कार्य के पीछे काम करता है।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

चोर (कहानी)

कहानी का शीर्षक है। - चोर। 

 एक बार एक चोर खेत से आलू चोरी करने गया। जब वह खेत से आलू चुरा रहा था।

 तो उसे मन में बार-बार किसी के आ जाने या पकड़े जाने का डर सता रहा था। वह अपनी मानसिकता को स्थिर नहीं कर पा रहा था। उसे हर पल भय था। उसे यह अहसास हो रहा था कि यह भयातुर भावना है जिसमें वह जो काम ठीक से कर सकता था वह काम भी हड़बड़ी में गलत कर रहा है।


दूसरी बार वह चोर एक नहर से सरकारी लकड़ी चुराने गया ।जहां उसको डर का एहसास कम हो रहा था और जिस समय वह लकड़ी चुरा रहा था। उस समय उसके पास दो चार आदमी भी आए लेकिन वह उतना नहीं डरा, उन लोगों से उसने ठीक से बात की और उन्होंने भी उसे कोई ज्यादा नहीं डराया, न अपराधी माना ।क्योंकि इस बार चोरी सरकारी संपत्ति की थी। उस सरकारी संपत्ति की चोरी को वो लोग भी जायज समझते थे । कि क्या फर्क पड़ता है यह हमारी संपत्ति थोड़ी है यह तो सरकारी है यह मानसिकता का अंतर था। 

इन दोनों चोरी करने के बाद जब वह चोर दोनों चोरियों के समय की मानसिकता पर घोर करने लगा तो उसे अहसास हुआ कि यह सामाजिक मानसिकता है जो केवल मेरे अन्दर नहीं है बल्कि सारे समाज के अंदर व्याप्त है और इससे हम देश की संपत्ति को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं जबकि इसी संपत्ति से हमारे समाज के सार्वजनिक कार्य ठीक होते हैं और इसके प्रति सारा समाज लूटने की भावना रखता है इस प्रकार ही तो हमारे काम अधूरे हैं और लोग आपस में स्वयं को ही लूट रहे हैं।

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

ग़ज़ल- ज़मीं पे चाँद कभी भी उतर नहीं सकता

 ज़मीं पे चाँद कभी भी उतर नहीं सकता

निज़ाम ए आसमां कभी भी बिखर नहीं सकता।


वो मेरे दिल को दुखाने की बात करते हैं,

तो क्या मैं थोड़ा सा गुस्सा भी कर नहीं सकता?


मैं ही ज़मीं, मैं ही सूरज और आसमां भी मैं,

मुझे ही मुझसे अलग कोई कर नहीं सकता।


हरेक कण में , हर आवाज में भी मैं ही मैं,

मैं अपने आप से तो यार डर नहीं सकता।


मुझे सुखा लो, भिगो दो,जला के भी देखो,

मरा मराया हूँ,तो फिर और मर नहीं सकता।


सूबे सिंह सुजान कुरूक्षेत्र हरियाणा

ग़ज़ल Ghazal

 एक बग़ैर मतले की ग़ज़ल हुई है। आप हर एक शेर पर ग़ौर कीजिएगा।


वक्त से जो कभी न मांगा था,

वक्त ने,सब वही दिया हमको।


कोशिशें तो जवान रहती हैं,

देती रहती हैं रास्ता हमको।


बेवफा, वक़्त ही तो होता है,

जो बनाता है बेवफा हमको।


मेरे ख्वाबों में वो नहीं था मगर,

आज रस्ते में मिल गया हमको।


हम गरीबों के ज़ख्म ऐसे हैं,

जिंदा रखता है, हादसा हमको।


हार, हमने कुबूल कर ली थी,

था मुकद्दर में जीतना हमको।


प्यार में तो परख़, लिया तुमने,

दुश्मनी से भी सोचना हमको।


शक्लें ही तो अलग अलग अपनी,

पर, बनाया है एक सा हमको।


सूबे सिंह सुजान

रविवार, 21 नवंबर 2021

ग़ज़ल- जिन्हें खुद पे विश्वास कुछ भी नहीं है।

 ग़ज़ल 


जिन्हें खुद पे विश्वास कुछ भी नहीं है 

उन्हें रब का अहसास कुछ भी नहीं है ।


समंदर में और मरुस्थल में रहा हूँ 

मेरे सामने प्यास कुछ भी नहीं है ।


कि हम आज जैसे हैं, वैसे ही कल थे 

सिवा इसके इतिहास कुछ भी नहीं है ।


जमाने को इतना समय दे रहा हूँ 

कि खुद के लिए पास कुछ भी नहीं है ।


कि मैंने तो जीवन की दौलत लुटा दी 

मगर उनको अहसास कुछ भी नहीं है ।


सूबे सिंह "सुजान"

ग़ज़ल-अपशब्दों का विरोध करो

 अपशब्दों का विरोध करो,तुम डरो नहीं,

ताक़त का अपनी,बोध करो,तुम डरो नहीं।


ख़ामोशी भी कभी-कभी ताक़त दिखाती है,

आवाज़ों पर भी शोध करो,तुम डरो नहीं।


आओ पदाधिकारी समस्याएं हल करें,

हम साथ साथ, शोध करो, तुम डरो नहीं।


ऊंचे पदों के नाम से अहंकार से भरे,

अहंकारियों पे क्रोध करो, तुम डरो नहीं।

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

अनादर (लघुकथा)

