मंगलवार, 29 सितंबर 2026

शिक्षकों मनोदशा यह भी होती है।

 स्थानांतरण पश्चात शिक्षकों की शिक्षा व बच्चों के प्रति मानसिकता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण :-


  लगभग शिक्षक नये स्कूलों में जाकर वर्तमान स्कूल में काम करने वाले पुराने शिक्षकों पर न पढ़ाने का दोष मढ़ रहे हैं । 

वे अपने पुराने स्कूल के बच्चों को होशियार बता रहे हैं लेकिन वर्तमान स्कूल के बच्चों को पढ़ाई में नालायक बता रहे हैं । हैरानी की बात यह पता चलती है कि जो शिक्षक यह कहते मिलते हैं यदि उनके पुराने स्कूल में जाकर देखा जाए तो वहाँ स्थित वही मिलती है जो वे नये स्कूलों की बता रहे हैं । 


दूसरा यह भी देखने में आ रहा है कि शिक्षक नये स्कूलों में मानसिक रूप से जगह नहीं बना पा रहे हैं । वे अपनी पुरानी यादों ,संबंधों,सुविधाओं,अकारण अवकाश प्राप्त करने,जैसी स्थिति को भुला नहीं पा रहे हैं ( बच्चों को याद 10% ही करते हैं ) वे अपने पुराने सुखों के संबंधों की तुलना नये स्कूलों में कर रहे हैं । अर्थात स्थानांतरण से सुखों पर क्या असर पड़ा है यह अधिक चिंतनीय भाव उनके चेहरों पर व बातचीत में साफ झलकता है । 


घर से स्कूल की दूरी भी कुछेक में चर्चा है लेकिन वर्तमान गतिमान समय में यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है सभी साधन संपन्न हैं पुराने समय में शिक्षकों को हम सबने 40किलोमीटर तक साइकिल से स्कूल आते जाते देखा है । 


यह विचारणीय आलेख है इस आलेख से वास्तविक रूप से परिश्रम करने वाले अध्यापकों को क्रोध नहीं आएगा । ऐसा मेरा विश्वास है ।


सूबे सिंह सुजान,कुरूक्षेत्र

बुधवार, 22 जुलाई 2026

कहानी - ज़ुल्मोगारत

 कहानी - ज़ुल्मोगारत 


एक आदमी दूसरे देश से आया था उसने एक सहनशील धार्मिक व्यक्ति से आश्रय मांगा उसने अपने घर में रहने को जगह दे दी कुछ दिन बाद वह उस मकान मालिक और उसकी मदद करने वाले को ही घर से निकालने लगा तो पंचायत हुई और उस घर में से आधा उसको दिलवा दिया जब उसको उसमें से आधा घर मिल गया तो उसने अपने बच्चे तो आधा मिले घर में भेज दिए लेकिन ख़ुद उसी मकान मालिक के घर में रह गया और फिर उसको उस घर से निकालने की चालें चलने लगा कभी कुछ चुराना, कभी लड़ाई, दंगा, कभी बलात्कार यही करता रहता है और वह धार्मिक व्यक्ति सब सहन करने को मजबूर है और उस गांव में जो विदेश पढ़ लिखकर आए थे वह उस धार्मिक व्यक्ति को कहते हैं आप इसको रहने दो और तुम कोई ओर जगह रह लो यह पढ़े लिखे बुद्धिजीवी व्यक्ति संविधान की दुहाई देते हुए अन्याय करते थे 

इस तरह वह व्यक्ति अपने घर से निकाल रखा है और उस गांव में ज़ुल्म करने वालों से चंदा लेकर कुछ विदेश से आए लोग बुद्धिमान का पुरस्कार लिए हुए हैं।


सूबे सिंह सुजान



गुरुवार, 4 जून 2026

पेड़ पौधे लगाए जाते हैं और फिर जलाए, काटे जाते हैं

 पर्यावरण ख़राब है यह सब कहते हैं लेकिन क्यों ख़राब है? 

कैसे ख़राब है? कौन ख़राब कर रहे हैं? 

और कैसे सुधारें? 

और सबसे बड़ी बात जो सुधारने की कोशिश कर रहा है उसका सहयोग कोई कर रहा है या उसका भी अपमान कोई कर रहा है अर्थात उसको सुधार करने से कैसे झूठे ऐजेंडा चला कर रोक रहे हैं?? 


यह सवाल बहुत हैं एक जागरूक नागरिक तो समझ सकता है और बहुत लोग धीरे-धीरे समझ भी रहे हैं।


जिस दिन इन जागरूक लोगों की संख्या और बढ़ जाएगी तो सुधार भी होगा।


लेकिन सबसे मुख्य बात यह है कि पर्यावरण में सुधार सबसे ज्यादा और तीव्रता के साथ प्रकृति ही करती है और मनुष्य पर्यावरण का केवल नुकसान व ह्रास ही करते हैं।


सब प्राणियों में मनुष्य ही प्रकृति का विनाशक है।


दूसरे पहलू पर ग़ौर करें कि सरकार ने एक पेड़ मां के नाम।

इस अभियान को बेसिक स्तर पर नई पौध अर्थात स्कूलों में बच्चों के बीच चलाया है और पिछले सात आठ सालों से यह कार्यक्रम चल रहा है 


हर साल लाखों पेड़ लगाए जा रहे हैं सरकार के आज तक के सबसे ज्यादा सकारात्मक प्रयास हुए हैं।


लेकिन इस मुहिम को जिन लोगों ने नहीं अपनाया और इसमें सहयोग नहीं किया?   क्या वह पर्यावरण के प्रति सकारात्मक हैं??? 


👉 लेकिन झूठ के सारे ऐजेंडा वह चलाते हैं लेकिन सकारात्मक एक भी काम नहीं करते हैं?? 


तो क्या आम सामान्य नागरिक इस बात को नहीं समझते? 

समझते हैं जनाब।

लेकिन बहुत धीरे-धीरे धीरे-धीरे समझते हैं और उसके परिणाम हमारे सामने धीरे धीरे आ भी रहे हैं।


👉पिछले करीब सत्तर सालों से बहुत से झूठे और आधारहीन नरेटिव चला कर ग़लत आदमी, ग़लत सोच को ही सही बनाकर पेश किया गया है!!!! 


