दर्द के बारीक टुकड़े टुकड़े कर देना,
वरना ये पत्थर उठाये ही नहीं जाते।
सूबे सिंह सुजान
दफ़्तरों में दबे हुए लोगो।
कब उठोगे,मरे हुए लोगो।
एक दीवार तो खड़ी है अभी,
कुछ करो,कुछ बचे हुए लोगो।
चापलूसी को काटो, बढ़ती है,
बोलिए,देखते हुए लोगो।
तुम कहीं जा के सो न पाओगे,
भागते भागते हुए लोगो।
कैसे खामोश हो गए सारे?
बोलते बोलते हुए लोगो ।
अब तुम्हें वक्त ख़त्म कर देगा,
बांटते बांटते हुए लोगो।
सूबे सिं
नमामि गंगे नमामि गंगे, नमामि गंगे नमामि गंगे।
तुम्हारी कृपा से जी रहे हैं ,
हर एक तन में तुम्हारा जल है।
तुम्हीं तो जीवन बना रही हो,
तुम्हीं से कल था, तुम्हीं से कल है।
कहीं पे मछली कहीं मगरमच्छ ,
कहीं पे मेंढक उछल रहे हैं।
हजारों लाखों करोड़ों जीवन,
तुम्हारी गोदी में पल रहे हैं।
जटा से शिव की हुई प्रवाहित
लहर लहर सी लहर गई हैं
असंख्य नाले असंख्य नहरें,
इधर गई हैं उधर गई हैं।
सूबे सिंह सुजान
राजकीय मॉडल संस्कृति प्राथमिक विद्यालय हथीरा, कुरूक्षेत्र, हरियाणा
E mail - subesujan21@gmail.com
Mo
आप बेशक जाइये लेकिन पता बाकी रहे।
उम्र भर जिसके बहाने आप हमको याद आएं,
ज़िन्दगी में प्यार की ऐसी ख़ता बाकी रहे।
दोस्त हमने भी बनाए सैंकड़ों थे, कुछ मगर,
मेरे दिल से हो न पाये, लापता, बाकी रहे।
आप चाहें मुझसे करना दुश्मनी तो कीजिए,
सिर्फ़ दिल में प्रेम का इक देवता बाकी रहे।
दोस्ती ख़ामोशियों से कीजिए बेशक "सुजान"
पेड़-पौधों, रास्तों से वास्ता बाकी रहे।
सूबे सिंह सुजान
नवरात्र में मां देवी शक्ति की अराधना करते हुए यह काव्य पाठ माता ने लिखवाया है।
आप सब पढें,पूजा करें।
कलम तुम्हीं हो,कला तुम्हीं हो।
हे प्रेयसी, प्रेरणा तुम्हीं हो।
प्रसन्नता,नव्यता तुम्हीं हो,
सदा तुम्हीं हो,सुधा तुम्हीं हो।
गगन तुम्हीं हो,धरा तुम्हीं हो,
हरी भरी वाटिका तुम्हीं हो।
ह्रदय हरण हृदयिका तुम्हीं हो,
कमल नयन नयनिका तुम्हीं हो।
उठी हैं मन में,मृदुल हिलोरें,
प्रकट हुई भावना तुम्हीं हो।
तुम्हीं हो दुर्गा,शिवा तुम्हीं हो।
कपालिनी क्षमा तुम्हीं हो।
त्रिदेव की शक्ति आपमें है,
अनूप हो दश भुजा तुम्हीं हो।
रचित,रचा,आदिशक्ति माता,
प्रभात चारों दिशा तुम्हीं हो।
व्यथा तुम्हीं वेदना तुम्हीं हो,
मनुष्य की चेतना तुम्हीं हो।
हो अर्थ तुम,काम क्रोध तुमसे,
विज्ञान तुमसे,जया तुम्हीं हो।
हे धात्री हे कात्यायनी माँ,
है रूप तुमसे,छठा तुम्हीं हो।
हे बुद्धि दायक,अज्ञान नाशक,
सरस्वती हंसिका तुम्हीं हो।
सूबे सिंह सुजान
कुरूक्षेत्र, हरियाणा
9416334841
#आइए #हिन्दी #सुधारें
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हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...।
कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।
जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं...
जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...।
इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है...
इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।
इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।
'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है...
मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...।
क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...?
( 'मिलाई' ग़लत है...।)
आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...।
( 'जताई' ग़लत है...।)
उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...।
('पाई' ग़लत है...।)
अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...।
बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाये...।
( 'बनाए' नहीं...। )
लोगों ने नेताओं के सामने अपने-अपने दुखड़े गाये...।
( 'गाए' नहीं...। )
दीवाली के दिन लखनऊ में लोगों ने अपने-अपने घर सजाये...।
( 'सजाए' नहीं...। )
तो फिर प्रश्न उठता है कि 'ए' का प्रयोग कहाँ होगा..?
`ए' वहाँ आएगा जहाँ अनुरोध या रिक्वेस्ट की बात होगी...।
अब आप काम देखिए, मैं चलता हूँ...।
( 'देखिये' नहीं...। )
आप लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी के विषय में सोचिए...।
( 'सोचिये' नहीं...। ) नवेद! ऐसा विचार मन में न लाइए...।
( 'लाइये' ग़लत है...। )
अब आख़िर (अन्त) में 'यें' और 'एँ' की बात...
यहाँ भी अनुरोध का नियम ही लागू होगा...
रिक्वेस्ट की जाएगी तो 'एँ' लगेगा , 'यें' नहीं...।
आप लोग कृपया यहाँ आएँ...।
( 'आयें' नहीं...। )
जी बताएँ , मैं आपके लिए क्या करूँ ?
( 'बतायें' नहीं...। )
मम्मी , आप डैडी को समझाएँ..।
( 'समझायें' नहीं..। )
अन्त में सही-ग़लत का एक लिटमस टेस्ट...
एकदम आसान सा...
जहाँ आपने 'एँ' या 'ए' लगाया है , वहाँ 'या' लगाकर देखें...।
क्या कोई शब्द बनता है ?
यदि नहीं , तो आप ग़लत लिख रहे हैं...।
आजकल लोग 'शुभकामनायें' लिखते हैं...
इसे 'शुभकामनाया' कर दीजिए...।
'शुभकामनाया' तो कुछ होता नहीं ,
इसलिए 'शुभकामनायें' भी नहीं होगा...।
सही शब्द शुभकामनाएं होगा ।
'दुआयें' भी इसलिए ग़लत हैं और 'सदायें' भी...
'देखिये' , 'बोलिये' , 'सोचिये' इसीलिए ग़लत हैं क्योंकि 'देखिया' , 'बोलिया' , 'सोचिया' कुछ नहीं होते...।
राज नवादवी
कविता - लड़कों की कविताएं
लड़कों का दर्द है कि लड़के लड़कियों की कविता ,उनका दर्द देखकर पसंद न करके उनकी फोटो देखकर पसंद करते हैं। और लड़के, लड़कों की कविता पसंद नहीं करते।
जबकि लड़कों की कविता में ज्यादा दर्द होता है।
लड़कियां लड़कों की कविता पसंद इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि वो समाज से डरती हैं और इस तरह लड़कों की लिखी कविता चुपचाप पढ़ी जाती हैं।
लेकिन उन पर सार्वजनिक टिप्पणियां नहीं आती।
सूबे सिंह "सुजान"
कुरूक्षेत्र,
हरियाणा
चुनावों से पहले डराने लगे हैं।
बुरों को सही, जो बताने लगे हैं
ये माहौल कैसा बनाने लगे हैं?
