मंगलवार, 15 जनवरी 2013

आज आदमी जब भी आदमी से मिलता है।

आज आदमी जब भी आदमी से मिलता है

दिल्लगी छुपाता है बेबसी से मिलता है।।

वो सुकूँ मुझे दुनिया में कंही नहीं मिलता,

जो सुकूँ मुझे तेरी दोस्ती से मिलता है।।

खुद नहीं कभी हिलता, जैसे पेड ग़म का है,

जब मिलता है मुझसे ख़ामशी से मिलता है।

क्या बताऊँ मैं कुछ भी तो बता नहीं सकता,

बेवफ़ाई से या वो दोस्ती से मिलता है।।

बेवकूफ़ हूँ मैं, जो उसपे शक किया मैंने,

वो तो रस भरा है जो हर किसी से मिलता है।

………..सूबे सिंह सुजान……………….

रविवार, 6 जनवरी 2013

GHAZAL LIKHNE KA PRYAS-------आओ ग़ज़ल सीखें।

गज़ल विधा बहुत ही संगीतात्मक व लयात्मक है। इसमें बहर का खास तौर पर ध्यान खा जाता है और यह बहुर ही संगीत की पहली सीढी होती है। हम नवलेखकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिये।. आजाद लिखने,आजाद विचार प्रकट करने आदि विधि या तरीके हमें ग़लत करने को प्रेरित  करते हैं।  ताजा घटनाक्रम से भी आप यह समझ सकते हैं कि रेप के मामले उतने ही ज्याद इसलिये बढे हैं क्योंकि हमारे बंद वातावरण में अचानक टी.वी. व फिल्मस आदि का बेतहाशा गालियाँ बकना जैसा माहौल पैदा करना रहा है।। ाप इस बात को सही ऐसे समझ सते हैं कि- वा का मंद बहना सबको आन्नद प्रदान करता है। अगर हवा तूफान बन जाये तो नुकसानदायक होगी। उसी प्रकार काव्य में छन्द हैं अगर हम बेबहर,बिना छन्द लिखेंगे तो वह बेरोकटोक आँधी का रूप धारण कर लेती हैं। और फलस्वरूप समाज को नुकसान पहुँचाती हैं।

 

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दोस्तो आप जो ऊपर देख रहे हैं वह इस ग़ज़ल का छन्द है। अर्थात बहर....मित्रों ग़जल केवल बहर में ही लिकी जाती रही है। और लिखी जानी चाहिये। क्योंकि बहर या छन्द भाषा को लयात्मक बनाते हुये। मात्राओं का एक समान, या एक नाप है। जो संगीत को संगठित करते हुये सुशोभित करता है। आप कह सकते हैं कि छन्द एक तरह की संगीत की धुन को पहले से ही तैयार करता है।

अब आप ऊपर की मात्राओं को देख कर लघु, गुरू का द्यान रखते हुये पढिये। एक खास ध्यान इस बात का भी रखिये कि किसी भी शब्द की आखिरी को लघु पढा जा सकता है। यह कवि  के लिये छूट दी गई है। जानकार इन बातों को अच्छी तरह जानते हैं लेकिन नये लोग बहुत हैं जो फेसबुक पर ग़ज़ल लिखने का प्रयास करते रहते हैं लेकिन वह ग़ज़ल छन्द से बिल्कुल अनजान हैं । मेरा प्रयास है उन सब नवलेखकों को थोडा बहुत छन्द का ज्ञान कराया जाये। ताकि वे भविष्य में किसी गुरू की तलाश कर उनसे भलि-भांति सीख सकें।।

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जिंदगी हम भी समर तक आ गये।

गाँव से चलकर नगर तक आ गये।।

मुस्कुराते - मुस्कुराते वो सभी …,

रास्ते के पेड घर तक आ गये।

सामने आते ही उनके यूँ हुआ,

ज़ख़्म सब दिल के नज़र तक आ गये।

खूबसूरत सी बला लगती है वो,

बाल जब सर के कमर तक आ गये।

एक जंगल में पुराना पेड हूँ,

काटने को वो इधर तक आ गये।

प्यार एहसासों से निकला इस तरह,

दिल के रिश्ते अब खबर तक आ गये।।

…………………………………सूबे सिंह सुजान

इस ग़ज़ल में मेरा प्रयास रहा ही कि कम से कम मात्रायें गिरायी गई हैं।

मात्रा गिराना---किसी भी शब्द के अन्त में आई दी्र्घ मात्रा को लघु मानना। कहलाता है।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

