दरअसल हमारे शिक्षक वर्तमान समय में मीठा ज़हर का इस्तेमाल करते हैं यह चाहते हैं इन्हें काम करने के लिए भी कोई न कहे
और यूनियन इनके आराम का प्रबंध करे।
यह मीठा ज़हर धीरे धीरे स्कूलों को बंद करने का मुख्य कारण है।
यह सोचते हैं कि जो स्कूलों में काम करने को कहें उनका विरोध करो।
और इसी का परिणाम धीरे धीरे आ रहा है।
मुझसे तो यह शिकायत बहुत लोगों को है मैं ऐसा कह देता हूं।
यूनियन के लोगों से बलि की उम्मीद करते हैं कि सब काम उनके लिए करें और इनको सामने न आना पड़े।
आप तो हम अपने स्कूल की समस्या लिखकर नहीं दे सकते हैं और स्कूल में कोई गांव का सामान्य,निर्धन व्यक्ति काम आए तो सब लिखित में चाहिए?
फिर सब नियम याद आ जाते हैं लेकिन स्कूलों को बेहतर करने के लिए, बच्चों की सुविधाओं के लिए एक अधिकारी के सामने नहीं जा सकते, किसी को लिख कर शिकायतें नहीं कर सकते हैं?
संगठन की कॉल पर धरना प्रदर्शन में नहीं आ सकते?
मतलब जो मानसिकता भगतसिंह की फांसी के समय थी, वही मानसिकता ज़्यादा बलवती हो रही है
कि मरने के लिए कोई और जाए हमें न जाना पड़े।
लेकिन समस्या दूर करने के लिए कोई और आएं।
मुझसे यह बात कहने पर शिकायत बहुत शिक्षकों को है।
इससे जाहिर होता है कि मैं उनके सोए ज़मीर पर थोड़ी दस्तक देने की कोशिश करता हूं लेकिन वह उन्हें बुरी लगती है क्योंकि उनकी नींद में खलल पड़ता है।
सूबे सिंह सुजान



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