सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

गीत चतुर्वेदी का लेख - दिल के किस्से कहाँ नहीं होते

*गीत चतुर्वेदी की कलम से : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते*


मशहूर साहित्यकार गीत चतुर्वेदी ने लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा और अध्ययन द्वारा प्राप्त क्षमता द्वारा रचित रचनाओं पर जो सवाल उठाये जाते हैं, उसी मुद्दे पर यह लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि प्रतिभा नैसर्गिक हो सकती है, किंतु ज्ञान नैसर्गिक नहीं हो सकता, उसे अर्जित करना पड़ता है अध्ययन से चिंतन से. गीत चतुर्वेदी का मानना है कि रचना की श्रेष्ठता महत्वपूर्ण ना कि यह देखना कि वह नैसर्गिक प्रतिभा द्वारा लिखी गयी है यह एक्वायर्ड ज्ञान द्वारा. प्रस्तुत है गीत चतुर्वेदी का आलेख :  दिल के क़िस्से कहां नहीं होते -गीत चतुर्वेदी- जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है.' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी. मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था. बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे. मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है. मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता. अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे. मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब.    बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई. उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं. हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे. कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे. एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है. तुम्हारा ज्ञान नैसर्गिक ज्ञान नहीं है.' उसके बाद कई दिनों तक हमारी बहसें इसी मुद्दे पर होती रहीं. बहसों का कोई हल नहीं होता. हममें इतना ईगो हमेशा होता है कि हम 'कन्विंस' होने की संभावनाओं को टाल जायें.   लेकिन मुझे बुरा लगा था. एक्वायर्ड शब्द ही बुरा लगा था. इस शब्द के सारे संभावित अर्थों को जानने के लिए उस रोज़ घर लौटकर मैंने सारे शब्दकोश और थिसॉरस पलटे थे. मुझे एक भी नकारात्मक अर्थ नहीं मिला, लेकिन फिर भी मुझे बुरा लगा था. मुझे बुरा क्यों लगा था? इसका कारण समझने में मुझे कुछ बरस लग गए. जब मेरी प्रतिभा को नैसर्गिक कहा गया था, तो मुझे अच्छा लगा था. जब उसे एक्वायर्ड कहा गया, तो मुझे बुरा लगा. कारण हमारे सामूहिक—सामाजिक—कलात्मक संस्कार थे. हमें बचपन से ही लगभग यह मनवा दिया जाता है कि श्रेष्ठताएं जन्मजात होती हैं. प्रतिभा जन्मजात होती है. बिरवा के पात चिकने हैं, यह बचपन में ही पता चल जाता है. हमें यही स्थिति सबसे अच्छी लगती है. श्रम से पायी गयी, अर्जित की गयी चीज़ों को, वह भी कला के संदर्भ में, अच्छा नहीं माना जाता. अभी पिछले हफ़्ते एक सज्जन कह रहे थे कि नेरूदा नैसर्गिक हैं, एक बार में कविता लिख देते थे, जबकि मीवोश को अपने क्राफ्ट पर बहुत काम करना पड़ता था, इसलिए वह कवि से ज़्यादा मिस्त्री हैं.   प्रतिभाएं तो नैसर्गिक हो सकती हैं, पर क्या ज्ञान भी नैसर्गिक हो सकता है? चाहे बुद्ध हों या आइंस्टाइन, कोई भी जन्मजात ज्ञान लेकर नहीं आता. उसे ध्यान और अध्ययन दोनों की शरण में जाना होता है. दोनों में गहरा भाषाई रिश्ता है. निरंतर ध्यान ही अध्ययन बन जाता है. जो आप धारण करते हैं, उससे आपका ध्यान रचित होता है. इसी से बनती है मेधा. एक होती है प्रज्ञा. वह भी जन्मजात नहीं होती. आपकी मेधा से आपकी प्रज्ञा का विकास होता चलता है. प्रज्ञा, मेधा से चार क़दम आगे चलती है. मान लीजिए, आप किसी किताब के बीस पन्ने पढ़कर छोड़ देते हैं.  एक दिन आप पाते हैं कि आपके मन में वह पंक्ति या दृश्य गूंज रहा है, जो उस किताब के तीसवें पन्ने पर था, जिसे आपने पढ़ा ही नहीं था. यह प्रज्ञा का काम है. वह हमेशा उन भूखंडों में रहती है, जहां आपका अध्ययन व मेधा अभी तक नहीं पहुंचे हैं. गीत चतुर्वेदी की कलम से : जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता इसीलिए योग में प्रज्ञा का विशेष महत्व है. मेधावी तो विद्यार्थी होते हैं, प्रज्ञा योगी के पास आती है. उसे भी प्राप्त करना होता है. एक्वायर्ड होती है. पुरानी अंग्रेज़ी का एक मुहावरा है, जिसे हेमिंग्वे अपने शब्दों में ढालकर बार—बार दुहराते थे— प्रतिभा, दस फ़ीसदी जन्मजात गुण है और नब्बे फ़ीसदी कठोर श्रम. यह वाक्य नैसर्गिक व एक्वायर्ड, दोनों के एक आनुपातिक मिश्रण की ओर संकेत करता है. अगर वह नब्बे फ़ीसदी श्रम न हो, तो उस दस फ़ीसदी का कोई मोल न होगा. एक शेर याद आता है, जिसके शायर का नाम याद नहीं—  दिल के क़िस्से कहां नहीं होते मगर वे सबसे बयां नहीं होते.   पर इस मामले में मेरी मदद हेमिंग्वे से ज़्यादा अभिनवगुप्त ने की. आठ—नौ साल पहले मैंने उन्हें गंभीरता से पढ़ना शुरू किया था. ध्वन्यालोक के उस हिस्से में जहां वह सारस्वत तत्व की विवेचना करते हैं, सहृदय का निरूपण करते हैं, वहां वह प्रख्या और उपाख्या दो प्रविधियों—उपांगों का भी उल्लेख करते हैं. प्राचीन व अर्वाचीन विद्वानों ने इन दोनों शब्दों की भांति—भांति से व्याख्या की है, लेकिन मैंने इन्हें अपने तरीक़े से समझा है. प्रख्या कवि की नैसर्गिक प्रतिभा है, उपाख्या उसका अर्जित ज्ञान है. प्रख्या दर्शन है. उपाख्या अभ्यास है. यहां अभ्यास का अर्थ सीधे—सीधे प्रैक्टिस न समझ लें. अभ्यास यानी उस दर्शन को दृष्टि के व्यवहार में रखना. कवि में एक ऋषि—तत्व का होना अनिवार्य है. ऋषि शब्द को भी समझकर सुना जाये. यह इसलिए कह रहा कि याद आया, आठ-दस साल पहले जब कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था, तो सबद पर एक टिप्पणी में मैंने लिखा था कि उनमें ऋषि—तत्व है. कुछ समय बाद हिंदी के एक कवि ने इस शब्द के प्रयोग के आधार पर मुझे दक्षिणपंथी और संघी आदि क़रार दिया और कहा कि ऋषि जैसा शब्द प्रयोग कर मैं कुंवर नारायण को आध्यात्मिक रंग दे रहा हूं. उस हिंदी कवि को ऋषि शब्द का अर्थ नहीं पता है, इसीलिए वह ऐसा लिख गया. कुंवर नारायण को पता है. इसलिए उन्हें पसंद आया था. पुरानी, वैदिक संस्कृत में ऋषि के दो—तीन अर्थ होते हैं, लेकिन मूल अर्थ है— वह व्यक्ति जिसे बहुत दूर तक दिखाई देता हो. इसीलिए जब वेदों का उल्लेख होता है, तो ज्ञानी लोग 'मंत्रों के रचयिता' नहीं, 'मंत्रद्रष्टा' शब्द का प्रयोग करते हैं. कविता रची नहीं जाती, वह पहले से होती है, आप बस उसे देख लेते हैं, उसे उजागर कर देते हैं. उजागर करने की प्रक्रिया में बहुत श्रम लगता है. जैसे पत्थर के भीतर शिल्प होता है, अच्छा शिल्पकार उसे देख लेता है और पत्थर के अनावश्यक हिस्सों को हटाकर शिल्प को उजागर कर देता है. दृश्य हर जगह उपस्थित होता है, अच्छा फिल्मकार उसे देख लेता है, उसके आवश्यक हिस्से को परदे पर उतार देता है। बात वही है— दिल के क़िस्से कहां नहीं होते...।  