ग़ज़ल—जिंदगी हम भी समर तक आ गये।।

जिंदगी हम भी समर तक आ गये।

गाँव से चलकर नगर तक आ गये।।

मुस्कुराते  -  मुस्कुराते  वो   सभी …,

रास्ते के पेड  घर तक आ  गये।

सामने  आते  ही  उनके  यूँ  हुआ,

ज़ख़्म सब दिल के नज़र तक आ गये।

खूबसूरत सी बला लगती है वो,

बाल जब सर के कमर तक आ गये।

एक जंगल में पुराना पेड हूँ,

काटने को वो इधर तक आ गये।

प्यार एहसासों से निकला इस तरह,

दिल के रिश्ते अब खबर तक आ गये।।

…………………………………सूबे सिंह सुजान

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

hydrabad..हैदराबाद शहर

मुझे दिसम्बर 2012 में हैदराबाद,आंध्र प्रदेश जाने का अवसर मिला यह पहला अवसर था जब मैं पहली बार दक्षिण भारत के किसी शहर में गया। सुना था कि यह नवाबों का शहर है लेकिन मैं इस शहर की नवीन शैली,हाईटेक सिटी व इसकी पुरानी सभ्यता का महान सिलसिला तथा आज के दौर का शहर सब कुछ बहुत ही सुन्दरता के साथ मन को सुशोभित कर रहा था  वर्तमान समय शहर बहुत ही सुन्दर व सडकें एकदम से स्वस्थ,कंही भी किसी प्रकार का कोई कट नहीं। मौसम ने तो शहर में चार चाँद लगा रखे हैं।धूल नाम की चीज नहीं।

अगर हम हरियाणा से हैदराबाद का मुकाबला करें तो पायेंगे कि हरियाणा तो बहुत ही पिछडा नजर आयेगा। जबकि हरियाणा के गाँव आंध्र प्रदेश के गाँवों से बेहतर है। लेकिन केवल हैदराबाद का मुकाबला गुडगाँव भी नहीं आता।।

दूसरा – मैं रात के बारह बजे भी जब शहर में  घूम रहा था तो पाया कि यहाँ लडकियाँ आधी रात तक भी सुरक्षित हैं। जबकि हरियाणा में घर में भी असुरक्षित हैं।भारत में यह अन्तर देखकर हैरानी होती है। कुल मिला कर मैं कह सकता हूं कि हैदराबाद संस्कृतियों का संगम है।

रविवार, 2 दिसंबर 2012

फिर रात मेरे पास में बैठी चली गई।

ऐ- दोस्तो बहुत ही नुकीली है जिन्दगी
हिम्मत तो देखिये फिर भी जी ली है जिन्दगी
सब दाल भात इसमें पकाया जा सकता है,
चूल्हे पे रक्खी एक पतीली है जिन्दगी

 

 

एक शेर खास…….

 

फिर रात मेरे पास में बैठी चली गई।
कैसा हूँ,दिल की बात भी पूछी चली गई।

फोटो……….खुशबू

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शुभ तारिका में प्रकाशित ग़ज़ल

खिली रहती है इक मुस्कान मेरे दिल के कोने में।P1212021326044

 

सूबे सिंह सुजान

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

ईशाकपुर का जंगल

एक ईशाकपुर नामक गाँव   की ज़मीन में अभी एक साल पहले तक एक पुराने समय जैसा जंगल था। यह लगभग सौ एकड का जंगल था।उस जंगल की खासियत यह थी कि वहां वही पुराने पेड,झाडियाँ,करोंदे के पेड,बेर की झाडियाँ व अन्य सब तरह के पेड मौजूद थे। अभी एक साल पहले की ही तो बात है वहाँ हर तरह के पक्षी मज़े से रहते थे। अनेकों रंगों  की चिडियाँ भी थी। काफी सालों से गाँव की पंचायत चाह रही थी कि जंगल की ज़मीन को खेतों में तबदील कर लिया जाये तो इस ज़मीन को ठेके पर देकर पंचायत को अच्छा लाभ प्राप्त हो सकता है।किसान लोग खेती करेंगे और पंचायत को प्रतिवर्ष ठेके के रूपये प्राप्त होते रहेंगे जिससे गाँव की गलियों व अन्य काम आसानी से हो सकेंगे। लेकिन दूसरी तरफ कुछ गाँव के ही लोग थे जो चाह रहे थे कि यह काम न होने पाये। इन लोगों में कोई भी ऐसा आदमी नहीं था जो यह चाहता हो कि जंगल की निशानी को बचाया रखा जा सके और इसलिये जंगल के काटे जाने का विरोध करता हो, बल्कि इसलिये विरोध करते थे कि कंही सरपंच और उसका खेमा यह काम करके वाहवाही न लूट ले। और फिर से अगले चुनाव में कंहीं उनको जनता दुबारा न चुन दे।