देखिए!!!! सड़क किनारे, नहरों, राजबाह व पंचायत की ख़ाली जमीनों पर सरकार वन विभाग द्वारा जितने भी पेड़ लगाए गए थे उन सभी पेड़-पौधों को इसी झूठे ऐजेंडा के तहत तैयार की गई छवि द्वारा नष्ट कर दिया, जला दिए, कीटनाशक दवा द्वारा सुखा दिए गए हैं 

और वह छवि 👉 कि किसान मसीहा है किसान ही भोजन देता है इस बात में धरातल की ही नहीं प्राकृतिक सच्चाई है कि वह अनाज उगाता है लेकिन इसी बड़ी छवि की आड़ में उसी ने पर्यावरण को हर संभावना से दरकिनार किया है।


तो क्या एक अच्छा काम करने वाले ने कोई एक ग़लत काम कर दिया तो इसकी बुराई नहीं करें?? 

या उसको सज़ा न दी जाए?? 


बस इसी छवि का अनावश्यक रूप से दोहन करते हुए सब पेड़ पौधे नष्ट कर दिए जाते हैं और उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता यदि कहें तो उस पर ऐजेंडाधारी राजनीतिक लोग व दल उसका दुरूपयोग करते हैं और सरकार का पेड़ लगाने की मुहिम को तो शून्य में धकेल दिया जाता है साथ ही टैक्स देने वाली जनता का पैसा और सरकारी बजट भी पेड़ पौधे के साथ सूख जाता है और अन्य कार्यों से भी वंचित रह जाते हैं।


👉हम सही को सही और ग़लत को ग़लत नहीं कह पाते हैं?? और इसका कारण सत्य को झूठ में बदलने की जो विदेशी ताकतों द्वारा ऐजेंडा चलाने और उनके अनुयाई दलों द्वारा भारत में संचालित होने से हुआ है।


उन विदेशी ताकतों ने पहले भी भारत का दोहन किया है और अब भी अपने व्यापारिक हितों के लिए प्रयोग करते रहे हैं।

और वर्तमान समय में जब सरकार इच्छाशक्ति, स्वाभिमान से कार्य करने लगी तो यही विदेशी ताकतें बिलबिला उठी हैं और भारत को अस्थिर करने में लगी हुई हैं 


👉हमें जागना होगा और देशहित में आगे आना होगा अपनी युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनाना होगा और बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना होगा।


👉 धर्म का अर्थ कर्तव्य है 

👉और यह केवल सनातन संस्कृति में ही अर्थ प्रयुक्त होता है लेकिन यह अर्थ प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा संचालित है।


👉हमारा कर्तव्य हर काम के प्रति सकारात्मक है तो हम न्याय कर रहे हैं यदि नकारात्मक है तो हम अन्याय कर रहे हैं।


👉 यदि हम खेती में प्रयुक्त ज़मीन को पांच साल के लिए ख़ाली छोड़ दें तो आप पायेंगे कि प्रकृति पांच सालों में उस ज़मीन पर अपने आप लाखों पेड़ उगा देगी और पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा।।।


लेकिन क्या आप ऐसा कर पाएंगे????

बस यही मुख्य कारण है कि हम पर्यावरण को शुद्ध न करने में सब शामिल हैं।


सूबे सिंह सुजान 




गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

उनकी नींद में खलल पड़ता है।

 दरअसल हमारे शिक्षक वर्तमान समय में मीठा ज़हर का इस्तेमाल करते हैं यह चाहते हैं इन्हें काम करने के लिए भी कोई न कहे 

और यूनियन इनके आराम का प्रबंध करे।


यह मीठा ज़हर धीरे धीरे स्कूलों को बंद करने का मुख्य कारण है।

यह सोचते हैं कि जो स्कूलों में काम करने को कहें उनका विरोध करो।

और इसी का परिणाम धीरे धीरे आ रहा है।


मुझसे तो यह शिकायत बहुत लोगों को है मैं ऐसा कह देता हूं।

यूनियन के लोगों से बलि की उम्मीद करते हैं कि सब काम उनके लिए करें और इनको सामने न आना पड़े।


आप तो हम अपने स्कूल की समस्या लिखकर नहीं दे सकते हैं और स्कूल में कोई गांव का सामान्य,निर्धन व्यक्ति काम आए तो सब लिखित में चाहिए? 

फिर सब नियम याद आ जाते हैं लेकिन स्कूलों को बेहतर करने के लिए, बच्चों की सुविधाओं के लिए एक अधिकारी के सामने नहीं जा सकते, किसी को लिख कर शिकायतें नहीं कर सकते हैं? 

संगठन की कॉल पर धरना प्रदर्शन में नहीं आ सकते? 


मतलब जो मानसिकता भगतसिंह की फांसी के समय थी, वही मानसिकता ज़्यादा बलवती हो रही है 

कि मरने के लिए कोई और जाए हमें न जाना पड़े।

लेकिन समस्या दूर करने के लिए कोई और आएं।


मुझसे यह बात कहने पर शिकायत बहुत शिक्षकों को है।

इससे जाहिर होता है कि मैं उनके सोए ज़मीर पर थोड़ी दस्तक देने की कोशिश करता हूं लेकिन वह उन्हें बुरी लगती है क्योंकि उनकी नींद में खलल पड़ता है।


सूबे सिंह सुजान




उर्दू ज़बान और प्यार का झूठा प्रोपगंडा

 हमारे देश में कुछ सेक्युलर लोगों का गुप्त ऐजेंडा होता है वह इसे लोगों के मन, बुद्धि, चित्त और संस्कृति, धर्म बदलने के लिए छिपा कर चलाते हैं।

कुछ प्रोफ़ेसर साहब और अपने लेखों में, कविता, कहानी में यह बयान करते हैं कि उर्दू ज़बान प्यार की ज़बान है और फिल्म इंडस्ट्री तो इसमें शुरू से यही कहती है।

तो अब हम पूछते हैं कि 

बाक़ी जुबान तो प्यार के शब्दों में भी गाली देती हैं ?