यह ऋषि—तत्व, देख लेने का यह गुण, प्रख्या है. उजागर करने की प्रक्रिया में लगने वाला श्रम उपाख्या है. रस—सिद्धांत की अच्छी समीक्षा करने वाले लोग भी इस भ्रम में पड़े रहते हैं कि सबसे बड़ा कलाकार वही होता है, जिसके भीतर जन्मजात गुण हो. बचपन से हमारे संस्कार ऐसे होते हैं कि हम जन्म से मिलने वाली श्रेष्ठताओं को ही वरीयता देते हैं. इसीलिए एक्वायर्ड शब्द या अर्जित श्रेष्ठताओं का महत्व हम नहीं समझ पाते. इसीलिए हम साधना के अध्यवसाय को नजरअंदाज़ कर चमत्कारों में यक़ीन करने लग जाते हैं. मेरे उस प्राचीन दुख का कारण यहीं कहीं रहा होगा. किसी एक को महत्वपूर्ण मान लेना, दूसरे को कम महत्व का मानना एक संस्कारी भूल है. श्रम की महत्ता को कम करने आंकने जैसा है. कवि की देह प्रतीकात्मक रूप से अर्ध—नर—नारीश्वर की देह होती है. वह यौगिक है. दो तत्वों के योग से बनी हुई देह. अनुभूति व अभिव्यक्ति का योग. कथ्य व शिल्प का योग. अंतर व बाह्य का योग. प्रख्या व उपाख्या का योग. दाना व नादान का योग. जब कृति सामने आती है, तब यह पता नहीं लगाया जा सकता कि ये दोनों तत्व अलग—अलग थे भी क्या. जैसे पानी पीते हुए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्वाद आप अलग—अलग नहीं जान सकते. हां, उसकी शीतलता और प्यास बुझाने के उसके गुण को जान सकते हैं. दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं. दोनों का संयोग महत्वपूर्ण है. इसीलए अभिनवगुप्त ने इस संबंध में कहा था-  सरस्वती के दो स्तनों का नाम है प्रख्या व उपाख्या। कलाकार यदि सरस्वती की संतान है, तो वह अपनी मां के दोनों स्तनों से दुग्धपान करता है. क्या कोई यह बता सकता है कि कालिदास, ग़ालिब और नेरूदा में कितनी प्रख्या थी, कितनी उपाख्या थी? उनका नैसर्गिक ज्ञान कितना था व अर्जित ज्ञान कितना? हो सकता है, किसी रचनाकार के जिस ज्ञान को आप उसका नैसर्गिक ज्ञान मान रहे हों, वह उसने बरसों के अभ्यास से अर्जित किया हो? और जिसे आप उसका अर्जित ज्ञान मान रहे हों, वह उसकी स्वाभाविक प्रज्ञा से आया हो, उन भूखंडों से, जहां तक वह कभी गया ही न हो? रचनात्मकता का यह रहस्य कभी भेदा नहीं जा सकता. सिंदूर प्रकरण : मैत्रेयी ने पोस्ट हटाई कहा, किसी स्त्री का अपमान नहीं होना चाहिए, समर्थन में आये कई लोग यहां ​अभिनवगुप्त का पानक याद आता है. यह पुराने ज़माने का कोई शर्बत है, जिसमें गुड़ भी होता है और मिर्च भी होती है. गुड़ और मिर्च, दोनों को अलग—अलग चखा जाए, तो अलग—अलग स्वाद मिलते हैं. लेकिन जब ईख से बने उस शरबत में इनका प्रयोग किया जाता है, तो एक अलग स्वाद मिलता है. वह तीसरा ही कोई स्वाद होता है. इसलिए कृति का स्वाद या रस, उसके इनग्रेडिएंट्स या उपांगों को देखकर नहीं जाना जाता, बल्कि कृति के संपूर्ण प्रभाव को देखने पर ज़ोर दिया जाता है. क्योंकि आपके पास वही आता है. हम तक नेरूदा और मीवोश के प्रभाव आते हैं, उनका होमवर्क नहीं आ सकता. अंग्रेज़ी में इसे गेस्टॉल्ट इफेक्ट कहते हैं. गेस्टॉल्ट जर्मन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है संपूर्ण. आधुनिक दर्शन व मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा गेस्टॉल्ट पद्धति पर आधारित है. यह पद्धति कहती है कि चीज़ों को उनके टुकड़ों में न देखा जाये, बल्कि उसे एक में देखा जाये. बहुलता को आधार अवश्य बनाया जाये, लेकिन बहुल के समेकित प्रभाव को जाना जाये. दाल को हल्दी, नमक, मिर्च, तड़का के अलग—अलग उपांगों में बांटकर नहीं चखना चाहिए, उसके समेकित प्रभाव को जानना चाहिए. अंत में आपको 'एक' तक पहुंचना ही होगा. यही 'एक' है, जिसकी ओर शंकर ले जाना चाहते हैं, अभिनवगुप्त ले जाना चाहते हैं, और इसी 'एक' तक बुद्ध भी ले जाना चाहते हैं. बुद्ध में अद्वैत है. भरपूर है. इसका एक प्रमाण यह भी कि बुद्ध का एक नाम 'अद्वयवादी' भी है और यह नाम बुद्ध के जीते—जी प्रचलित हो चुका था. और इसी का उल्टा रास्ता पकड़कर चलें, तो देरिदा और बॉद्रिला के विखंडनवाद और संरचनावाद को समझ सकते हैं. प्राचीन भारतीय दर्शन 'बहुत से एक' की ओर ले जाता है, तो आधुनिक यूरोपीय दर्शन 'एक से बहुत' की ओर. तो जब कोई यह कहता है कि नेरूदा नैसर्गिक थे, क्योंकि वह एक बार में लिख देते थे और मीवोश को अपने क्राफ्ट पर मेहनत करनी होती थी, तो हंसी आ जाती है। क्योंकि तब यह पता चल जाता है कि कहने वाला 'बाल' है, वह अभी अपने 'बाल—पने' से नहीं निकल पाया है, भले सत्तर का हो गया हो. यह कैसे पता चलेगा कि किसी ने एक रचना एक ही बार में लिख दी या दस दिन की मेहनत से? और यह पता करने की ज़रूरत भी क्या है? रचना कैसी है, यह क्यों नहीं देखते? एक बार में लिख देने से भी श्रेष्ठ है तो भी अच्छी बात. चार बार लिखने के बाद भी श्रेष्ठ है, तो भी अच्छी बात. तथाकथित नैसर्गिक प्रतिभा से आयी हो या तथाकथित एक्वायर्ड प्रतिभा से, रचना की श्रेष्ठता ही उसका गेस्टॉल्ट है.  महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की सच्चाई को उजागर करती ध्रुव गुप्त की कहानी ‘अपराधी’ मध्य—युग के एक इतालवी कवि का किस्सा याद आता है : उसका समाज मानता था कि यदि कोई रचना एक ही बार में लिख दी गयी हो, तो वह ईश्वर—प्रदत्त है. यानी उस रचना की श्रेष्ठता निर्विवाद है. कलाकार हमेशा एक निर्विवाद श्रेष्ठता को पाना चाहता है. तो उस इतालवी कवि ने एक दिन घोषणा की कि मैंने यह लंबी कविता कल रात जंगल में प्राप्त की है, एक प्रकाशपुंज दिखा, और उससे यह कविता मुझ पर नाज़िल हुई. उसके समाज ने उस कविता को महान मान लिया. वह थी भी श्रेष्ठ कविता. कुछ समय बाद वह कवि मरा, तो एक स्मारक बनाने के लिए उसके सामान की तलाशी ली गयी. वहां उसकी दराज़ों में उसी कविता के बारह या अठारह अलग—अलग ड्राफ्ट मिले. वह उसे छह साल से लिखने की कोशिश कर रहा था. चूंकि उसका समाज वैसा था, एक निर्विवाद श्रेष्ठता पाने के लिए उसे दैवीय चमत्कार की कल्पना का सहारा लेना पड़ा.