    इस तरह दोनों खेमों में कईं बार तनातनी भी हुई  लेकिन सरपंच की पक्ष का खेमा बहुत ठंडे स्वभाव का था जिस कारण हर बार टकराव  टलता रहा। यह गाँव के लिये व गाँव के लोगों के लिये बहुत अच्छी बात रही कि कभी कोई ख़ास झगडा आपस में नहीं हो सका।  कुछ समझदार लोगों के बीच में आने से यह टकराव टलता ही रहा।लेकिन इस गाँव का दुर्भाग्य यह है कि इन लोगों ने अपनी राजनीति की जंग में गाँव के सार्वजनिक काम नहीं होने दिये। जितनी भी सरकारी ग्रांट आई सब कामों पर झट से स्टे लगया जाता रहा। और गाँव की जनता के सारे काम अधूरे ही पडे रहे। और फिर एक दिन पंचायत कोर्ट केस जीत गई और  पुलिस की मदद से बी.डी.ओ. व तहसीलदार की उपस्थिति में जंगल के पेडों को कटवा कर उसके खेत बनाये गये। बहुत से ठेकेदारों को लकडी काटने का काम मिला जिसमें से तहसीलदार व बी.डी.ओ. का हिस्सा भी था। बेचारे गाँव के गरीब ठेकेदारों को यह काम नहीं मिल सका क्योंकि जब बोली की गई तो वह यह बोली नहीं दे सके। जबकि बाद में पता चला कि जो बोली मौके पर दिखाई गई थी वह तो झूठी थी असल बोली तो बहुत कम थी। हो भी क्यों न क्योंकि उऩ मोटे ठेकेदारों ने उसमें से मोटा हिस्सा बी.डी.ओ. व तहसीलदार को देना था।

                                      भारत की आज़ादी के बाद इसकी तरक्की में भारत के लोगों का ही बाधा के रूप में सबसे आगे आना ही एक मुख्य कारण रहा है  इसकी आज़ादी को अंग्रजों की अपेक्षा इन स्वदेशी अंग्रजों से ज्यादा खतरा आज तक रहा है। जो बदस्तूर ज़ारी है। जो अपनी राजनीति के चक्कर में हर ग़लत काम को अंज़ाम देते रहे हैं। इसी तरह उपर की राजनीति में है। यह तो एक गांव की राजनीति है। राज्य व राष्ट्रीय राजनीति में तो बहुत बडे गडबड घोटाले होते हैं आजकल जो उजागर होने के बाद भी जनता पर कुछ खास असर नहीं डाल पा रहे हैं। जनता को कुछ समझ नहीं आ रहा है कि कौन भला कौन बुरा है। जनता अच्छे आदमी की पहचान भी भूल गई है शायद, उसके सामने अच्छा आदमी हो तो वह उसको समझ नहीं पाती और फिर से ग़लत आदमी को चुन लेती है और हर बार पछताने के सिवा उसके पास कुछ नहीं रह जाता है।

  आज जब आठ साल का आरूष और मैं उस जंगल वाले खेतों के पास सटे एक डेरे में एक हड्डियों के डाक्टर के पास अपने पिता जी की टूटी हुई हड्डी को दिखाने गये तो आरूष ने इन चिडियों को देखा तो वह कह उठा कि डाक्टर बाबा आपके पास तो बहुत रंग-बिरंगी चिडियां हैं एक हमें भी दे दो। इस बात पर डा. पाल ने बताया कि बेटे अब इन चिडियों का घर ही लुट गया है इनको कौन और कब तक पाले रख सकेगा। वह बोले मैंने पिछले एक साल से चावल की कंई बोरियाँ इनके लिये कुटवायी हैं और प्रतिदिन सुबह इन्हें डालता हूँ जिसे खाने के लिये यह आती हैं और मेरे घर के आसपास इन्होने अपने घोंसले बना लिये हैं। वह आगे बोले कि जितना मुझसे हो सकेगा उतना मैं इन्हें खिलाता-पिलाता रहूँगा। यह हमारी लालची दिनचर्या का नतीज़ा है कि हम कुदरत की इन उडती हुई परियों के सौन्दर्य को भूल रहे हैं। इनमें असीम आन्नद है। ये चिडियाँ हमारे मन को शान्ति प्रदान करती हैं यह सोच  ही मानव की भावनाओं को मानव के करीब रखती है और हमें मानवता का पाठ पढाती है। मेरे बच्चे हमें इन चिडियों से प्यार करते रहना चाहिये यह हम मानवों की तरह इसी प्रकृति का हिस्सा हैं हमें कोई अधिकार नहीं कि हम इनके घोंसलों को तोडें। ये चिडियाँ तो जीवन का सबसे आन्नदायक गीत हैं जिसे गुनगुनाते हुये किसी वाध यन्त्र की आवश्यकता नहीं होती बल्कि प्रकृति स्वयं संगीत को बजाती है।