यह दूसरी भाषाओं को नीचा दिखाने जैसा एजैंडा है लगातार यही कहा जाता है जबकि इस उर्दू में अन्य भाषाओं की अपेक्षा बहुत कम शब्द हैं 

पर्यायवाची भी कम हैं इसमें कोई शक नहीं यह भाषा भारत में ही पनपी,विकसित हुई है लेकिन यह भाषा न तो अनुसंधान की वाहक बन सकी है न इसमें आधुनिकता के साथ साथ चलने की क्षमता है वैज्ञानिकता की तो और भी कमी है परन्तु हम किसी दूसरे के कहने से इसी भाषा को प्यार की भाषा कहते हैं यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है हम किस प्रकार भेदभाव करते हैं यह स्पष्ट पता चलता है लेकिन जब हम सार्थक तथ्यों पर यह बात रखते हैं तो हमीं में से लोग इस तथ्य को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए आगे ऐजेंडा खड़ा कर देते हैं और सच व तथ्य बेमौत मारे जाते हैं सच के ऊपर झूठ को हावी कर देते हैं।

हर जुबान का अपना अपना दायरा है उसका संप्रेषण है लेकिन किसी एक जुबान को कमजोर होने पर भी आवश्यकता से अधिक अनावश्यक महत्व देना उचित नहीं होता है सब भाषाओं को उनके तथ्यात्मक आधार पर तुलनात्मक समीक्षा होनी चाहिए।


सूबे सिंह सुजान 


मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

वामपंथी द्वारा सूबे सिंह सुजान

 वह लोग जिसे असभ्य कह रहे हैं 

एक दिन पहले उसे वही लोग सच्चा बताते हैं?

वही लोग उसे सही ठहराते हैं फिर वही लोग उसे असभ्य कहते हैं ?


इन लोगों की इन हरकतों से पता चलता है 

कि इनको सच का शायद पता ही नहीं है यह एक धूर्तता के शिकार हैं यह सच के विरुद्ध काम करते हैं और मूर्खता को पालते हैं।


यह ग़रीबी के कारण बनते हैं तरक्की को रोकते हैं और लोगों को उनकी गरीबी से बाहर निकालने के सपने दिखाते हैं।


यह लोग कभी कुछ काम नहीं करते पाए जाते हैं यह काम करने वालों के पीछे जरूर पड़े रहते हैं।


यह लोग ख़ुद को बुद्धिमानी का तमग़ा ख़ुद ही देते हैं और इतिहास से साज़िश करते, साहित्य से धोखाधड़ी करते हुए पकड़े जाते हैं।


यह लोग कौन हैं??? 

बताओ? यह लोग कौन हैं? 

#कौन


सूबे सिंह सुजान 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अनकही कहानियां सूबे सिंह सुजान-भाग-1

 दो गहरे मित्र होते हैं उनमें अनेक काम एक दूसरे के अपने कार्यक्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में और अन्य व्यक्तिगत कार्यों में आपस में मेल जोल गहरा था उनकी मित्रता में जहां  अनेक संगठनों में एक कार्य करते थे वहां पर एक मित्र जो बुद्धिमान था उसने अपने आप को बुद्धिमानी के चलते चतुराई करने और स्वार्थ सिद्ध करने की आदत पड़ गई थी दोनों बराबर कार्य करते थे लेकिन एक समझदार कहिए या चतुर कहिए उस मित्र ने उस संगठन से करोड़ों रुपए कमाई की निवेश किया और पैसा दिनों-दिन  बढ़ता चला गया।

 इस प्रकार वह अपने आप को बहुत चतुर और चालक भी समझने लगा क्योंकि पैसा आने पर व्यक्ति की बद्धि और चतुराई से कार्य करती है इस प्रकार उसको लगने लगा कि वह बहुत चतुर और बुद्धिमान है वह हर कार्य में अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगा मित्रता के गहरे रिश्ते में इस प्रकार कोई अंतर नहीं पड़ा  क्योंकि उसका दूसरा मित्र कभी भी उसे नजरिए से नहीं देखता था न वह नए स्वार्थ कार्य करता था और न कभी उसको लालच आया इस प्रकार वह संगठन में हर कार्य अपने हित के बजाय संगठन के लिए समाज के लिए, मित्रता के लिए और मानव विकास के लिए करता था इस प्रकार  दूसरे मित्र ने अपना व्यक्तिगत पैसा संगठन में लगाया और सामाजिक कार्य के लिए निस्वार्थ कार्यकर्ता रह कर काम किया एक तरफ जहां एक मित्र ने करोड़ों रुपए संगठन से कमाई की वहीं दूसरे मित्र ने अपने लाखों रुपए संगठन में लगाए यह एक प्रमुख अंतर रहा उसके बावजूद भी कभी मित्रता में कोई अंतर नहीं आया यह एक अनोखा उदाहरण था परंतु जब जो व्यक्ति जैसा कार्य करता है वह भलि भांति जानता कि उसने कब क्या अच्छा किया है और क्या बुरा किया है आत्म रूप से सब पता होता है समझता है जानता है कभी ना कभी तो विवेक से वह ध्यान में आता है कब कैसे कर्तव्य निभाया है  और उसमें कहां-कहां कमियां रही वह खुद जानता है इसलिए पैसे कमाने वाला मित्र धीरे-धीरे इस बात का एहसास करने लगा कि उसने क्या किया है और मन में अंदेशा आने लगा कि यह अन्वय लोगों को न बता दे इसलिए इससे दूरी बनाने का समय आ गया है और वह खुद अपने मित्र से दूरी बनाने लगा जब दूरी बनाने लगा तो दूसरा मित्र इस बात से हैरान और आश्चर्य चकित था कि उसके व्यवहार  में यह अंतर क्यों हो रहा है और उसने इस बारे में जब उससे जानना चाहा तो वह छुपाने लगा और असली बात नहीं बता रहा था जिस कारण उनके बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगी अब मित्र यह सवाल भी समाज में कहीं जगह ख़ुद ही करने लगा कि मैंने कभी ग़लत नहीं किया है वह मुझसे ख़ुद दूर जा रहा है  जबकि न तो समाज से कोई यह सवाल उनसे पूछ रहा था परंतु वह स्वयं को उचित , इमानदार ठहराने की कोशिश करता था और समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे मित्र पर यह सवाल आने लगे जिससे वह और आश्चर्य चकित होने लगा और उनमें दूरियां बढ़ने लगी किन्तु वह मित्र कहीं कोई बात नहीं कहता था और समाज पर दूसरे मित्र की अर्नगल बातें आती थी जिसका जवाब उसके पास क्या होता? 