- गीत चतुर्वेदी।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

ग़ज़ल, गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ
अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना
हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं
बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

जितने पशु पक्षी  थे, उतने वाहन हुए
भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले
शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग रही
इस तरफ आजकल बंद हैं खिड़कियाँ

क्रोध की आग है आग से भी बुरी
फूँक दो आग में मन की सब तल्ख़ियाँ

इक नज़र खुश्क मौसम पे जो डाल दो
बोलना सीख जायेंगी खामोशियाँ

रास्ता अपने जाने का रखने लगीं
आजकल घर बनाती हैं जब लड़कियाँ 

प्रश्न यह पूछना आसमाँ से "सुजान"
निर्धनों पर ही क्यों गिरती हैं बिजलियाँ

सूबे सिंह सुजान 

बुधवार, 16 जनवरी 2019

तफ़्ता जी का ख़त महर्षि जी के नाम A letter to mahrish by S.P.TAFTA

आदरणीय तफ़्ता जी ने महर्षि जी को लिखा पत्र।
महरिषः” एक अज़ीम शायर,सिक़ा अरूज़ी और एक हमःजिह्त शख़सीयत ।
                    जिनसे मिलकर ज़िन्दग़ी से इश्क हो जाये,वो लोग
                    आपने शायद न देखे  हों  मगर ऐसे  भी हैं।
मुझे संयोग साहित्य (सहमाही हिन्दी डाइजेस्ट)के सम्पादक श्री मुरलीधर पाण्डेय जी का हुक्म हुआ है कि मैं क़िब्ला “महरिष”, जो इल्मे-अरूज़ और छन्द शास्त्र के प्रकांड विद्वान हैं,की शख़्सियत और अदबी ख़िदमात(व्यक्तित्व एंव कृतित्व)के बारे में कुछ लिखूं । श्री पाण्डेय जी के ख़त ने मुझे सख़्त तज़बज़ुब में डाल दिया और मैं सोचने लगा कि मुझ जैसा मामूली क़तरा, समन्दर के उमुक़ और वुसअत के बारे में आख़िर क्या लिख सकता है ।
             यादश बख़ैर। किब्ला “महरिष” से मेरा क़लमी राब्ता 25 से 30 साल पुराना है लेकिन मज़े की बात ये है, कि आज तक हमने एक दूसरे की शक़्ल तक नहीं देखी। हाँ, ख़तो-किताबत जोरों पर रही और मैं उनसे ग़ायत दर्जे फैज़ियाब भी हुआ और मरते दम तक होता रहूँगा। अरूज़ी बारीकियों के अलावा, मैंने उनसे बहुत से दीग़र मज़ामीन के बारे में दरयाफ़्त किया और माक़ूल जवाबात पाये। उम्मीद है कि ये सिलसिला ताहयात चलता रहेगा।
                             क़िब्ला “महरिष,” डा. “ज़ार” अल्लामी, माहिरे-अरूज़,के तीन जानशीनों (उत्तराधिकारियों) में से एक हैं और इस वक़्त वो ख़ानदाने सह्र- इश्काबादी ( हमारे दादा गुरू) और डा. “ज़ार” अल्लामी के तलामज़ा में न सिर्फ सबसे सीनियर ,बल्कि सबसे मोतबर शायर नीज़ अरूज़ी भी हैं। अगर मैं साफ़ ही कहूँ, क़िब्ला “महरिष,” ख़ानवाद-ए- सह्र इश्काबादी की आबरू हैं। मैं एलानिया कहता हूँ कि क़िब्ला “महरिष” शायरी और अरूज़ नीज़ पिंगल में एक ज़बरदस्त हस्ताक्षर हैं।इनके बहुत से शागिर्द हैं । हालांकि इनकी उम्र नब्बे वर्ष की है, फिर भी वो दिन-रात अदब, ख़ुसूसन इल्मे-अरूज़ के चमन की आबयारी में और अपने शागिर्दों के मार्गदर्शन में, हमःतन मसरूफ़ रहते हैं। इनके दर पर आया हुआ सवाली कभी ख़ाली नहीं जाता! इल्मे-अरूज़ का कोई ऐसा राज़ नहीं है जो इनसे पोशीदा हो। छन्द शास्त्र पर इनकी लिखी हुई छह किताबें हैं, जिनमें इन्होने अरूज़ जैसे दक़ीक़ इल्म को ग़ायत दर्जे रोचक बना दिया है । अरूज़ में ज़िहाफ़ात को रीढ की हड्डी समझा जाता है लेकिन “महरिष” साहब ने ज़िहाफ़ों के पचडे में ज़्यादा न पडते हुये अरूज़ को क़ारईन ( पाठकों) के ज़ह्नों तक पहुंचा दिया है। यूं तो “महरिष” साहब ने क़ितआ,रूबाई,तज़मीन वगैरः की विधाओं(techniques) को सरल तरीके से पाठकों तक बख़ूबी पहुंचाया है, फिर भी इन्होंने ग़ज़ल को ही शायरी की मुख़्तलिफ़ विधाओं में से सबसे अफ़ज़ल माना है और भरपूर कोशिश की है कि दिलों में उतर जाने वाली ग़ज़ल कहने के लिये, शायरों को किन-किन बातों का ख़्याल रखना चाहिये। यूँ भी ग़ज़ल को उम्मुलअसनाफ़ (कविता की सब विधाओं की माँ) कहा गया है। क़िब्ला “महरिष” ने अपनी छह की छह क़ाबिले सताइश क़िताबों में ग़ज़ल के हर पहलू पर अपने आलिमाना विचार क़ारईन(पाठकों) तक पहुंचाये हैं। क़िब्ला महरिष हर ज़ाविये (दृष्टिकोण) से एक मुकम्मल फ़नकार हैं। उस्तादे मोहतरम के ओजस्वी शब्दों में---
                 अनवार-असर बनना बहुत मुश्किल है
                 बेदार  नज़र  बनना बहुत मुश्किल  है।
                 शायर तो कोई शख़्स भी हो सकता है,
                 फ़नकार मगर बनना बहुत मुश्किल है।
            “महरिष” साहब की बेशुमार अदबी खूबियों में उनकी सबसे बडी ख़ूबी यः है कि उनके कलाम में सादगी यानि सलासत बदर्ज-ए-अतम मौजूद है। ज़माने को देखते हुये वो अपने शागिर्दों को आसान और आम फ़ह्म जब़ान में कलाम तख़्लीक़ करने की तलक़ीन फ़रमाते हैं। उन्हें ये इल्म है कि इस ऊर्दू दुश्मन दौर में सक़ील(भारी) फ़ारिसी और अरबी अल्फ़ाज़ नीज़ तराकीब को कौन समझेगा।
            उनका (latest) ख़त मेरे सामने है।मेरे इसरार पर उन्होंने मुझे अपनी एक ग़ज़ल भेजी। मैंने ग़ज़ल के पहले मिसरे (उसका द्वार ही सब कुछ है) को तो यूँ ही रहने दिया , लेकिन  दूसरा मिसरा इस तरह बना दिया यानि “ईशाधार ही सब कुछ है”! हालांकि पूरी ग़ज़ल हिन्दी का लबादा ओढे हुऐ थी,फिर भी क़िब्ला महरिष ने ईशाधार के बारे में यूँ लिखा, “ईशाधार में हिन्दी कुछ ज़्यादा ही है, हिन्दी वाले ऐसा कहेंगे, मैं नहीं !”जिस शख़्स को ईशाधार तक में भरीपन महसूस हुआ हो और जिसको हिन्दी शोरा के मिज़ाज का गहराई से ज्ञान हो, वो भला भारी अल्फ़ाज़ क्योंकर बर्दाशत करेगा।उन्होने दूसरा मिसरा कुछ यूं बनाया, “पालनहार ही सब कुछ है!” और ग़ज़ल को चार चाँद लगा दिये!