 

                                                                                                                                                                                                     सूबे सिहं सुजान

                                                                                                                                                                                                      29-10-2012

                                                                                                                                                                                                      करूक्षेत्र (09416334841)

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

शनिवार, 29 सितंबर 2012

दूसरे को तुच्छ कहने के पीछे क्या सोच होती है।

एक मुशायरे में भारत के दिग्गज सायर अपनी ग़ज़लें पढ रहे थे। कार्यक्रम के अंत में लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया प्रकट कर रहे थे। एक महाश्य अच्छे शायर थे लेकिन उनको अच्छे-अच्छे शायरों में कोई भी अच्छा नहीं लगा । हां लेकिन उन्होने एक सुंदर शायरा की जरूर तारीफ की। और कहा कि मुन्नवर राणा व राहत इन्दौरी  की कुछ ख़ास शायरी नहीं हैं। इनसे अच्छी तो ये कल की शायरा है। इस वाक्य को सुन-देख मुझे बडी हैरानी हुई। क्या सोच होती है आदमी की एक नामवर शायर को भी तुच्छ कैसे कहा गया है। उस महाश्य के मन में क्या रहा है। इसमें कोई शक नहीं है। उस महाश्य को पहले तो यह लगता है कि मैं ही अच्छा शायर हूँ और कोई हो ही नहीं सकता। वह किसी की तारीफ़ कर ही नहीं सकते जो ख़ुद की तारीफ सुनना पसंद करते हैं। दूसरा सोने पे सुहागा ये हुआ कि वहां उनकी सोच के मुताबिक सुन्दरता की देवी मौजूद थी तो वह और किसी को अच्छा कैसे कहे भला। 

इस प्रकरण में यह भी तथ्य है कि उस आदमी को ऐसी बातें करने से मिलता क्या है क्या सामने वाले पर कोई असर पडता है। ऐसा नहीं है उसको तो मालूम भी नहीं कि उसने उसके बारे में क्या सोचा है। वह अपना काम तत्लीनता से कर रहा है और जब तक आदमी को पता ही नहीं कि उसके बारे में किसी ने क्या कहा है उस पर किसी प्रकार का असर भी नहीं पडता यह भी प्राकृतिक है। मानवीय स्वभाव हैं दोनों तरफ़- यह हर स्तर के व्यक्ति के साथ होता रहता है। यह मानवीय स्तरों के हर स्तर पर होता है मानव अपने आप से बहुत संतुष्ट होता है वह दूसरों की आलोचना करने में भी संतुष्टि प्राप्त करता है। लेकिन आलोचना तो होना व करना अच्छी बात है। लेकिन जब आलोचना ही बेहुदी तरीके की हो। जिसमें  से घृणा ही साफ़ झलकती हो तो वह स्वस्थ प्रकार की आलोचना न होकर ईर्ष्या से प्रेरित आलोचना है।

                                                                                 सूबे सिंह सुजान

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

लोक कथा में मानव के लिये अदभुत सीख ।

एक तेली प्रतिदिन तेल बेचने जाता था। एक दिन वह बहुत दूर निकल गया और घने जंगल में रास्ता भटक गया था । शाम होने को थी और वह आज के दिन कुछ भी तेल नहीं बेच पाया था । अचानक उसे एक साँप दिखाई दिया पहले वह घबराया किन्तु साँप को वापिस जाता देख वह ठहर गया और साँप की ओर देखने लगा। कुछ ही देर में साँप बिल में गया और तुरन्त एक सोने की मोहर लेकर वापिस आया। जिसे वह वहीं छोड कर वापिस बिल में चला गया। तेली के मन में आया कि आज तो अच्छी दिहाडी निकल गई और मोहर को उठाने ही वाला था कि साँप दुबारा फिर बाहर आ गया साँप को देखकर तेली दौड कर पीछे हटा। लेकिन इस बार फिर साँप ने एक ओर सोने की मोहर वहीं छोड दी इस तरह साँप का यही क्रम चलता रहा और वहाँ पर सोने की मोहरों का ढेर लग गया। जब साँप का निकलना बंद हो गया तो तेली ने सारी सोने की मोहरों को उठाना चाहा लेकिन वह उन्हें किस वस्तु में डाले यही सोच रहा था कि उसे ध्यान आया कि जिस डोलची में तेल लिये है क्यों न उसी में डाल ले, ओर उसने वह तेल वहीं मिट्टी पर गिरा कर सोने की मोहरें उस में डाल ली। और आगे की ओर चलने लगा लेकिन शाम हो रही थी  तो उसने रात को ठहरने के लिये किसी जगह की तलाश शुरू कर दी। कुछ देर चलने के बाद उसे एक गाँव नज़र आया। वह गाँव में गया सामने वाले घर में जाकर कहा कि मुझे रात को ठहरने के लिये जगह दे देंवे।