चुनावों के पीछे वो क्या क्या करेंगे,
अभी से जो लड़ने लड़ाने लगे हैं।
वो जनता को कल कैसा आराम देंगे
सड़क बंद करके दिखाने लगे हैं।
अरे आम लोगों ज़रा ध्यान रखना,
इधर कौन बदमाश आने लगे हैं।
कलम के सिपाही भी अब भेष बदले,
हमें इस समय आज़माने लगे हैं।
सूबे सिंह सुजान
![]() |
| कवि गोष्ठी |
मेरी आलोचना जरूरी है
कुछ नया सीखना जरूरी है।
शब्द दर शब्द सीखना होगा,
शब्द की साधना जरूरी है।
अब रचो मानवीय तकनीकें,
क्योंकि संवेदना जरूरी है।
मूंग,अरहर,उड़द तो हैं लेकिन,
दाल में कुछ चना जरूरी है।
नल खुला छोड़ दे अगर टीचर,
बच्चों को देखना जरूरी है।
मेरे अंदर कमी हजारों हैं,
इस तरह सोचना ज़रूरी है।
मैं ग़ज़ल में गिलोय रस भर दूं,
अब नयी योजना जरूरी है।
सूबे सिंह सुजान
दिनांक 9 जनवरी 2022 को अदबी संगम कुरूक्षेत्र की चुनाव प्रक्रिया के पश्चात होने वाली काव्य गोष्ठियों का विवरण -
मेजबानी
1 सूबे सिंह सुजान की मेजबानी में 27 फरवरी 2022 को संपन्न।
2 डॉ संजीव अंजुम की मेजबानी 27/3/2022 को।
3 डॉ हरीश कुमार रंगा की। 24/04/2022 की मेजबानी।
4 श्रीमती गंगा मलिक जी की 22/05/2022 की मेजबानी।
5 श्रीमती शकुंतला शर्मा जी 26/06/2022 की मेजबानी।
6 प्रकाश कुरूक्षेत्री की मेजबानी में 24/07/2022 कवि सम्मेलन आयोजित।
7 सुधीर ढांडा की 21/08/2022 की मेजबानी में।
8 डॉ राकेश भास्कर जी 25/09/2022 की मेजबानी में।
9 डॉ सुभाष गर्ग जी 16/10/2022 की मेजबानी में।
10 हरियाणा ग्रंथ अकादमी के सहयोग से 26/11/2022 को
11 गीता जयंती अवसर पर अदबी संगम कुरूक्षेत्र व विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में 05/12/2022को
12 मेहर चंद धीमान जी को श्रद्धांजलि व काव्य गोष्ठी 01/01/2023 को अदबी संगम कुरूक्षेत्र व सार्थक साहित्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में ।
13 डॉ बलवान सिंह बादल की मेजबानी में उनके घर गांव सुनेहडी खालसा में 19/02/2023 को ।
14 श्रीमती सीमा बिरला 05/03/2023 की मेजबानी में।
15 श्री सतीश गर्ग ग़ैर 23/04/2023 की मेजबानी में
16 श्री रत्नचंद सरदाना 20/05/2023 की मेजबानी में
17 डॉ शकुंतला शर्मा 18/06/2023। की मेजबानी में
18 श्री विनोद कुमार धवन 23/07/2023 की मेजबानी में
19 रोटरी क्लब के सहयोग से कवि सम्मेलन 14/08/2023 आयोजित
20 श्री संजय मित्तल 24/09/2023। की मेजबानी में
21 श्री मोती राम तुर्क 22/10/2023 की मेजबानी में
22 श्रीमती गंगा मलिक 26/11/2023 की मेजबानी में
23 अदबी संगम कुरूक्षेत्र व कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में 18/12/2023 आयोजित कवि सम्मेलन
24 श्री राम गोपाल राही 28/01/2024 की मेजबानी
25 हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी उर्दू प्रकोष्ठ एवं सांस्कृतिक विभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र के सहयोग से सीनेट हॉल कुविकु में 15/02/2024 में राष्ट्रीय स्तरीय कवि सम्मेलन एवं विचार गोष्ठी