अंग्रेज़ी ज़बान में किसी ने ख़ूब कहा है कि-“Brevity is the soul of wit”  इस कहावत को “महरिष” साहब ने अपनी हर किताब में और हर किताब के हर मज़मून में अमली तौर पर साकार कर दिखाया है। इनके कलम से निकला हुआ हर फ़िक़रा अंग्रेज़ी की ऊपर लिखी गई कहावत को पूरी तरह निभाता हुआ नज़र आता है।उनके हर फ़िक़रे की एक ठोस value है जिसमें कुछ न कुछ नया, प्रभावशाली एंव अर्थपूर्ण होता है।  कारी(पाठक) अगर  उनकी रचनाओं और अरूज़ी किताबों को ध्यान से नहीं पढता तो समझ लीजिये कि वो किसी महत्वपूर्ण कथन से वंचित हुआ है।
        महरिष साहब ने अरूज़ी दायरों का ज़िक्र न करते हुये भी हर बहर और उसके मुख़्तलिफ़ औज़ान को क़ारईन (पाठकों) तक बख़ूबी पहुंचाया है।इसे कहते हैं गागर में सागर भरने का हुनर।
        कुछ लोग अरूज़ को बेकार समझ कर उसकी आलोचना करते हैं, येः जानते हुये भी कि छन्दशास्त्र वेदों में वर्णित छह अंगों में से एक है अर्थात शिक्षा, कल्प,निरूक्त,व्याकरण,छन्द तथा ज्योतिष। जब पवित्र वेदों तक ने छन्द शास्त्र को पूर्ण महत्व दिया है तो इसकी अवहेलना करना न्यायसंगत नहीं है। अगरचे, शायरी एक ईश्वरदत्त प्रतिभा है जिसका अरूज़ से कुछ सरोकार नहीं है । यदि हम छन्दोबद्द कविता का सृजन करना चाहते हैं तो अरूज़/पिंगल का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है। दरअसल, अरूज़, शायर को केवल स्टैंडर्ड बाट फ़राहम करता है।अगर शेर वज़्न से आरी है तो कविता नीरस।  शायर की मुश्किलें तब और भी अधिक बढ जाती हैं जब हिन्दी अल्फ़ाज़ को सही वज़न के साँचे में ढालना होता है। अगर कविता हिन्दी में कही गई है तब भी हर हिन्दी लफ़्ज़ के सही वज़न का सही तअयुन बहुत जरूरी है, वरना शेर वज़्न से ख़ारिज हो जाएगा। मिसाल के तौर पर “प्रसाद” को अगर हम “परसाद” तथा “प्रकाश” को “परकाश” बाँधते हैं तो शेरः का वज़्न गडबडा जाएगा। अगर हम मृत्यु को “मरतू”, “कृपा” को “किरपा”, “प्रक़ति” को “पकति” बाधँते हैं तो शेरः वज़्न से ख़ारिज हो जाएगा।“प्रक़ति” को “पकति”, “प्रसाद” को “पसाद”, “प्रकाश” को “पकाश” तथा “क़पा” को “कपा” बाँधना ही सही है।हाँ कुछ अपवाद (Exceptions) भी हो सकते हैं “पयाला” फ़ारिसी लफ़्ज़ है और इसका सही वज़्न “फ़ऊलुन” होगा न कि “फ़ेलुन” । और तो और ख़ुदाए सुख़न जनाब़ मीर तकी “मीर” भी “प्यारे” के सही वज़्न “फ़ेलुन” की बज़ाए “फ़ऊलुन” के वज़्न पर बाँध गये जो सरासर ग़लत है।“मीर” का शेर मुलाहिज़ा फ़रमायेः-
        “शिकवए-आबला अभी से “मीर”
        है “पियारे” हनोज़ दिल्ली दूर” ।
ये भी मुमकिन है कि “मीर” ने “प्यारे” को बरवज़्न ‘फऊलुन’ बाँध कर (poetic license)से काम लिया हो जो हर शायर को करना पडता है।
              अरूज़ एक ऐसा ख़ौफ़नाक जंगल है कि जिसमें बडे-बडे दिग्गज भी भटक गये हैं, लेकिन महरिष साहब ने अरूज़ का इस ढंग से सरलीकरण कर दिया है और इसे इस क़दर दिलचस्प बना दिया है कि वो लोहे के चनों की बज़ाए स्वादिष्ट हल्वा बन गया है । उन्होने अरबी बहूर के मुनासिब और रोचक हिन्दी समानार्थ शब्द(Equivalents)देकर साहित्य जगत पर एक लाज़वाल एहसान किया है । अरूज़ में बहूर की कुल तादाद इकत्तीस(31) है। मिसाल के तौर पर उन्होने बहरे-मुतक़ारिब को अभिसार छन्द,बहरे-मुतदारिक को मिलनयामिनी छन्द,बहरे- कामिल को पूर्णिमा छन्द,बहरे-वाफ़िर को सुमन छन्द, बहरे और बहरे-रजज़ को गर्विता छन्द, बहरे रमल को मरूकणिका छन्द, बहरे तवील को विकसित लता छन्द,बहरे मदीद को बहूचर्चिता छन्द,बहरे-मुन्सरिह् को सरला छन्द और मुक़्तज़ब को विरहणी छन्द आदि-आदि। उन्होने बाक़ी बहूर को भी मनोहारी हिन्दी नाम प्रदान किये हैं। शब्द विभाजन और तक़ती (मात्रा गणना) के नियम भी व्यापक तौर पर समझाये हैं। हर्फ़े- वस्ल क्या है और इससे शायर किस प्रकार से लाभान्वित हो सकता है, “महरिष” साहब ने बडे ही रोचक एंव सरल ढंग से समझाया है। उन्होने “तपोवन” शब्द तथा इसकी मक़लूब (उल्टी) सूरतों के ज़रिये इक्त्तीस(31) बहूर के घटकों की सही तरतीब को सरल ढंग से समझाया है। सालिम अरकान (प्राथमिक घटक) और उनके मुज़ाहिफ़ अरकान(परिवर्तित रूप) कहाँ-कहाँ आ सकते हैं, को भी स्पष्ट रूपेण समझाया है।
                 रूबाई की विधा को अरूज़ की दुनिया में आज भी एक डरावनी विधा समझा जाता है। “जोश” मलीहाबादी जैसे अज़ीम शायर और उच्च कोटि के विद्वान ने तो रूबाई के बारे में यहाँ तक कह दिया कि ये कम्बख़्त किसी शायर को पचास साल से कम की उम्र में आ ही नहीं सकती। “रौदकी” को रूबाई की विधा का  मूजिद (अविष्कारक) माना गया है। उसने रूबाई के मूल वज़्न मफ़ऊलु मफ़ाइलुन मफ़ाईलु फ़अल/फ़उल पर समायोजन विधा अर्थात तख़्नीक के अमल से कुल 24 औज़ान निकाले। फिर हमारे दादा ज़नाब सह्र इश्क़ाबादी ने इनमें 12 औज़ान का इज़ाफ़ा किया। उसके बाद उस्तादे-मोहतरम क़िब्ला “ज़ार” अल्लामी ने 18 औज़ान का मज़ीद इज़ाफ़ा किया। इस तरह रूबाई के कुल औज़ान 54 हो गये। उस्तादे मोहतरम ने ये फ़तवा ज़ारी कर दिया कि “अब रूबाई के औज़ान में किसी किस्म के इज़ाफ़े की कोई गुंज़ाइश नहीं है”।क़िब्ला “महरिष” ने रूबाई के औज़ान को ऐसे रोचक ढंग से समझाया है कि लगता है कि रूबाई हव्वा नहीं बल्कि शौरा की दोस्त है। उन्होंने यह भी समझाया कि- जो अक्षर स्पष्ट रूप से पढनें में नहीं आते उन्हें अक्षर गणना करते समय छोड दिया जाता है।  वस्तुतः “महरिष” साहब ने अपने उस्तादे मोहतरम की नादिर तस्नीफ़ “कलीदे-अरूज़”को पढने की तरह पढा तथा समझने की तरह समझा। वो “कलीदे-अरूज़” से प्रभावित ज़रूर हुए लेकिन उनकी ज़ुमला अरूज़ी काविशें उनकी अपनी हैं।
                    ‘ग़ज़ल के विभिन्न स्वरूप नामक’ शीर्षक के अन्तर्गत महरिष साहब ने ग्यारह(11) प्रकार की ग़ज़लों का मिसालों समेत खुलकर बख़ान किया है ये ग्यारह प्रकार की ग़ज़लें जो आजकल प्रचलित हैं, यूँ हैः-  1.स्वतन्त्र अश्आर वाली ग़ज़लें 2. मुसलसल ग़ज़ल 3. नई ग़ज़ल 4. पारम्परिक ग़ज़ल 5. आज़ाद ग़ज़ल 6. यक क़ाफ़िया ग़ज़ल 7. मुस्तज़ाद ग़ज़ल 8. मुसम्मत ग़ज़ल 9. क़ितआ युक्त ग़ज़ल 10. मुरस्सा ग़ज़ल 11. ग़ज़ल सनअते मुतलव्विन में ।