 

घर का मालिक जो कि जाति से बनिया था बोला कि आप कौन हैं,कहाँ से आये हैं और क्या काम करते हैं। तेली ने जवाब दिया कि वह तेली है और हर रोज़ तेल बेचता है लेकिन आज उसका तेल भी नहीं बिका और वह जंगल में भटक गया इसलिये घर नहीं जा सका। बनिये ने उसकी परेशानी को समझते हुये उस पर विशवास करके उसे घर में पनाह दे दी। रात को तेली को खाना खिला कर सुला दिया गया। जब आधी रात हुई थी कि बनिये के घर में बहु को बच्चा हुआ और दाई ने तेल माँगा। लेकिन बनिये के घर में तेल नहीं था बनिये को तभी याद आया कि तेली के पास तो तेल जरूर होगा उसने जाकर तेली की डोलची में तेल देखा तो हैरान रह गया कि उसमें तेल नहीं सोने की मोहरें थी। उसने सोचा तेली ने झूठ बोला है तो क्यों न मोहरें चुरा लें और बनिये ने सारी मोहरें चुरा ली और मोहरों की जगह गाँव से तेल लाकर डाल दिया क्योंकि तेली ने कहा था कि उसका डोलची में तेल है।

सुबह जब तेली उठा तो उसे नाश्ता करवा कर बनिया गाँव से दूर तक छोडने गया तेली बार-बार कह रहा था कि धन्यवाद आप वापिस जायें। लेकिन बनिया उसे दूर तक छोडने गया। जब  बनिया वापिस गाँव की तरफ जाने लगा तो कुछ दूर जाकर तेली ने उत्सुकता पूर्वक डोलची को खोला तो उसमें सोना न पाकर व तेल देखकर उसके होश गुम हो गये।उसे गहरा सदमा लगा। वह इसी सदमें में सोच ही रहा था कि उसके पास एक आदमी आया। उसने पूछा कि आप इतने घबराये से क्यों लग रहे हैं। तेली ने सारी घटना बताई तो उस महर्षि ने बताया कि भाई इस घटना पर इतना दुखी मत हो क्योंकि वो सोने की मोहरें तेरे भाग्य की नहीं थी। वह तो बनिये के भाग्य की थी जो तेरे माध्यम से वहाँ पहुँचाई गई हैं। वह तेरी नहीं थी तेरे भाग्य में रोज तेल बेचना ही है यही तेरा काम है। जो कल तेरा तेल नहीं बिक सका था उसके एवज़ में तुझे कल का खाना मिल चुका है और आज का तेल तेरे पास है। यही भगवान की मरजी थी जो भगवान चाहते हैं वही होता है उसके बिन चाहे कुछ नहीं होता। प्रकृति ने सबके हिस्से के काम बाँट रखे हैं जो आपका काम है वह आपके पास है इसका मतलब आपका कुछ खोया नहीं गया है। 

                                                                    sube singh sujan

                                                                  9416334841

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

धूप का बोझ……..

धूप का बोझ सर पर उठा कर चला………..

देखिये वो बडा हौंसला कर चला…………….

मैं वफा की इबादत करूँ कब तलक,   

बेवफा तू मुझे बेवफ़ा कर चला……….सुजान

सोमवार, 27 अगस्त 2012

सावन का देर से आना।

आज हम सावन के आने पर भी खुश नहीं हैं क्योंकि वह देर से आया है लेकिन इसमें सावन का क्या दोष है। वह तो हमें फोलो कर रहा है। देर से आने का तो हमारा लम्बा इतिहास है। जो हमारे नेताओं की देन है। हमें इस मामले में नेताओं का शुक्रगुज़ार होना चाहिये। जिन्हें हमें यह सुदृढ परम्परा दी है। हमें नेताओं की कुर्बानियों को यूँ ही नहीं भुलाना चाहिये।  अब हम थोडा सा इस परम्मरा के इतिहास के बैकग्राऊंड पर नज़र डालते हैं। अक्सर नेता लोग ही लेट आते थे फिर धीरे-धीरे पता चला कि हमारे देश के कर्मचारियों को भी नेताओं की रीस हो गई और वो भी नेता के पदचिन्हों पर चलने लगे। नेताओं का देखिये आज कहां तक असर हुआ। अब इस देश में हर आदमी लेट आने को बडा हुनर मानने लगा है। सबमें होड लगी है लेट आने की। नेता से लेकर हर कर्मचारी अब लेट आने की तैयारी करता है। वह पूरी प्लान के साथ लेट होने के फायदे ढूंढता है। नेता का लेट होना तो ठीक था। और सबकी आसानी से समझ में भी आता था कि जब तक लोग अधिक से अधिक इक्कठ्ठे नहीं हो जाते तो नेता का सभा में आने का क्या फायदा । क्योंकि नेता को तो हमेशा जनता की फिक्र रहती है ना भला। उसे जनता के सिवा कुछ सूझता ही नहीं। जनता ही उसकी अन्दाता है,जनता ही उसकी विधाता है। अब गरीब बेचारे भगवान को पूजते रहते हैं। और नेता गरीब को पूजता है। है न चमत्कारी देश। नेता का पेट फूलता है,गरीब का पेट पतला होता है।