जो व्यक्ति जितना इमानदार होता है उसको उतना ज्यादा परेशान करने की कोशिशें की जाती हैं एक स्वार्थी और एक चतुर व्यक्ति खुद को अधिक बुद्धिमान समझने लगता है जबकि वह वास्तव में अव्यावहारिक कार्य करता है और वह खुद मूर्ख होता है लेकिन वह अपनी चतुराई के स्वभाव वश इस बात से परिचित नहीं हो पाता और उसमें अवगुण बढ़ते चले जाते हैं  दूसरी तरफ जो व्यक्ति इमानदार निस्वार्थ होता है वह उतना ही पिसता चला जाता है लेकिन उसकी आत्मा कभी दुखी नहीं होती वह मन से पवित्र रहता है आत्मा से पवित्र रहता है और कभी दुखी नहीं होता परंतु दूसरी ओर चतुराई वश स्वार्थ वश किया गया कार्य ख़ुद को धीरे-धीरे समाज में शर्मशार करता है उस व्यक्ति को हर समय डर बना रहता है समाज की प्रतिक्रिया स्वरूप और छुपा कर किए गए अनर्गल कार्यों का डर बना रहता है इस कारण वह अनेकों ग़लत काम करता रहता है।


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

ये भारी सम्मान, रख दो मुझ पर

 ये भारी सम्मान रख दो मुझ पर,

और बोले,अपमान आप रखना।

उठेंगे तुमसे नहीं पुरस्कार,

ये खेल मैदान,आप रखना।


सूबे सिंह सुजान



रविवार, 25 जनवरी 2026

समस्याएं पैदा की जाती हैं, समस्याओं को ठीक करने के लिए।

 समस्याएं पैदा की जाती हैं समस्याएं ठीक करने के लिए।

 यह प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया है जैसे बहुत अधिक गर्मी इसलिए होती है गर्मी को कम करने के लिए अर्थात अत्यधिक गर्मी होने के पश्चात मौसम में परिवर्तन होता है और बरसात होती है प्रकृति ने क्या प्रयोग किया गर्मी को ठीक करने के लिए गर्मी का ही प्रयोग किया जैसे लोहे को काटने के लिए लोहा ही इस्तेमाल किया जाता है यह प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं।


 इसी प्रकार समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रकृति द्वारा कुछ ऐसी प्रक्रिया की जाती हैं कि मनुष्य की कुछ समझ में शीघ्रता से नहीं आता किसी एक ऐसी समस्या को ठीक करने के लिए कुछ दूसरी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और वह समस्याएं प्रक्रिया स्वरूप में फिर उन समस्याओं को ठीक करती हैं समाज में इस प्रकार की प्रक्रिया भी निरंतर होती रहती हैं वह भी प्राकृतिक प्रक्रिया का एक बिंदु हैं 

मैं यहां पर यह भी जोड़ना चाहता हूँ, भारतीय समाज में जब जातियों में की भेदभाव समस्या पैदा हुई है वह समस्याएं कालांतर में अत्यधिक सामाजिक समानताएं और मनुष्यता के उच्च स्तरीय गुणों के निरंतर स्थिर रहने,होने के कारण पैदा हुई हैं अब उनको ठीक करने के लिए समाज में पुनः जातियों का सरलीकरण मिलन प्रक्रिया हो रही है जबकि समाज इस समय में एक जाति से दूसरी जाति में मिलना जुलना रिश्ते करना एक छोटी सोच मानते हैं परंतु यही प्रक्रिया जातियों को एकीकरण करने के लिए प्रकृति द्वारा इस्तेमाल की जा रही है जैसे हरियाणा के संदर्भ में ले तो हरियाणा के समाज में बेटियों का अत्यंत कम होना और फिर उसके प्रत्युत्तर में हरियाणा का समाज हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक से लड़कियों से शादी करने लगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया घटना घटी है जिससे विभिन्न जातियों और समाजों का एकीकरण होना प्रारंभ हो गया है और इस तरह की घटनाएं पूरे देश में, विभिन्न राज्यों में घट रही हैं अंततः यह एक तैयारी है एकीकरण , समानता,सनातन या हिंदुत्व के लिए प्रयोग किया गया है यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिस प्रकार यह समाज जातियों में बांटा गया,टूटा या विदेशी ताकतों द्वारा तोड़ा गया और अशिक्षा के कारण यह प्रक्रिया हुई थी अब इसी प्रक्रिया को ठीक करने के लिए प्रकृति द्वारा ऐसी प्रक्रियाओं का घटनाक्रम पुनर्गठन है और समाज में एकीकरण हो रहा है यह भारतीय संस्कृति के लिए भारतीय समाज के लिए हिंदुत्व के लिए सनातन के लिए पुनः जागृति काल है।


सूबे सिंह सुजान 




शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सर्दी कुछ नहीं कहती, सर्दी से सीखो अपना ध्यान रखें

 हर मौसम को जीने दो।


देखिए। सर्दी के बारे में अफवाहें मत फैलायें।

कि सर्दी आ गई है,यह हो गया, वह हो गया।लोग ठंड से मर गए आदि आदि। सर्दी की अफवाहें मत फैलाओ अपने आप को ठीक करो कभी गर्मी की अफवाहें कभी सर्दी की बेवजह अपनी ख़बर बेचने के लिए, अपने सामान बेचने के लिए कुछ भी बोलते हैं इसलिए आम जनमानस को यह विवेक से काम लेना चाहिए।


सच में तो सर्दी पहले से बहुत कम हो गई है नाममात्र रह गई है और यह सब मानव की भौतिकवादी मशीनीकरण से हो रहा है जो प्रकृति के विरुद्ध अन्याय है जिस प्रकार हम अपने ऊपर कोई अन्याय होता है उसके लिए चिल्लाते हैं धरना प्रदर्शन करते हैं कोर्ट जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति को भी अपनी कोर्ट जाना पड़ता है और उस पर भी हम हाय-तौबा करते हैं लेकिन कितनी भी हाय-तौबा कर लीजिए प्रकृति अपने न्याय के लिए तो लड़ेगी उसका भी अपना हक़ है।


जीवन बनाए रखने के लिए संतुलन अति आवश्यक है और वह संतुलन मनुष्य तो कभी नहीं बनाता वह महालालची, धूर्त श्रेणी का जीव है वह सब जीवों पर, प्रकृति के सब संसाधनों पर अपना हक़ जताता है और केवल असंतुलन पैदा करता है और ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह अंधानुकरण या कहें मूर्खता यूरोपीय देशों,समाज ने की है हम एक बात कहेंगे कि जीवन को मशीनीकरण ने आसान बनाया है, ठीक है बिल्कुल बनाया है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि रोगी भी बनाया है,असमय मृत्यु का ग्रास भी बनाया है हजारों, लाखों लोगों को मारा भी है और आयु कम कर दी है आकाश,पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को प्रदूषित कर दिया है न जाने कितने करोड़ों जीवों को असमय मारा है।

अपने लिए न्याय मांगने दौड़ते हैं और लाखों, करोड़ों जीवों को असमय मारते हैं?