     क़ाफ़िया एक टेढी खीर है ।कोह्नामश्क (स्थापित) शायर,(कवि) भी भारी ग़लतियों का शिकार होकर रह जाते हैं। “महरिष” साहब ने क़ाफ़ियों के दोष ( सिनाद,इक्फ़ा एंव ईता) को मिसालों के ज़रिये पाठकों को समझाया है। इसके अलावा उन्होने बहरे मुतकारिब में अमले- तख़्नीक ( समायोजन विधि) तथा बहरे मुतदारिक में अमले- तस्कीन ( स्थिर विधि ) को भी सरलता के साथ समझाया है। पंजाबी (Folk lore) से आये हुये माहिया एंव माहिया ग़ज़ल नीज़ दोहा एंव दोहा ग़ज़ल के बारे में भी “महरिष” साहब ने खुलकर बहस की है। अपनी अब तक की अन्तिम क़िताब “व्यवहारिक छन्द” शास्त्र में तो क़िब्ला “महरिष” ने  क़लम ही तोड डाला । जैसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं उन्होने ऊर्दू और हिन्दी शायरी के किसी पहलू को नहीं छोडा।चाहे  वो चौपाई हो या सवैया हो या फिर दोहा हो। यच तो ये है महरिष साहब की एक-एक किताब पर बेशुमार सेर-हासिल मज़ामीन क़लम बंद किये जा सकते हैं। यूं तो उनकी सभी किताबें एक से बढकर एक हैं फिर भी हम ये कहेंगे कि उनकी किताब ‘व्यवहारिक छन्द शास्त्र’ पढने और मनन करने से तआल्लुक़ रखती है।
             जबकि “महरिष” साहब की छः किताबें अरूज़ के बारे में हैं, मेरी नज़र से उनकी सिर्फ़ एक किताब “नागफ़नियों ने सजाई महफ़िलें” अभी तक गुजरी हैं। मैं समझता हूँ कि उनके पास ग़ज़लियात, क़ित्आत , रूबाईयात और तज़ामीन का एक ख़जाना मौजूद है, जिसको वो जनता के सामने अब तक इसलिये न ला सके कि उन्होने अपनी तव्ज्जो अरूज़ की तरफ़ ज़्यादा दी है।  अपने सैंकडों शागिर्दों के कलाम पर इस्लाह देने और उनका उचित मार्गदर्शन करने के कार्य में व्यस्त रहने के कारण भी वो अभी तक अपने कलामे-बलाग़त निज़ाम को मन्ज़रे-आम तक लाने में असमर्थ रहे।
    हमें उम्मीद है कि “महरिष” साहब हमारी प्रार्थना पर गौर फ़रमा कर अपनी रचनाओं का संग्रह जल्द से जल्द मन्ज़रे-आम पर लायेंगे। हालांकि उनकी कविताओं की पुस्तक “नागफ़नियों ने सजाई महफ़िलें ” में केवल 43 ग़ज़लें एंव 23 तज़मीन ही हैं लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से उनका कलाम और लोगों के कंई –कंई दीवानों पर भारी पडता है। उनके उक्त ग़ज़ल संग्रह में उन्होने “साहिर लुधियानवी” की तरह कडे चयन से काम लिया है। उनकी प्रत्येक ग़ज़ल का एक-एक शेर “मीर”के 72 शेरी निशतरों की बराबरी करता हुआ प्रतीत होता है। बानग़ी के लिये चंद अश्आर मुलाहिज़ा फ़रमायें:-
      “चटपटी है बात लछमन- सी मगर
      अर्थ में  रघुवीर सी  गंभीर  है”।
      “जब चली वात्सल्य रस की बात,
      आ गये  सूरदास  होठों  पर”।
     “ हज़ार ग़जलें कहीं तुमने नाज़नीनों पर,
      कहो कुछ इसपे, ये रोटी का एक टुकडा है”।
     “ इक तरफ दावत ख़िज़ाँ को दे रहा है आदमी,
      फिर बहारों से भी कहता है ठहरने के लिये”।
     “ द्रौपदी दाँव  पर  लगी  “महरिष”
      हार भी किस मुक़ाम तक पहुँची”।
मौलाना “हाली” के लाजवाब मर्सिये के नीचे दिये गये दो अश्आर ज़नाब महरिष पर पूरे उतरते हैं । अश्आर यूँ हैः-
     हमने सबका कलाम देखा है
     हैं अदब शर्त,मुंह न खुलवायें
     ग़ालिबे नुक्तादां से क्या निस्बत
     ख़ाक को आसमां से क्या निस्बत।
अब आगर हम ग़ालिब की जगह “महरिष” ( substitute) करके दूसरे शेर को पढें, तो न तो हक़ीक़त ही कम होगी और न ही ऐसा करना अतिश्योक्ति में शुमार होगा । वाक़ई क़िब्ला “महरिष” जैसी हस्तियाँ युगों में जन्म लेती हैं। उनके बारे में जितना भी लिखा जाये कम है।
       “सफ़ीना चाहिये इस बह्रे-बेकरां के लिये”
       कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयां के लिये”!
“महरिष” साहब हर लिहाज़ से मुजतहिदुल अस्र (Trail blazer) की हैसीयत के अलम बरदार हैं। वो जितने अच्छे इन्सान हैं उतने ही अच्छे मोतबर शायर एंव सिक़ा अरूज़ी भी हैं।उनकी तो आवाज़ भी निहायत खुश आईन्द है। लगता है फ़ोन पर बात करते हुये मुंह से फूल झड रहे हों। ये बातें किसी और के लिये लिखना कद्रे मुश्किल है। हक़ बः हक़दार रसीद ।
 खानदाने-अल्लाम  “सह्र” इश्काबादी मरहूमो मग़फूर कोई बहुत बडा ख़ानदान नहीं है। इसके डाण्डे ऊर्दू के मायानाज़ मर्सिया गो ज़नाब  “दबीर”लख़नवी से मिलते हैं। इस ख़ानदान के हर फ़र्द की एक इम्तियाज़ी हैसीयत ये है कि वो जनता के सामने एक नया तजरिबा रखता है। ख़्वाह वो ग़ज़ल का मैदान हो कि नज़्म का, ख़्वाह वो रूबाई का क्षेत्र हो कि तज़मीन का, हर फ़र्द कुछ न कुछ हट कर पेश करने का हुनर रखता है तथा यही असली फ़नकारी है।
               “हम सुख़न फ़हम हैं “ग़ालिब” के तरफ़दार नहीं”
                                      मज़मून पहले ही काफ़ी तवील हो गया है। इसको मज़ीद तवालत न देते हुये इस फ़क़ीरे-गोशागीर की तहे दिल से बारगाहे- एज़दी में यही दुआ है कि वो क़िब्ला “महरिष” को रहती दुनियां तक सलामत रखे ताकि समन ज़ारे-शायरी और अरूज़ की आबयारी होती रहे। मैं इस मज़मून को हाली के ज़ैलदर्ज शेर पर ख़त्म किया चाहता हूँ।
  > बहुत जी खुश हुआ “हाली” से मिलकर
   अभी कुछ लोग बाक़ी है जहाँ में ।
                                 आमीन सुमआमीन
                                प्रो.सत्य प्रकाश शर्मा “तफ़्ता” “ज़ारी”
                                ज़ानशीन डा. “ज़ार” अल्लामी
                                कुरूक्षेत्र (हरियाणा)
पता- 1054,गली न.-8,शांति नगर
 कुरूक्षेत्र-136119
मो. 09896850699
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गुरुवार, 10 जनवरी 2019