 

नेता ने सबको सिखाया कि देर से आना बहुत फायदेमंद है। और लगभग हर विभाग के कर्मचारियों ने इस तथ्य को परखा और फोलो करना शुरू कर दिया। फिर इन्हें देखा-देखी स्कूल में अध्यापक लेट आते, तो बच्चों ने भी लेट आना शुरू किया। बच्चों को खूब मज़ा आने लगा। और हालात मज़े के अब यह हैं कि बच्चों ने लेट आना सीखने के बाद बताया कि जो पढा-पढाया ही खरीद ले वो ज्यादा समझदार कहलाता है तो हर तरफ यही फिकरा हवा में गूंजने लगा। कि पढने वाला बेवकूफ और जो पढा-पढाया प्रमाणपत्र ले आये वह ही असली समझदार होता है। क्योंकि काम तो आदमी की योग्यता ने करना है। तो जो योग्य होगा भला उसे पढने की क्या जरूरत, पढने की जरूरत तो उसे है जो योग्य नहीं। और सिलसिला यूँ चला कि हर स्कूल के विद्धयार्थी पढना छोड कर जुगाड तकनीक का प्रयोग करने लगे। और नये-नये कीर्तिमानों की झडी लगा दी। खिलाडियों ने भी नेताओं की राह पर चल कर खेलों में नशीली दवाओं का प्रयोग करके खूब नाम और पैसा दोनों कमाये।

इस तरह मौसम ने भी आदमी से ही सीखा कि देर से आने के अपने फायदे हैं। अब देखिये ना कि पिछले कईं सालों से किसानों ने बेहद अनाज पैदा किया जिसे रखने के लिये सरकार के पास जगह नहीं रही और उसे समुद्र में फेंकना पडा। अब अगर जगह नहीं है तो समुद्र में ही फेंकेंगे ना। और कहां रखेंगे भला। जब अनाज ज्यादा होगा तो अब उसे कम करने के लिये आदमी तो सोचता नहीं तो मौसम को ही सोचना पडेगा। और मौसम ने सोचा। और इस बार देर से आया ताकि जो फ़सल किसान ने मर-मर कर खडी कर ली है। वह तो बम्पर होने वाली है। तो नेताओं ने सोचा कि इस बार हम इतने सारे अनाज को कहां रखेंगे। और मौसम विभाग को कहा देखो अगर आप लोगों को तन्ख्वाह लेनी है तो सावन को लेट कर दो। ताकि जो फ़सल किसानों ने उगा ली है। उसे बिना किसी लाग-लपेट के नष्ट किया जा सके।सांप  भी मरे और लाठी भी न टूटे। मौसम विभाग ने सावन से कहा देखो भई सावन अगर हमारे देश में हमारी इजाजत के बैगर आये तो आपकी खैर नहीं । इसलिये जब हम कहें तभी आना । और सावन आदमी से डर गया। सावन ने सुन रखा था कि आजकल आदमी खुद ही कृत्रिम बरसात कर लेता है। तो कंही कल मेरे ऊपर ही बैन ना लगा दे और वह चुपचाप मौसम विभाग की बात मान गया । और देर से आया और खूब आया ताकि सरकार को खूब मज़ा आये और कल हो सकता है सरकार मुझे ‘भारत रत्न’ से ही पुरस्कृत कर दे।