 बेबाक साहब अच्छे शायर थे उनके साथ एक सुनाम नाम के युवा शायर उनको उनके बुढ़ापे में मुशायरे में ले जाने व आने में मदद करते थे जबकि उनके दो बेटे, दोनों अच्छी नौकरी, परिवार में व्यस्त थे। और वह खुद रिटायर्ड प्रधानाचार्य थे।

सुनाम उनके एक फ़ोन पर उनके साथ खड़ा रहता था, उनके गुजरने के पश्चात् सुनाम ने उनकी शायरी, जीवन व उनके कार्यों पर एक आलेख फेसबुक पर लिखा,जिसको उनके बेटे अंजुम ने पढ़ा और सुनाम के आलेख पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि मेरे पिता जी का नाम सम्मान के साथ नहीं लिखा?

सुनाम ने "बेबाक साहब" लिख दिया था। जो उन्हें नागवार गुजरा,इस बात पर अंजुम जी ने बहुत झगड़ा किया और सुनाम साहब को बहुत बार मुआफी मांगनी पड़ी।

बुधवार, 23 जून 2021

मां का मरना और सड़क का बनना

 मां 14 जून 2021 को दोपहर 2 बजे अंतिम सांस लेकर दुनिया से विदा हो गई।

मां के जाने पर जो दुःख सबको होता है वह मुझे भी है लेकिन एक दुःख और है जो जाने अनजाने मेरे मन में बैठा है। वह दुःख है मेरे घर को दुनिया से जोड़ने वाली सड़क का पूरा न बनना, 


मुझे दुःख है कि मां के मरने से पहले मेरे घर तक पक्की सड़क न बन सकी!!!!!


मां  मरने का इंतज़ार कर रही थी और सड़क बनने का इंतजार कर रही थी।

मैं सोचता था कि मां के मरने से पहले सड़क पक्की बन जाए तो , 

मातम में जो लोग शहर से मेरे पास आएंगे,उनको कोई दिक्कत न हो,

कच्चे रास्ते का उनको अनुभव नहीं है वो बेचारे परेशान होंगे।


सड़क बनने का टैंडर मार्च 2019 में छूट चुका था और मैं सोचता रहता था कि सड़क बने तो ही मां मरना,तब तक मत मरना और मां से यह कहता तो मां कहती मैं तो परमात्मा से प्रार्थना करती हूं तुम्हारी सड़क कल बन जाए और मैं मरूं, बहुत दुःखी हूं। मुझे उठा ले परमात्मा, लेकिन मां को  दो साल तीन महीने और जिंदा रखने के लिए सड़क निर्माण विभाग,पंच, सरपंच, ज़िला परिषद,व सरकार का बहुत बहुत धन्यवाद।


सड़क जितना लेट होगी मां उतना और जीती रहेगी।

लेकिन आखिरकार मां हार गई और सड़क निर्माण विभाग व सभी सरकारी नुमाइंदे जीत गए।


मेरी अजीबोगरीब इच्छा अभी हाल फिलहाल पूरी नहीं हुई है लेकिन इस इच्छा पर पत्थर पड़ चुके हैं और जल्द पूरी होने की आस है।

वैसे पत्थर पिछले दो साल से पड़े हैं

लेकिन शायद इन पत्थरों का वज़न कुछ कम था जो मां चल बसी।


अधूरे रास्तों की अपनी इच्छाएं होती हैं और मां की अलग इच्छा,कि मुझे जल्द मरना है और मेरी अलग इच्छा कि मां के मरने से पहले सड़क पक्की हो जाए।


मेरी ही अजीबोगरीब इच्छा नहीं थी,

लोगों की भी अजीबोगरीब इच्छा थी,

साधारणतया लोग सड़क जल्द बनने की इच्छा रखते हैं लेकिन यहां मामला उल्ट था ज्यादा लोग सड़क के न बनने पर खुश थे वे चाहते थे कि यह सड़क न बने।


मां के मरने के बाद बहुत लोग घर पर शोक व्यक्त करने आए, लेकिन एक बात कमाल रही, करोना नहीं आया, वह जा चुका था, करोना मां के लिए रास्ते साफ़ कर रहा था वह बहुत शांत हो गया था, उसकी शांति सबको चैन दे रही थी।


कुछ लोग हमेशा काम करते रहते हैं वे शोक व्यक्त करने नहीं आ सके, शायद उनके काम ही उनकी इस राह में रोड़ा बने होंगे, क्योंकि आते किस मुंह से ग़ालिब....?

लेकिन एक नया रिसर्च उन्होंने इस बीच कर दिया कि मातम पर बैठे हुए भी मुझे ज़िला कार्यालय में बुलाकर।


अब मैं सड़क से सवाल किया करूंगा कि तू मेरी मां के मरने के बहुत बाद आयी है? शोक व्यक्त करने भी नहीं आ सकी,यह उलाहना तुझ पर उम्र भर रहेगा।


सूबे सिंह सुजान,

 कुरूक्षेत्र, 

 हरियाणा