भारतीय संस्कृति को क्षत विक्षत करती यूरोपीय संस्कृति

भारतीय  संस्कृति को वैसे तो यूरोपीय व पाश्चात्य संस्कृति बहुत समय से नुकसान पहुँचा रही है  लेकिन पिछले गुजश्ता दस बरसों से बहुत ही तीव्र गति से नुकसान हो रहा है जैसे जैसे संचार के साधनों का तंत्र विस्तार रूप ले रहा है तैसे तैसे पाश्चात्य संस्कृति की आँधी भी तेज गति से आ रही है जो कि भारतीय संस्कृति के उस पहलू को नष्ट कर रही है जिसमें भारत के नागरिक  अपने  बच्चों को वह शिक्षा देते थे जिसमें व्यवहारिक काम करने, बडों का आदर करना, सबको एक बराबर नजर से देखना, दूसरों के दर्द को समझना, सभी प्रकार के जीव जन्तुओं में जीव भाव देखकर नुकसान न पहुँचाना , समय के साथ व मौसम के व्यवहार के साथ जीवन को संचालित करना, दूसरों को हराने की नहीं वरन साथ लेकर चलने की पंरपरा में जीना, अपनी खाद्य सामग्री को वर्ष भर के लिये एकत्रित करके रखना अर्थात प्राकृतिक साधनों का अनावश्यक रूप से दोहन न करना और सादा जीवन उच्च विचार के साथ जीवन व्यतीत करना आदि आदि ।