इसलिए प्रकृति अपना काम अपने आप करेगी आप रोयें, चिल्लायें कुछ भी करें।

इससे अच्छा यह होगा कि आप सर्दी का आनंद लीजिए समय पर अपना प्रबंधन कीजिए हर मौसम अच्छा है उसकी सकारात्मकता को पहचानें और उसका आनंद लें।हर मौसम को जीने दो।


#हर #मौसम #को #जीने #दो

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

अमेरिका, यूरोप का कम्युनिस्ट विचारधारा नामक सांप अब उनको डंसने लगा है।

 आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जब दुश्मन अपने सर्वनाश की तरफ क़दम उठाए तो उसे रोकना, टोकना नहीं चाहिए उसके काम में व्यवधान नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह इतना उग्र हो जाएगा कि उसका सर्वनाश उसके कर्म करते हैं इसी प्रकार कम्युनिज्म ने पूरी दुनिया में आतंकवाद को पाला पोसा है कम्युनिस्ट कभी भी मुस्लिम मज़हब की जघन्य कृत्यों और कुरीतियों पर कभी एक शब्द नहीं कहते लेकिन हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति के विरोध में झूठे लेख लिखते हैं और एजेंडे चलाते हैं समाज को जातियों में, धर्म के नाम पर बांटते हैं लोगों में अफवाहें फैला कर उनके खिलाफ दुनिया से धन इकट्ठा करके लालच देकर उन्हें उनके ही देश, परिवार के विरुद्ध खड़ा करते हैं 

दुनिया में यूरोप और अमेरिका ने कम्युनिस्ट को पाला है और भारत में कांग्रेस ने पाला पोसा है और आज यही कम्युनिस्ट विचारधारा से पाले गए मुस्लिम मज़हब की कट्टरता इतनी हावी हो चुकी है कि यूरोपीय देशों में आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और अब अमेरिका के अंदर दख़ल दे दिया है अभी कुछ समय बाद आप देखेंगे न्यूयॉर्क में आतंकवाद पैर पसार लेगा और वहां नफ़रत की आंधी आएगी।

क्योंकि अमेरिका और यूरोप ने जो कम्युनिस्ट विचारधारा का सांप पाला है वह भारत और एशिया को बर्बाद करने के लिए पाला था अब यह सांप अमेरिका और यूरोप को डंसने उनके घर में पहुंच गया है आज लंदन सुरक्षित नहीं है लंदन से पिछले एक साल में बारह हजार मिलिनेयर लोग चले गए हैं इस बढ़ते आतंकवाद, मुस्लिमकरण के चलते। 

जब तक हम किसी बात को मन बना कर समझते नहीं हैं जब तक हम सच को समझते नहीं, झूठ और सच का अंतर नहीं समझते या जानते हुए भी बोलते नहीं तो हम अपराध कम नहीं कर सकते उसको बढ़ने का अवसर दे रहे होते हैं और यह काम भारत में ख़ुद सेक्युलर हिन्दू समाज ने किया है।और यही काम यूरोप और अमेरिका के कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों ने किया है जिसके घातक परिणाम अब उनको भुगतान करने होंगे।


रविवार, 26 अक्टूबर 2025

नयी ग़ज़ल। सूबे सिंह सुजान

 घबराइए नहीं कभी भी कामकाज से 

हर काम कीजिए सदा अपने मिज़ाज से।

सच के लिए विवाद नहीं, चर्चा ही करो, 

पीछे हटें न हम किसी भी ऐतराज से।

जो बात हम करें,तो सकारात्मक करें,

नीयत को ठीक करके ही प्रण कर लें आज से।

हमको बदलना होगा, नये वक्त के लिए,

बेशक मिली थी, कमियां हमें इस समाज से।

व्यापार का भी धर्म और संस्कार खूब है,

हम मूलधन को छोड़ बहुत खुश हैं ब्याज से।


सूबे सिंह सुजान 





नयी ग़ज़ल। अभी हुई।बहुत दिनों बाद ग़ज़ल हुई है।

जब नये विचारों, मानकों, प्रतीकों की तलाश, प्यास होती है तो बड़ी मुश्किल से कुछ दिखाई पड़ता है बहुत मेहनत की भागदौड़ बहुत शांत भी करती है।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

अपनी गरिमा को व्यक्ति ख़ुद नीचे गिरा लेते हैं।


 हर व्यक्ति का अपना एक अलग अलग स्वभाव, व्यक्तित्व होता है वह उसी प्रकार,कि जिस प्रकार उसकी शक्ल अलग-अलग, बुद्धि अलग अलग होती है।

लेकिन यह तो सामान्य बात है परन्तु हैरानी तब ज़्यादा होती है जब व्यक्ति के गिरने या उठने का स्तर भी अलग-अलग देखने को मिलता है यह उठ कर या बैठना नहीं है यह चारित्रिक, वैचारिक स्तर का उठना व बैठना है इससे भी गंभीर बात तब होती है जब वह कोई उच्च स्तरीय अधिकारी के पद पर कार्यरत होकर एक सामान्य नागरिक से भी नीचले स्तर पर जानते हुए भी गिर पड़ता है।

सामाज के लिए गंभीर प्रश्न तब बन जाता है जब उच्च स्तरीय अधिकारी और उच्च चरित्र प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति यह अशोभनीय कार्य करते हैं और  वह अपने स्तर पर अपने करीबी लोगों के लिए अनेकानेक नाजायज़ कार्य करते हैं और जो व्यक्ति उनको सही राह बताए और वह उसको न अपनाकर उसी के विरुद्ध तुच्छ मानसिकता के साथ बातचीत करते हैं यह समाज में अति संवेदनहीनता को प्रदर्शित करता है और बहुत दुःखद यह होता है कि सम्मुख बैठे समाज के गणमान्य कहलाने वाले खामोश रहते हैं जबकि कुछ दिनों बाद उनका भी यह नंबर आएगा यह वह भी नहीं सोचते जबकि जानते हैं कि ऐसा होता आया है लेकिन स्वार्थ वश वह सोचते हैं शायद मेरा नहीं दूसरे का नंबर आएगा।