26 अदबी संगम कुरूक्षेत्र अध्यक्ष सूबे सिंह सुजान के पोयट्री हाऊस पर 25/02/2024 की मेजबानी
27 श्री आर के शर्मा जी 24/03/2024 की मेजबानी
28 श्री प्रकाश कुरूक्षेत्री 21/04/2024 की मेजबानी में कवि सम्मेलन आयोजित
29 श्री कस्तूरी लाल शाद
जी 26/05/2024 की मेजबानी में
30 श्री ज्ञान सागर आहूजा जी 23/06/2024 की मेजबानी
31 श्री सूबे सिंह सुजान अदबी संगम कुरूक्षेत्र अध्यक्ष 21/07/2024 की मेजबानी में।
उपरोक्त सभी सम्मानित सदस्यों द्वारा काव्य गोष्ठी आयोजित करने के लिए अदबी संगम कुरूक्षेत्र हार्दिक धन्यवाद करता है।
आप सबके सहयोग को साधुवाद।
आप सबसे अदबी संगम कुरूक्षेत्र को सदैव और बेहतर सहयोग की अपेक्षा रहेगी।
धन्यवाद।
सूबे सिंह सुजान
*अदबी संगम कुरूक्षेत्र*
हमने अठखेलियों का नाम, अदा रक्खा है।
सूबे सिंह सुजान
#shayari
#poetry
जामुन को आजकल शुगर के मरीज़ बहुत ढूंढते हैं ख़ैर डॉक्टर बताते हैं लेकिन हमारे बुजुर्गों के समय में डॉक्टर लोग अर्थात वर्तमान साइंस वाले नहीं थे तो भी जामुन के पेड़ लगाए व जामुन खाए जाते थे जानकारी के अभाव के बावजूद?
तो कैसे कह सकते हैं कि उनको जानकारी नहीं थी???
ख़ैर अपने घर पर जामुन का पेड़ है जिसको पिताजी ने लगाया था लगभग 2007-08 में और जामुन पिताजी ने भी कुछ समय खाए और पिताजी 2013 में चले गए थे और आज तक हम और हमारे बच्चे हर साल जामुन खाते हैं और पड़ोसी व अन्य को भी ख़ुद पेड़ से तोड़ कर खिलानी पड़ती हैं पिछले कुछ वर्षों से मैं फेसबुक या व्हाट्सएप पर जामुन की फ़ोटो लगाता हूं तो कमेंट्स मिलते हैं कि कभी खिलाएं भी खाली फोटो क्यों लगाते हैं लेकिन हद की बात यह है लोग कैसे कह लेते हैं जब उनको कहो कि भाई आप घर आएं जी भर खाएं,ले जाएं लेकिन नहीं उनको उनके घर ख़ुद तोड़ कर,जाकर, मुफ़्त में दे कर आएं तो हम मानवता के, बंधुत्व के हकदार होंगे लेकिन वह पहले ही मानवतावादी दृष्टिकोण हैं।
इन कुछ वर्षों का जामुन के साथ अनुभव यही है और इस बार चार दिन पहले जामुन तोड़ रहा था कि तैतएय ने काट लिया फिर जिस टहने (शाखा) पर चढ़ कर जामुन तोड़ कर कुछ सहकर्मियों को खिलाए थे अगले दिन दोपहर में वह टहना अपने आप वहीं से टूट गया जहां मैं खड़ा था।
ख़ैर यह बात तो ज्यादातर ग्रामीण जानते हैं कि जामुन की टहनियां कच्ची होती हैं जो जल्दी टूट जाती हैं ऐसी जानकारियां तभी तो हैं कि हम इन पेड़ पौधों के साथ घनिष्ठता के साथ रहें हैं और जामुन की दांतुन बहुत बेहतरीन है,उसकी लकड़ी से बने नीमचक पानी के कुओं में नीचे लगाए जाते थे जबकि पता था कि वह लकड़ी कच्ची होती है फिर भी उसको पानी के कुओं की दीवार में सबसे नीचे नींव में रखते थे इसका कारण दूसरा था वह यह है कि जामुन की लकड़ी में ऑयरन, कैल्शियम आदि पोषक तत्व मौजूद रहते हैं और वह पानी को साफ रखती हैं।
