शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

जीवन सत्य ज्ञान, आत्मिक सौंदर्य के लिए आपको ही स्वयं गतिशील, संघर्षशील होना होता है

 प्रकाश भी अच्छा है और अंधकार भी अच्छा है।

यदि आप जागरूक हैं तो अंधकार और प्रकाश में कोई अन्तर नहीं है। यदि आप ज्ञान को प्राप्त कर चुके हैं यदि आप श्रेष्ठता को प्राप्त कर चुके हैं यदि आप गुणग्राही हैं आप सुनना जानते हैं आप शांत हो चुके हैं तो आप निर्भय हो चुके हैं आपका भय समाप्त हो गया है तो आप अंधकार से पार प्रकाश देख सकते हैं और यही ज्ञान कहा गया है।

महर्षि या सन्त वही लोग कहे गए हैं जो निर्भय हो चुके थे जो जल व अग्नि को पहचान गए थे जो रात दिन को एक ही दृष्टि से देख पाते थे वह जीवन व मृत्यु में भेद नहीं देखते वह अपने व दूसरे में भेद नहीं कर सकते हैं जो हर जगह को एक समान दृष्टि से देख पाते हैं।


मनुष्य समय समय पर अपने विचार व्यक्त करता है जब तक वह अबोध है वह तब तक अलग-अलग विषयों, विचारों को अपनाता है और जिससे प्रभावित होता है उसको तत्परता से अपनाता है परन्तु अगले क्षण दूसरा विचार प्रभावित करता है तो उसको अपनाता है यह क्रम हमारी अबोधता को प्रकट करता है अर्थात हम अबोध बालक की तरह क्रिया कर रहे हैं हम पचास या अस्सी वर्ष की आयु तक भी एक बच्चे की तरह ही जीवन क्रियाएं कर रहे हैं हमें ज्ञान की आभास नहीं हुआ है हमने जीवन क्रियाओं को ध्यान से नहीं देखा है हमने जीवन उद्देश्य को समझने का तनिक प्रयास नहीं किया है।

इसके विपरित कुछ सन्त लोग ज्ञान को प्राप्त होते हैं और आधुनिक भौतिक सुख विज्ञान से लथपथ मनुष्य उसके ज्ञान को पाखंडता भी कहता है तो उसको कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि वह उसके मूर्ख व्यवहार को अधिक समझता है और उस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी अन्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ती बल्कि ज्ञान के लिए स्वयं की आवश्यकता होती है और वह स्वयं ही संघर्षशील होना होता है स्वयं ही गतिशील होना अति आवश्यक है। अनेकों पुस्तकें, आचार्य, बुद्धिजीवी उस मार्ग के लिए आपके रास्ते को सुगम तो बना सकते हैं लेकिन आपको ज्ञान नहीं दे सकते उसके लिए आपको ही गतिशील,संघर्षशील होना होता है। मनुष्य के स्वयं पाले गए दंभ, अहम् ही उसके शत्रु हैं वह शत्रु स्वयं पाले गए हैं लेकिन मनुष्य यह नहीं समझ पाता और दूसरों को दोष देता रहता है।आधुनिक विज्ञान हमें अत्यंत भौतिक सुख सुविधाएं दे सकता है लेकिन आत्मिक सौंदर्य, आत्मिक शांति, ज्ञान, व्यवहार, उपयुक्त आचरण नहीं दे सकता इसके लिए हमें मनन, आत्मिक अभ्यास स्वयं ही करना होता है यही जीवन चक्र में समाहित है।

हम एक समय में जिन विचारों को उपयुक्त ज्ञान मान लेते हैं लेकिन दूसरे समय में ही उस विचार को उससे बेहतर मिलने पर त्याग भी देते हैं तो विज्ञान भी यही है यह स्थाई नहीं है सीखने की प्रक्रिया ही अस्थायी है लेकिन सीखा हुआ स्थाई होता है वह आत्मिक सौंदर्य होता है जो सीखा हुआ है।

एक बच्चा दुनिया में आने पर ही सीखना प्रारंभ करता है और अंतिम समय तक सीखता ही रहता है लेकिन उसके शरीर की भौतिकता में जो बदलाव निरंतर होता आया है वह भौतिक मात्र है परन्तु जो ब्रह्म ज्ञान,आत्मिक ज्ञान इस शरीर के माध्यम से उसने प्राप्त किया है वह वस्तुत सत्य ज्ञान है वह ही इस शरीर का उद्देश्य है उसी ज्ञान के लिए ही इस शरीर को धारण किया गया है उस आत्मिक ज्ञान सौंदर्य का आनन्द परम आनन्द है।


सूबे सिंह सुजान






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