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

भावनाओं से व्यापार करना कानूनी जुर्म घोषित होना चाहिए

 जीवन शैली में सभ्यता , संस्कृति व धर्म का महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसके पश्चात संविधान व कानून का योगदान आया है लेकिन यदि संविधान का प्रयोग अलग अलग व्यक्तियों के लिए उनकी अलग-अलग मान्यता के लिए जानबूझकर साज़िश के तहत किया जाने लगता है तो संविधान का उल्लंघन भी जानबूझकर किया जाता है तो संविधान का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

और जब किसी एक पक्ष की जानबूझकर की गई गल्तियो में दूसरे पक्ष को भी शामिल करके अपनी बात कहना व प्रचारित करना भी एक तरह का जुर्म है और यह जुर्म अर्थात यह बात इस तरह कहना साजिशतन सिखाया जाए तो यह संविधान व कानून में अपराध श्रेणी में शामिल करके सजा दिया जाना चाहिए न कि उनकी भावनाओं की बात व विचारों की स्वतंत्रता कह कर टाल दिया जाए क्योंकि आप दूसरे पक्ष को जानबूझकर बात में हिस्सा बना कर जुर्म करने वाले के पक्ष को कमजोर करके उसे बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

जब कश्मीर में भारत के राज् चिन्ह अशोक चक्र जो हटाया, तोड़ा, जलाया जाता है जो कि बरसों से पहले वहां पर अंकित है तो उसके अपराध में उन अपराधियों को सीधा अपराधी न कह कर ,उनकी बात के बीच में दूसरे पक्ष को ले आते हैं, जिसका कोई तर्क नहीं है तो आप जुर्म करने वाले पक्ष को जानबूझकर बचाने की साज़िश कर रहे हैं।

ऐसा भारत की अदालतों में अक्सर हमारे वकील,जज लोग करते हैं और इसी तरह मीडिया भी सरेआम अपने विचारों की स्वतंत्रता का सहारा लेकर दूसरे पक्ष पर अपने विचार जबरदस्ती थोपते हुए उसे घसीट लेते हैं यह वास्तव में एक साज़िश का पहलू होता है।




सूबे सिंह सुजान 

सोमवार, 25 अगस्त 2025

वर्षा ऋतु अपने उतरार्द्ध में अधिक यौवना हो गई है।

 ऐसा भी लगता है कि वर्षा ऋतु अपने उतरार्द्ध में अधिक यौवना हो गई है जहां जहां अभी तक पेड़ पौधे,बेलें,घास आदि प्यास से मर रहे थे और उदासीनता को अपना गहना समझ रहे थे उदासी में कभी-कभी गंभीरता दिखाई पड़ती थी और गंभीरता देखने में विचारवान लगती थी और इस बौद्धिकता का पुट वर्षाकाल में भी वर्षा ऋतु का बिछोह था।

वर्षा अपने अंतिम पड़ाव में जब उम्र के निकलने, आनंद के अधूरेपन को लेकर चिंतित हो उठी तो सहसा टूट कर बरसने लगी है और पेड़ पौधे ये गिलोय की बेल तो अच्छे से समझती है जब गिलोए की बेल को पेड़ नहीं मिले तो वह बिजली के खंभे के साथ लिपट जाती है आधुनिकता वनस्पति को विवशता में अपनानी पड़ती है लेकिन मनुष्य आहत हो उठता है वह वर्षा ऋतु की इच्छाओं को सहन नहीं कर पाते हैं वह वर्षा में टूटने वाले पहाड़ों को प्रकृति की विनाशलीला का नाम देते हैं और वर्षा ऋतु के गुजरने के पश्चात उन्हीं पहाड़ों में बम लगा कर उन्हें तोड़ते हैं।

वर्षा ऋतु को अपनी प्यास भी बुझानी है और प्रकृति के हर कण तक भी पहुंचना है यदि कहीं पर वह न पहुंच सके, फ़सल अच्छी नहीं हुई तो मनुष्य उसे भला बुरा कहते हैं यदि वह अपने मन भर बरस जाए तो उसे भला बुरा कहते हैं नदियों के रास्तों में घर बना कर उसका रास्ता रोक लेते हैं और जब वर्षा ऋतु उसे बहाकर लाए तो भगवान को गालियां देते हुए रोते हैं मनुष्यों से अच्छे पेड़ पौधे व वनस्पति हैं वह उगने, टूटने पर भी वर्षा से प्रेम करते हैं कोई शिकायत नहीं करते हैं अपना अहोभाग्य समझकर उसमें तत्लीनता से समाहित हो जाते हैं।


सूबे सिंह सुजान 

#वर्षा #ऋतु 



गुरुवार, 7 अगस्त 2025

कवियों का चुटकुले सुनाना कवि होने पर सवाल खड़े करता है सूबे सिंह सुजान

 कवि सम्मेलन में जो लोग चुटकुले सुनाते हैं वह स्वयं ताली बजाने के लिए भी कहते हैं और जो लोग उनकी बात मान लेते हैं अर्थात अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं किया और सुनकर हँसते हैं एक तो जो व्यक्ति चुटकुले सुना रहा है वह स्वयं को कवि बता रहा है जबकि वह कवि नहीं है और हम सब जो वह कह रहा है वह मान लेते हैं इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है कि वह व्यक्ति चुटकुले ऐसे सुनाता है कि उनमें कहीं भी कोई बात,तथ्य, विचार,तर्क,संभावना नहीं है सिर्फ वह फुहड़ता,गाली, लड़कियों व लड़कों के जननांगों पर गाली द्विअर्थी संवाद में देते हैं और लड़कियां वहां बैठी हुई बहुत हंसती हैं वह ख़ासतौर पर औरतों पर नंगेपन के चुटकुले सुनाते हैं और हम बिना समझे हंस रहे हैं।

हास्य-व्यंग्य बहुत सकारात्मक और सटीक विधा है आप हास्य व्यंग को कबीरदास,दुष्यंत कुमार,धूमिल और न जाने कितने असंख्य शायरों की शायरी में देख सकते हैं लेकिन उनमें कहीं भी फुहड़ता,नंगापन नहीं है लेकिन अत्यधिक चिंतित करने वाली बात यह है कि हम वही लोग वहां बैठकर कैसे हंस लेते हैं जो हमारे ऊपर, हमारी संस्कृति, संस्कार, विश्वसनीयता पर हमला होता है हमें उसको सहन ही नहीं करना था लेकिन हम हंस रहे हैं?