                                     सूबे सिंह सुजान

                                      e-mail-subesujan21@gmail.com

                                mob.09416334841

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कुरूक्षेत्र में मुशायरा।

अमीन साहित्य सभा की तरफ से स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 2012 को सांय 7 बजे मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें  जिला कांग्रेस के अध्यक्ष जय भगवान शर्मा (डी.डी.) मुख्य अतिथि रहे। व अध्यक्षता की करनाल से आये डा. महावीर शास्त्री ने। मंच के साहित्य अतिथि के रूप में डा. सत्य प्रकाश तफ्ता ने शिरकत की। मुशायरे में भाग लेने वाले मुख्य शायरों में चण्डीगढ से सत्यपाल सरूर, अम्बाला से रमेश तन्हा, करनाल से डा. सरिता आर्य,डा. ज्ञानी देवी, कैथल से गुलशन मदान, कमलेश शर्मा, पेहवा से डी.पी. दस्तूर, श्याम लाल बागडी, तथा कुरूक्षेत्र से स्थानीय शायरों में सत्य प्रकाश तफ्ता,डा. कुमार विनोद,डा. बलवान सिंह, सूबे सिंह सुजान,डा. सलोनी,डा. दिनेश दधीचि,दीदीर सिंह कीरती, दीवाना,कस्तूरी लाल शर्मा शाद,ओम प्रकाश राही,डा. सुधीर कुमार रामेशवर दास गुप्ता आदि शाइर, कवियों ने जम कर ग़ज़लें व कवितायें पढी।

कवियों ने भारत माता को याद किया व शहीदों के बलिदानों का गुणगान किया। सुजान ने अपने हाइकु में कहा-अमर रहे। बलिदान शहीदों का, अमर रहे। और ग़ज़ल के तीखी संवेदना को झकझोरते हुय़े शेर देखिये- बम फटा था निशान बाकी है, पूछ ले कोई जान बाकी है।डा. सरिता आर्य का बदलाव का नया रंग--- रिवायतों के सहारे कब तक कटेगी ये उम्र,आओ कुछ तोड-फोड करें सुधार के लिये। सत्यपाल कौशिक  ने कहा—वफ़ा के शहर में मक़बूल थी सदा अपनी,मगर न पहुंची ये उन तक भी ना रसा-कितनी। रमेश तन्हा ने कहा—बेलौस रही सदा मुहब्बत तेरी,तू न ले कभी किसी से नफ़रत । गुलशन मदान ने कहा—कुछ मत पूछो अपना हाल, कुदरत ने किया कमाल।।

डा. महावीर प्रसाद शास्त्री की कविता बहुत ही गहनता लिये हुये थी। जो स्त्री की मार्मिक अनुभूति को बयान करती है। देखें—पुरूष हमें तब चूमते हैं,जब हम सोये हुये होते हैं आराम से,और हम उनहें तब चूमती हैं, जब वे रो रहे होते हैं। और देश के हालात पर देखिये कितनी सार्थक कविता –ये चाँदी का टुकडा तेरा,ये चाँदी का टुकडा मेरा, अपने-2 टुकडों में से काट कर कुत्तों को भी तो देना है,जो रात बिरात पैहरा देते हैं।

इस तरह कुल मिला कर यह मुशायरा सफल रहा।जिसके पुरोधा बेधडक शायर बाल कृष्ण बेज़ार रहे।

सोमवार, 13 अगस्त 2012

Akesios - Blog

Akesios - Blogसोमवार, 13 अगस्त 2012बम फटा था निशान बाकी है।
बम फटा था निशान बाकी है