सूबे सिंह सुजान
एक बगीचे की देखभाल चार माली करते थे वह हर पौधे को समय पर पानी देते,खरपतवार निकाल कर बाहर करते,खाद देते और पौधे बहुत प्रसन्न थे लेकिन कुछ नये उगे पौधे उन मालियों का मज़ाक़ करने लगे और बोले कि हम आपके बग़ैर भी मज़े में रह सकते हैं आपके अहसान की जरूरत नहीं है और धीरे-धीरे उन मालियों को बाहर निकालने लगे और कुछ भेष बदले हुए शिकारियों से दोस्ती कर ली वह शिकारी बहुत से झूठे प्रलोभन देते थे।
माली अपनी इज़्ज़त को देखते हुए बगीचे से बाहर बैठ गए और कभी कभी बुजुर्ग पेड़ों को सलाह देते थे परन्तु उनकी सलाह नहीं मान कर भेष बदले शिकारियों को इज़्ज़त से बैठाया गया।
उन शिकारियों ने नये पौधों को पैसे, सड़कों को बनाने की सलाह देकर कुछ बुजुर्ग पेड़ों को काटने की सलाह दी और लालच दिया नये पौधे मान गए।एक दिन मौका देख कर उन शिकारियों ने कुछ पेड़ काट दिए और बुजुर्ग पेड़ों की बात नहीं सुनी गई अब बुजुर्ग पेड़ चिल्लाते और उनके बच्चे नये पौधे उनका मज़ाक करते थे लेकिन शिकारियों ने धीरे धीरे बहुत पेड़ काट कर बेच दिए अब कुछेक नये पौधों का नंबर आने लगा कुछ पौधे बोलने लगे तो शिकारियों के चमचे पौधे उन पर टूट कर पड़े। इस तरह अब वह बगीचा उजड़ रहा है और माली दूर बैठे रो रहे हैं और नये पौधे अपनी जान की भीख मांग रहे हैं और कुछ कर नहीं सकते क्योंकि उनमें एकता और समझ नहीं रही और शिकारी बड़े आराम से शिकार करते हैं और पौधों का ही मज़ाक करते हैं।
हम स्वयं जो करते हैं वह है जो पेड़ वन विभाग ने सड़कों किनारे, नहरों किनारे लगाए हैं उनको इस गर्मी के मौसम में जला देते हैं इस समय उनको पानी मिलने की संभावना नहीं है क्योंकि बरसात नहीं होती और ऊपर से उनको जला देते हैं यह बेहद सोच समझकर निर्णय लिया जाता है अपने वातावरण को शुद्ध करने की जगह हम ऑक्सीजन देने वाले पेड़ पौधों को पनपने से पहले जला देते हैं यह हम वास्तविकता में करते हैं।
हर मनुष्य ही नहीं हर प्राणी की जीने की पहली जरूरत ऑक्सीजन है हम उसको दूषित तो करते ही हैं ऊपर से उसके स्रोत, पेड़ों को ही नष्ट करते हैं यह हमारी समझ प्रदर्शित हो रही है
हमारे किसान अपने खेतों के पास सड़क किनारे, नहरों,रजबाहों के इर्द गिर्द लगाए गए पेड़ों को आग में जला रहे हैं पहले तो हमने सार्वजनिक जंगल,वन को काटा है और अब जो पेड़ लगाए जाते हैं उनको जलाया, कीटनाशक से,आग से, नष्ट भी करते हैं।
अनेकों संस्थाएं बनी हैं जो पेड़ लगाए जाने के रिकॉर्ड दर्ज करती हैं हर साल हमने इतने पेड़ लगाए और सरकार से इस काम के एवज में धन उपार्जन करती हैं लेकिन उनके द्वारा लगाए गए कोई पेड़ पौधे वास्तविक स्थिति में उपस्थित नहीं रहते यह ढोंग केवल पैसा इकट्ठा करने का करते हैं जो ऐसी एनजीओ के मालिक हैं वह चार दिन बमुश्किल पेड़ लगाने के चित्र लेंगे और समाचारपत्र में समाचार दर्ज़ करेंगे और सरकार को वह चित्र देकर पैसा लेंगे और धरातल पर शून्य काम दिखाई देता है कितना अभद्र, अशोभनीय, अव्यवहारिक कार्य हम प्रकृति के साथ करते हैं और सोशल मीडिया व समाचार पत्रों में हम व्यवहारिक ज्ञानी स्वयं को सर्वगुण संपन्न प्रस्तुत करते हैं।