कवि वह होता है जो काव्य के माध्यम से आपकी बुद्धि का योग करवाता है जो आपकी बुद्धिमत्ता को प्रखर करता है आपकी बुद्धि को खेल खिलाता है ताकि वह स्वस्थ रहे

और इसके लिए नये विचार या पुनः विचारों को अभ्यास में लाना या बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना होता है सामाजिक,देशकाल, व्यवहार, प्रेम, मनोरंजन, श्रृंगार,सदाचार, भक्ति,जीवनशैली,जीवन तत्वों के बारे सटीक बौद्धिकता को जागरूक करता है। 

यदि हम कुछ समय के लिए उच्च विचार विमर्श को सुनना शुरू करेंगे तो हमें उसमें आनंद भी आएगा और ज्ञान अर्जित भी होगा। उच्चता, श्रेष्ठता को समझने में आनंद है जो उच्च बुद्धिजीवी होते हैं वह गहरी अर्थपूर्ण कविता, ग़ज़ल, कहानी को सुनना व कहना पसंद करते हैं जो लोग केवल गंदे चुटकले पर हंसते हैं या सुनाते हैं वह दोनों प्रवृति के लोग निम्न चरित्र को अपनाना और प्रस्तुत करना पसंद करते हैं।


सूबे सिंह सुजान 


हिंदी पर मुसलसल ग़ज़ल - सूबे सिंह सुजान

 हिंदी पर मुसलसल ग़ज़ल -


अपना स्वदेश भाव हिंदी में 

एकता का बहाव हिंदी में।

देश में रोज़गार या व्यापार,

और ही और बढ़ाव हिंदी में।

दादा, माता पिता बहन भाई, 

प्रेम, संबंध चाव हिंदी में।

सारी भाषाओं की यही सिरमौर,

जोड़ने का लगाव हिंदी में।

मन वचन कर्म भारतीय रही 

ऐतिहासिक रखाव हिंदी में।

भावनाओं का एक संगम है,

शत्रुता का अभाव हिंदी में।

कुल की रक्षा सदैव करती है,

चौधरी का दबाव हिंदी में।

देश भारत को जोड़ने का है,

सबसे ज़्यादा प्रभाव हिंदी में।


सूबे सिंह सुजान



शनिवार, 5 जुलाई 2025

वायु की दिशाएं रोग व निदान तय करती हैं।

 वायु की दिशाएं रोग व उनके निदान तय करती हैं।


एक भारतीय किसान हवा के दिशाओं की ओर से बहने के लाभ व हानि को सदियों से जानते हैं और उनका अपनी फसलों के लिए प्रयोग करते आए हैं ।

जैसे पश्चिमी दिशा से बहने वाली वायु मनुष्य ही नहीं सभी फ़ैसलों, वनस्पति और पृथ्वी पर सभी प्राणियों को स्वास्थ्य प्रदान करती है और वहीं पूर्व दिशा की वायु इसके विपरित रोग को,रोग पैदा करने वाले कीट को पैदा करती है।

यह सब किसान बेहतर जानते हैं और यह उन्होंने अपने अनुभवों से सीखा गया है यह प्रकृति की प्रक्रिया के साथ आत्मसात होकर सीखा जाता है यह अत्यधिक समर्पण द्वारा सिद्ध होता है। यह विज्ञान ही तो है जिसे किसान अपने जीवन में प्रयोग करते रहे हैं।

यह उनकी शिक्षा ही है तो क्या हम केवल अंग्रेजी मानसिकता से दी गई शिक्षा को सब कुछ क्यों मानते हैं वह तो पृथ्वी, प्रकृति को नष्ट-भ्रष्ट करने का ज्यादा काम करते हैं हम सनातन को समझें यह सनातन संस्कृति के कार्य प्रकृति प्रदत्त हैं जो सदैव रहेंगे।

सूबे सिंह सुजान 

#हवा #वायु #रोग #निदान 


चित्र में सूबे सिंह सुजान अपने स्कूल के बच्चों के साथ पौधा लगाते हुए।

रविवार, 29 जून 2025

लेखकों की कामुकता के किस्से बहुत प्रचलित हैं। सुशोभित

 मैं जब भी इस तरह के वाक्य सुनता हूँ तो अचरज में पड़ जाता हूँ कि "साहित्यकार होकर भी ऐसा लम्पट-कृत्य?" 


तब मेरे मन में प्रश्न उठता है कि आपसे कहा किसने था कि साहित्यकार लम्पट नहीं होगा? साहित्य और सच्चरित्र में क्या को-रिलेशन है?


साहित्यकार वह होता है, जो कल्पनाशील हो, विचारशील हो, अध्येता हो, जिसको लिखना आता हो, कहानी सुनाना, बातें बनाना आता हो। इनमें से किसी भी गुण का सम्बंध इंद्रिय-संयम या ब्रह्मचर्य या चरित्रगत-निष्ठा से नहीं है। उलटे इस बात की सम्भावना अधिक है कि साहित्यकार या कलाकार का चरित्र साधारणजन से भी क्षीण हो।


कारण, साहित्यकार की कल्पनाशीलता उसे और ऐंद्रिक बनाती है। अपनी ऐंद्रिकता से वह और निष्कवच (वल्नरेबल) हो जाता है। अगर वह चरित्रगत रूप से दृढ़ भी हो, तो सोने पर सुहागा है, और वांछनीय है! किन्तु अपेक्षित नहीं है। यह गुण किसी योगी से अपेक्षित हो सकता है, साहित्यकार से नहीं।


लेखकों की कामुकता के किस्से बहुत प्रचलित हैं। अज्ञेय की सेक्शुएलिटी बहुत विचित्र थी। अक्षय मुकुल ने उनकी जो जीवनी लिखी है उसमें उसके ब्योरे दिए हैं। 'शेखर एक जीवनी' में भी सघन कामुकता की एक अंतर्धारा सर्वत्र व्याप्त है। श्रीनरेश मेहता ने आधुनिक गीत-गोविन्द कहलाने वाला काव्य ('तुम मेरा मौन हो') केवल कल्पना से ही नहीं लिख दिया है। शमशेर के यहाँ जो तीखी सेंसुअसनेस है, वह महज़ भाषाई नहीं है। इस बारे में अधिक जानने के लिए मलयज को पढ़ें। चन्द्रकान्त देवताले ने एक बार निजी चर्चाओं में मुझे बतलाया था कि उन्होंने विदेश से भारत लौटे एक बड़े लेखक को एक स्त्री के सम्मुख अभद्र प्रस्ताव रखते देखा था। मैं यहाँ नाम नहीं लिखना चाहता, किन्तु कम से कम दो ऐसे लेखकों के बारे में मुझे ज्ञात है, जिन्होंने कन्या महाविद्यालय का संचालन कर रहे व्यक्तियों से अनुचित 'आपूर्ति' की माँग की थी। राजेन्द्र यादव, आलोक धन्वा, धर्मवीर भारती, शिवमंगल सिंह सुमन के नाम से प्रचलित किंवदंतियों के बारे में कुछ ना कहूँ तो ही बेहतर, पाठक बेहतर जानते होंगे।