                                                                                          आज भारतीय संस्कृति के यह मूल्य नष्ट हो रहे हैं बच्चे काम करने की पंरपरा से दूर होते जा रहे हैं वे केवल स्वंय के लिये काम करते हैं और वह भी केवल एक समय तक के भोजन की चिंता करना अगले पल के लिये सोचते ही नहीं जिससे महामारी व मौसम की विपदाओं के समय मनुष्य कैसे अपना बचाव करेगा यह गम्भीर समस्याओं में से एक हो रही है सहनशीलता समाप्त होती जा रही है नये बच्चे साधारण सी बात पर  अपना धैर्य खो देते हैं जिससे मानव मूल्यों का पतन हो रहा है सहनशील होना मनुष्यों का समरसता का गुण है जो मानव को मानव बनाये रखता है वरना तो मानव पशु बना जाता है ।
                 प्रकृति में मनुष्य ही सभी पशु पक्षीयों के लिये मानक तय करता है पूरी पृथ्वी पर मनुष्यों ने ही कब्जा कर रखा है सभी संसाधनों को अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर रहा है जबकि प्रकृति ने सभी संसाधनों को सभी जीव जन्तुओं के लिये बराबर बनाया है लेकिन मनुष्य सभी का हक अकेले खा रहा है िस प्रकार से मनुष्य सबसे खतरनाक प्राणी है जो प्रकृति को नष्ट कर रहा है ।

                                                                                      सभी प्रकृातिक खतरों को देखते हुये कहना न होगा कि हमें पूरे विश्व को पुरातन भारतीय संस्कृति की शिक्षा देनी जरूरी हो जाती है जो संस्कृति मनुष्य को मानव बना कर रखती है और प्रकृति के साथ तालमेल करके जीवन बसर करने को प्रेरित करती है भारतीय संस्कृति  का इतिहास मानव समाज में सबसे पुराना है इसलिये ही भारतीय संस्कृति सबसे लम्बी अवधि की रही है क्योंकि इसमें सहनशीलता अधिक ही है प्राकृतिक संसाधनों के साथ, मौसमों के साथ अधिक तालमेल के साथ जीवन यापन किया गया है इस संस्कृति पर सुविधाभोगी संस्कृति ने ही हमला किया है यूरोपीय व पाश्चात्य संस्कृति केवल सुविधाभोगी है जो कि मानव को अपनी सुविधा के लिये सभी संसाधनों को नष्ट करने को प्रेरित करती आ रही है जिससे वर्तमान समय में तीव्र गति से समाज सुविधा के मोहपाश में बंधकर पृथ्वी को ही नष्ट करने के मुहाने पर आ खडृा हुुआ है भारतीय संस्कृति को सुविधाओं की पाश्चात्य संस्कृति ने हानि पहुँचायी है विश्व को बचाने के लिये भारतीय संस्कृति को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है ।

                                                                                                                सूबे सिंह सुजान
                                                                                                         कवि व शिक्षक
                                                                                                              कुरूक्षेत्र
                                                                                                                हरियाणा 

बुधवार, 9 जनवरी 2019

कविकर्म हिज़्र शायर को बाँध लेता है । शायरी ऐसे जीत लेती है ।। सूबे सिंह सुजान


हिज़्र शायर को बाँध लेता है। शायरी ऐसे जीत जाती है ।।

              कवि से अपनी बात कहलवाने के लिये कुदरत कवि को अचानक उदास कर देती है उसे दर्द देती है उसे सबके बीच में अकेला कर देती है फिर कवि और कुदरत आपस में बातें करते हैं और कविताओं का जन्म होने लगता है जैसे आकाश में तीव्र उष्णता के पश्चात बादलों का जन्म होता है और फिर बादलों से पानी बरसने लगता है और फिर पानी बरस कर नदी को जीवन देता है पेड़ पौधों की प्यास बुझाता है सारी प्रकृति को हरित कर देता है कविता होने में कुदरत  यही प्रक्रिया कवि के माध्यम से दोहराती है कवि कभी ख़ुद के लिये जीवन नहीं जीता है वह समाज, परिवेश,वातावरण के लिये जीता है वह अपने सुख त्यागता है और लोगों के सुख देखकर ही सुखों का एहसास कर लेता है और दुखों को ग्रहण कर लेता है यह कवि के जीवन का अभिन्न अंग है ।  



                                                    सूबे सिंह सुजान 


मंगलवार, 1 जनवरी 2019

NAZAM, NAYA SAL...नज़्म, नया साल

नज़्म      नया साल

इन दिनों पिछले साल आया था
पेड़ की टहनी पर नया पत्ता
वक्त की मार से हुआ बूढ़ा
आज आखिर वह शाख से टूटा ।

 जन्मदिन हर महीने आता था
और वो और खिलखिलाता था
 वो मुझे देख मुस्कुराता था 
मैं उसे देख मुस्कुराता था  ।

जिन दिनों वो जवान होता था 
पेड़ पौधों की शान होता था 
उस तरफ सबका ध्यान होता था 
और वो आंगन की शान होता था  ।

उसके चेहरे में ताब होता था
मुस्कुराना गुलाब होता था 
और बदन पर शबाब होता था
हर जगह कामयाब होता था  ।

धीरे धीरे वो फिर पड़ा पीला
क्यों हुआ ऐसा कुछ नहीं समझा
पहले तो एक दाँत ही टूटा
फिर हुआ उसका तन -बदन झूठा ।

हर कोई दिल को तोड़ जाता है
आँसुओं को निचोड़ जाता है
साथ आखिर में छोड़ जाता है
फुर्र से वक्त दौड़ जाता है ।

वक्त की नींद धीरे से टूटी
मेरी अस्मत तो वक्त ने लूटी
मैं गिरा तो मेरी जगह छूटी
फिर मेरे बाद कोंपलें फूटी ।

सूबे सिंह  "सुजान"