सूबे सिंह सुजान
कुरूक्षेत्र, हरियाणा
https://youtu.be/MxuHfupYa9Y?si=GVnn3ZhoWjrqfssZ
#पर्यावरण
#वातावरण
#savenature
वे स्वयं को प्रगतिशील व मानवता का प्रहरी कहते नहीं थकते थे।
मैंने बचपन से अब तक साहित्य लेखन व साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी की है और साहित्यिक आयोजन स्वयं करवाता रहा हूं और साहित्य संस्था को अग्रणी बनाने में अपनी हर संभव से आगे बढ़ कर कोशिश करता रहा हूं।
कईं दफा वह प्रगतिशील विचारधारा के मित्र मेरे साहित्य कार्य पर भूरि भूरि प्रशंसा करते थे लेकिन
एक बार जब उनके विचारों के प्रतिकूल विचार सामने रखे तो वह आपा खो बैठे और गालियां देने लगे मैंने उनको याद दिलाया कि आप मानवाधिकारों के प्रहरी हैं लेकिन थोड़ा सा दूसरे को कहने का अधिकार नहीं देते यह कैसा प्रगतिशील व मानवता है?
और उन्होंने गुस्से में अपनी लिखित प्रशंसा वापिस मांगी और पुनः लिखित में आलोचना कर डाली।
अर्थात उनके विचारों के साथ जो बात मेल खाती है वही कहें अन्य कुछ न कहें और यदि कोई कहे तो वह थूक कर चाट लेते हैं।
जो व्यक्ति जिन गुणों से युक्त होता है उसको वैसा ही पसंद आता है और तभी उनकी ठीक निभाई हो जाती है।
एक चोर को चोरी करते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि इस समय कौन कौन व्यक्ति उसको देख सकते हैं या रास्ते में मिल सकते हैं वह इस बात का पहले से ध्यान रखता है और यदि मिल भी जाएं तो उस समय में उसके जैसे ही मिलेंगे और यदि मिल गए तो उनके दोनों का लाभ इसी बात पर तय होगा कि हमारे काम एक जैसे हैं तो उनका समझौता हो जाता है और इस तरह वे दोनों साझेदार बन कर अपने काम करते हैं और झगड़े से बच जाते हैं।
इसी प्रकार अन्य काम करने वाले सभी लोग अपने अपने गुणों से भरपूर व्यक्ति को ढूंढ लेते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं और सच में इस व्यवस्था से ही दुनिया का कारोबार चलता है यदि एक गुणों के विपरीत प्रभाव वाला व्यक्ति मिल जाता है तो वह उम्र भर लड़ते रहते हैं और मालूम नहीं कब ज़्यादा हानि कर बैठते हैं।
शादी के बाद जितने संबंध विच्छेद होते हैं वह भी एक दूसरे के विपरीत गुणों के प्रभाव के कारण होते हैं ।
हमें हर समय एकात्मकता की ख़ोज रहती है और हम एकात्मकता की दिशा में चलते हैं शिक्षा यदि एकात्मिक है तो वह मानव के लिए लाभकारी है यदि उसमें विपरीत प्रभाव है तो वह मनुष्य में दुर्भावना पैदा करेगी।
बहुत पुरानी एक कहावत है ।
जैसे को तैसा।
या हरियाणा में कहावत है कि "लंगड़े को खूंडा सौ कौस से टकरा जाता है।"