पूछ ले कोई जान बाकी है।।

जितना सामान ता वो लूट लिया,

मेरे दिल की दुकान बाकी है।।

देश का हाल इस तरह का है,

टूटी तलवार,म्यान बाकी है।।

मैं मरूँगा नहीं किसी हालात,

मुंह में जब तक जबान बाकी है।

हमने लूटा जमीं,हवा,पानी,

लूटना आसमान बाकी है।।

दोनों के बीच में मरा मज़हब,

हिन्दू और मुस्लमान बाकी है।।

अपना अनशन भी बेनतीज़ रहा,

क्या अभी इत्मिनान बाकी है।।

मारने में कोई क़सर तो नहीं,

फिर भी कैसे सुजान बाकी है।।

सूबे सिंह सुजान

13.08.2012

बम फटा था निशान बाकी है।

बम फटा था निशान बाकी है 

पूछ ले कोई जान बाकी है।।

जितना सामान ता वो लूट लिया,

मेरे दिल की दुकान बाकी है।।

देश का हाल इस तरह का है, 

टूटी तलवार,म्यान बाकी है।।

मैं मरूँगा नहीं किसी हालात, 

मुंह में जब तक जबान बाकी है।

हमने लूटा जमीं,हवा,पानी, 

लूटना   आसमान   बाकी   है।।

दोनों के बीच में मरा मज़हब,

हिन्दू और मुस्लमान बाकी है।।

अपना अनशन भी बेनतीज़ रहा, 

क्या अभी इत्मिनान बाकी है।।

मारने में कोई क़सर तो नहीं, 

फिर भी कैसे सुजान बाकी है।।

                        सूबे सिंह सुजान

                       13.08.2012

रविवार, 12 अगस्त 2012

ग़ज़ल के दो शेर

बम फटा था निशान बाकी है

पूछ ले कोई  जान  बाकी है।।

जितना सामान था वो लूट लिया,

मेरे दिल की दुकान बाकी है।।

सूबे सिंह सुजान

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

कहानी---कैटी-एक बिल्ली का बच्चा

स्कूल में बच्चों ने एक बिल्ली का बच्चा पकड कर मुझे दिया। और कहने लगे कि आप इस बच्चे को पाल लें। बच्चा बहुत प्यारा था मैं भी मोहित हो गया। और उसे घर ले आया। घर पर बच्चों ने उससे पहले दिन तो दूरी बना कर रखी उन्हें उससे थोडा डर लग रहा था। लेकिन दो-चार  दिन बाद उससे इतने घुल-मिल गये कि उसके बिना खाना तक नहीं खाते थे। बच्चों को अपना प्यारा मित्र मिल चुका था। नीति फिर भी उससे दूरी बनाये रखती थी लेकिन आरूष हर पल उसके साथ ही रहता था। वह खाना भी उसके साथ ही खाता था। अगर उसकी माता उसे कहती कि खाना तो अलग बैठ कर ख लिया कर तो वह खाना खाने से ही मना कर देता था। इस पर उसकी मम्मी के लिये और आफ़त खडी हो जाती फिर वह बेटे को गले लगा कर,प्यार से मनाती और कुछ देर बाद उसका गुस्सा ठंडा होता और फिर वह खाना बिल्ली के साथ ही खाता। बच्चों में बिल्ली के प्रति प्यार को देखकर  मेरा मन खुश हो जाता था। मुझे अपने बचपन की यादें ताजा हो जाती थी। हालांकि मैं अपने बचपन में पालतु जानवरों के साथ खेलने को तो आतुर रहता था लेकिन खेल नहीं पाता था।क्योंकि पिता जी का इतना दबाव हमारे ऊपर रहता था कि हमें कभी खेलने का ठीक से अवसर ही नहीं मिल पाता था। हमारा बचपन का दौर केवल काम करने के लिये था। माता-पिता की आज्ञा मानना हमारे लिये ऐसा था जैसे कि भगवान की आज्ञा है कि जिसके आगे कोई चारा नहीं होता आदमी का,हमें जीवन के संघर्ष को अपने बचपन में ही सीख लिया होता था। आज हमारे बच्चों का बचपन ऐसा नहीं है। यह कितनी सुखदायक बात है हमारे लिये कि हम अपने बचपन को कष्टदायक जीते रहे और अपने बच्चों को वह कठिन बचपन नहीं दे रहे हैं। यही सोच, यही बात हमारे लिये मानवता का संदेश दे रही है।

 

आज बिल्ली का बच्चा  बडा हो गया है। आरूष के खेल का वह अभिन्न अंग है। उसकी दिनचर्या कैटी के साथ शुरू होती है और रात को सोने तक वह उसको बार-बार देखता है खिलाता है और तो और रात को सोते समय सपने में भी बिल्ली के बच्चे से बात करता पाता है। मैं बच्चों की मानसिकता को पढने का प्रयास कर रहा हूँ कि क्या अब बच्चे अपनी पढाई पर ठीक से ध्यान दे पायेंगे। कंही बच्चों की पढाई पर बुरा असर तो नहीं पडेगा। आज के माता-पिता की चिंता अलग प्रकार की है। वह बच्चे पर विभिन्न कोर्सों के पढने पर दबाव के प्रयास में रहता है।और यह प्रयास ही नहीं उनके स्टेटस सिंबल का बहुत बडा हिस्सा है। जो बच्चों के मन पर गहरा सदमा डालता है।जिस कारण बच्चे कईं बार आत्महत्या का कदम उठा लेते हैं।जीवन को जीना ज्यादा जरूरी है। क्योंकि जीवन जीने के लिये ही मिला है उस जीवन में वो क्या करेगा क्या नहीं यह भविष्य का प्रश्न है। इस बारे में कोई ठीक से नहीं कह सकता कि हमारे दबाव से ही बच्चा सही पढाई कर पाएगा।यह बात समय के गर्भ में ही रहती है। हालांकि प्रयास जरूरी तो होते हैं लेकिन डोर इतनी कभी न खींचो कि टूट जाये। इसी बात का ध्यान रखते हुये आरूष आज अपनी मित्र कैटी के साथ प्रसन्न है और पढाई भी ठीक कर रहा है।

                                                                                                                           लेखक- सूबे सिंह सुजान