यह तो मैंने हिन्दी लेखकों की बातें कहीं, विश्व में बायरन, तोलस्तोय, नेरूदा, मार्केज़, पिकासो, हिकमत, लोर्का, डाली आदि लेखकों-कलाकारों के जीवन-वृत्तांत आप पढ़ेंगे तो पाएँगे कि स्त्री-संयम के मामले में उनमें से कोई भी साधु नहीं था। उलटे सच्चाई इसके विपरीत थी। इनमें से कुछ तो दुर्निवार व्यभिचारी थे। रोमन पोलंस्की पर एक माइनर के साथ यौन-दुराचार का मुक़दमा चला था और उसके बाद भी उन्हें ऑस्कर पुरस्कार दिया गया था!


मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि लेखक-कलाकार के अपराध क्षम्य हैं। उलटे, मेरा प्रस्ताव है कि अगर कोई लेखक-कलाकार होकर भी अपराध करता है तो उसे उसी अपराध के लिए किसी साधारणजन को दी जाने वाली सज़ा से अधिक सज़ा दी जाए, क्योंकि उसमें किसी के विश्वास-भंग का नैतिक-अपराध भी सम्मिलित हो सकता है। किन्तु आपको समझना होगा कि किसी लेखक-कलाकार का अतिशय कामुक होना आपको असहज भले करता हो, वह अपराध नहीं है।


बलात्-चेष्टा अपराध है, यौन-प्रस्ताव रखना अपराध नहीं है। 


दबाव या भयादोहन से या विवशता का लाभ उठाकर बनाया गया सम्बंध अपराध है, किन्तु किसी पुरुष-लेखक का स्त्री में यौन-रुचि रखना अपराध नहीं है।


हाँ, अगर कोई श्रेष्ठ लेखक-कलाकार ऊँचे चरित्र वाला, दृढ़-प्रतिज्ञ, इंद्रिय-निरोधी भी हो तो उसकी गरिमा और बढ़ जाती है। किन्तु- दुर्भाग्य से- वैसे उदाहरण विरल ही हैं। और भला लगे या बुरा- एक कलाकार के रूप में किसी रचनाकार की श्रेष्ठता का निर्णय अन्तत: उसके कृतित्व से ही किया जाएगा, उसके चरित्र से



नहीं!


Sushobhit


गुरुवार, 26 जून 2025

प्रणय निवेदन करना पुरुष का अधिकार है। सुशोभित

 प्रणय-निवेदन करना पुरुष का स्वाभाविक अधिकार है! जब तक कि उसमें




दबाव न हो, भयादोहन न हो, विवशता का लाभ उठाने की भावना न हो, बलात्-चेष्टा न हो। वह अपने नाम के अनुरूप ही एक 'निवेदन' हो!


और उस निवेदन को स्वीकार या अस्वीकार कर देना स्त्री का अधिकार है!


ये दोनों अधिकार एक साथ अपनी गरिमा और चाहना के आवरण में अस्तित्व में रह सकते हैं, इन दोनों ही अधिकारों को उन दोनों से छीना नहीं जा सकता।


अलिखित शर्त यही है कि पुरुष की प्रणय-याचना सुघड़, सुधीर, संयत और इसके बावजूद ऐंद्रिक, काव्योक्त और तीक्ष्ण हो! 


प्रणय-निवेदन कितना सुंदर है, स्त्री की कल्पनाओं में यह भी सम्मिलित होता है, रतिकेलि और संसर्ग तो ख़ैर होते ही हैं।


स्त्री कहती है- "मैं जानती हूं तुम क्या चाहते हो। किंतु उसे ऐसे कहकर दिखलाओ कि रीझ जाऊं!"


और तब, अगर पुरुष धीरोदात्त है, नायक है, सुशील है, तो स्त्री के समर्पण को अर्जित करने का यत्न करता है, ठीक वैसे ही, जैसे किसी पुरुष को करना चाहिए।


स्त्री और पुरुष के बीच धधकती हुई कामना की यह चेष्टा इतनी सुंदर है कि यह काव्य रचती है, शिल्प रचती है, संगीत रचती है, सृष्टि की संसृति वैसे ही हुई है, ब्रह्मांड का विस्तार इसी रीति से सम्भव हुआ है।


पुरुष को स्त्री की सम्मति के प्रवेशद्वार पर खड़े होकर प्रतीक्षा करनी होती है, जितनी अनुमति वह देती है, उतना ही उसके भीतर प्रवेश करना होता है। इस नियम का उल्लंघन सम्भव नहीं।


हर वो बलात्-चेष्टा, जो इस मर्यादा को लांघती है, अपराध है। नैतिक अर्थों में ही नहीं, बल्कि सौंदर्यशास्त्रीय अर्थों में भी। 


किसी भी रीति का अनधिकार प्रवेश बलात्कार की ही पूर्वपीठिका है। 


लौकिक साधनों से अगर स्त्री के हृदय में प्रवेश की कुंजी मिल सकती तो आज हाट में बेभाव बिक रहे होते प्रेम, सघन-कामना, स्फूर्त-रतिचेष्टा और परम-संतोष की आदिम-कंदराएं!


और स्मरण रहे कि प्रणय-निवेदन या यौन-प्रस्ताव पर पुरुष का एकाधिकार नहीं है, स्त्री भी यह निःसंकोच होकर कर सकती है। करती ही है! प्रगाढ़ अनुभवों से कहता हूं!


स्त्री और पुरुष के परस्पर से ही रति-चेष्टाओं और यौन-क्रीड़ाओं का परिसर सुशोभित होता है, बलात्-चेष्टा के किसी प्रसंग से इस परस्पर को कलंकित करना स्वयं के विरुद्ध विद्रोह करना ही कहलाएगा!


Sushobhit