जिसका अर्थ है कि एक भाव या गुणों वाले व्यक्ति चाहे सौ कौस दूर रहते हैं लेकिन वह आपस में एक दिन मिल जाते हैं क्योंकि उनकी उनसे ही ठीक निभाई हो सकती है अन्य से नहीं हो पाती।
प्रकृति द्वारा प्रदत्त गुण ही प्रकृति के संचालन में सबसे ज्यादा सहयोगी हैं।
विज्ञान और डॉक्टर कहते हैं कि जिस वातावरण में आप रहते हैं उसी वातावरण में पैदा अनाज, सब्जी,फल आदि उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, लाभकारी हैं।
क्योंकि वह समावेशी हैं वह वातावरण अनुकूल हैं इसी प्रकार मनुष्य के भाव,गुण, आदतें भी समावेशी, अनुकूल ही काम करते हैं। सृष्टि में हर वस्तु, व्यक्ति अलग अलग गुणों से सुसज्जित होकर भी अपने लिए एकात्मकता की ख़ोज में रहती हैं इससे पता चलता है कि परम आत्मा है जो सभी को सम भाव की ओर अग्रसर करती है और सबकी चाह उसी ओर अग्रसर है।
ग़ज़ल -
अपना अहंकार मारना होगा।
हमको हमसे भी हारना होगा।।
हम जुदा किसलिए हुए यारो,
ये भी हमको विचारना होगा।
हम पुरस्कार मेहनतों को दें,
झूठा परदा उतारना होगा।
कुछ न कहना है दूसरों से हमें,
ख़ुद ब ख़ुद को सुधारना होगा।
दूर मत बैठो,पास आ जाओ,
काम बिगड़ा संवारना होगा।
सूबे सिंह सुजान
महिलाओं में विशेष अपने तरह के गुण हैं वह अपने जीवन में सदैव उनका अपने भले या स्वार्थ के लिए प्रयोग करती हैं उसी प्रकार पुरुष भी अपने विशेष गुणों का प्रयोग करते हैं।
ईमान क्या है?
स्वाभिमान क्या है?
बहुत अधिक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए नीच गुणों का प्रयोग करते हैं लेकिन बहुत कम व्यक्ति बचे हैं जो अपने स्वाभिमान के लिए अपनी आत्मा,ग़ैरत कभी नहीं बेचते वरना गैरत बेचने वालों की मंडी में भीड़ लगी है।
जागरूकता क्या है?
मनुष्य अपने जीवन में जितना यथार्थ ज्ञान अर्जित करता है वह उतना जागरूक होता है मनुष्य का जन्म के पश्चात निरंतर जागरूक होने का क्रम जारी रहता है और यह जागरूकता ही हमारे जीवन का लक्ष्य होता है कौन व्यक्ति जितनी जागरूकता प्राप्त करता है वह उतना इस सृष्टि को जान पाता है।
यदि वर्तमान समय में स्वयं को सर्वगुण संपन्न,शिक्षित मानने वाली महिलाएं भी अपने स्वार्थ के लिए अपने महिला होने के कार्ड को कहीं भी खेल पाती हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि यह प्रकृति की देन है वह सर्वगुण संपन्न होने का डकोसला मात्र है जबकि वह स्वाभिमान,ईमान नहीं है वह तो वह छोटे से स्वार्थ के लिए बेच देती हैं। रिश्ते नाते उनके लिए अपने स्वार्थ सिद्ध करने के साधन मात्र होते हैं। इस प्रक्रिया में स्वयं को सर्वगुण संपन्न,शिक्षित, आधुनिक कहना यह स्वयं व समाज के साथ छल कपट ही है। सर्वगुण संपन्न कोई व्यक्ति हो ही नहीं सकता लेकिन यह जो आधुनिकता और माडर्न होने का डकोसला है यह मानवता के गुणों के साथ घिनौना व्यवहार है।