कुरूक्षेत्र,हरियाणा ।
9416334841

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रविवार, 9 दिसंबर 2018

रोड़ जाति का प्रामाणिक इतिहास । जो कि आनुवांशिक रूप से बेहद दुर्लभ व व्यावहारिक विज्ञान पर आधारित है

सिंधु घाटी में पश्चिम से आए थे रोड़ समुदाय के लोग                                                                  

 
यूनिवर्सिटी ऑफ तारतू के शोधकर्ताओं की टीम
सिंधु घाटी सभ्यता वर्षों से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के शोध का विषय रही है। कुछ वर्षों से आनुवांशिक शोधकर्ता भी इस पर काम कर रहे हैं। एक नये शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी की आनुवांशिक विविधता में रोड़ समुदाय की मुख्य भूमिका रही है।
रोड़ समुदाय राजस्थान और हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है और ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल से यह समुदाय इसी क्षेत्र में रह रहा है। इसीलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि रोड़ समुदाय की आनुवांशिक बनावट में एक निरंतरता है।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि रोड़ समुदाय सिंधु घाटी में कांस्य युग के दौरान यूरोपीय क्षेत्रों से आया था। इनके आने से सिंधु घाटी में पहले से रह रहे गुज्जर, जाट, काम्बोज और खत्री समुदाय की आनुवांशिक विविधता में बदलाव आया। यही कारण है कि सिंधु घाटी में रहने वाले विभिन्न समुदायों के आनुवांशिक फलक पर रोड़ अपनी यूरेशियन आनुवांशिक विशेषताओं के कारण आज भी अलग दिखाई देते हैं।
इस शोध में यह भी पाया गया है कि सिंधु घाटी और गंगा के मैदानी भागों में रहने वाले समुदायों के बीच एक आनुवांशिक संबंध है। इसका कारण सिंधु घाटी के पतन के बाद वहां रहने वाले समुदायों के गंगा के मैदानी इलाकों में पलायन को माना गया है।

डॉ अजय कुमार पाठक (बाएं) और डॉ ज्ञानेश्वर चौबे (दाएं)
" वैज्ञानिकों ने वर्तमान में यहां रह रहे गुज्जर, जाट, काम्बोज और खत्री जैसे सिंधु घाटी के समुदायों के डीएनए की तुलना यूरोपीय मूल के प्राचीन काल के डीएनए नमूनों से की है। रोड़ समुदाय के डीएनए के नमूने कुरुक्षेत्र के आसपास के इलाकों से लिए गए हैं।"
रोड़ समुदाय की उत्पत्ति गुजरात और राजस्थान के सीमवर्ती क्षेत्रों में मानी जाती है और ऐतिहासिक रूप से सिंध के रोड़ इलाके में इस समुदाय की आबादी अधिक रही है। वर्तमान में भारत में रोड़ समुदाय की कुल जनसंख्या 7.5 लाख मानी जाती है।
भारत में ऐतिहासिक डीएनए नमूनों की कमी है, इसीलिए वैज्ञानिकों ने वर्तमान में यहां रह रहे गुज्जर, जाट, काम्बोज और खत्री जैसे सिंधु घाटी के समुदायों के डीएनए की तुलना यूरोपीय मूल के प्राचीन काल के डीएनए नमूनों से की है। रोड़ समुदाय के डीएनए के नमूने कुरुक्षेत्र के आसपास के इलाकों से लिए गए हैं। इस अध्ययन के नतीजे अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित किए गए हैं।
प्रमुख शोधकर्ता डॉ अजय कुमार पाठक ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस अध्ययन के लिए एकत्रित किए गए डीएनए आंकड़े और पूर्व अध्ययनों से मिली जानकारियों से यह साफ हो जाता है कि रोड़ समुदाय उत्तर भारतीय वंशावली को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है।”
इस अध्ययन से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता डॉ ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार, “अभी चल रहे आनुवांशिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि सिंधु घाटी में रहने वाले समुदाय कहां से आए थे और कैसे वे भारत के अन्य क्षेत्रों में फैल गए।”
इस अध्ययन में वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान और एस्टोनिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ तारतू के वैज्ञानिक शामिल थे। शोधकर्ताओं में डॉ पाठक तथा डॉ चौबे के अलावा, मानवेंद्र सिंह, प्रमोद कुमार, नीरज राय, मयंक मंडल, लिंडा ओंगारो, जूरी पारिक, एनी मेत्सपालु, सिरी रूत्सी, मेत मेत्सपालु, एलिना कुश्निआरेविच, फ्रैंसेस्को मॉन्टिनारो, लुका पागानी, टूम्स किविसिल्ड और रिचर्ड विलेम्स शामिल थे। इंडिया साइंस वायर

http://vigyanprasar.gov.in/isw/haryanas-rors-brought-western-flavour-to-indus-valley-hindi.html 

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

ASHARA UL HAQ MAJAJ LAKHNVI  ....

हिजाबे फतना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था।
 खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

 तेरी नीची नजर खुद तेरी अस्मत की मुहाफज है।
 तू इस नश्तर की तेजी आजमा लेती तो अच्छा था

 यह तेरा जर्द रुख, यह खुश्क लब, यह वहम, यह वहशत।
 तू अपने सर से यह बादल हटा लेती तो अच्छा था

 दिले मजरुह को मजरुहतर करने से क्या हासिल? 
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

 तेर माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है। 
अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

 तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही खूब है लेकिन।
 तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।


- मजाज़ लखनवी   >
MAJAJ LAKHNVI  sahb ko suniye    jagjit singh ki aawaj men...
                                  शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ 
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ 
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी 
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी 
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल 
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल 
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी 
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी 
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल 
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल 
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ 
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां 
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं 
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं 
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये 
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये 
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ 
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ 
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब 
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब 
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ 
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ 
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने 
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने 
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ 
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ 
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ 
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ 
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ 
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ 
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ  

https://www.youtube.com/watch?v=BMzTmp97F6E

What budhha wanted to know महात्मा बुद्ध ने क्या जाना

After seeing the four great ills Young Prince Gautum was perplexed,anxious and frustrated.I will refrain from saying afraid but I know that it is horryfying to realize that you crumble into nothingness after suffering all the while.He asked himself :
If all powerful and lets it so, then he is not good
and if he is not good then he is not God.
Being a deeply spiritual and religous individual it is perhaps the most stressfull Query I am faced with everytime there is a tragedy that leaves hundreds,thousands and sometimes lakhs suffering for no apparent folly.It can be explained by Karma but if  we look at it rationally it is impossible that all the fishermen,women and children who died in the tsunami comitted the same quantum of error to deserve a similiar fate.Such an act when committed by nature instills in us all the same emotions as one would feel when people are shot at or bombed in a terror episode but the subsequent feelings are quite different.While people thank their stars and God for saving them from a Tsunami they would never do the same if a terrorist let them be.An explanation that I have is quite simplistic – if a Human cannot give life he also does not have the right to take it.But then it is not quite simple when you say by the same logic that if God gives us life he can take it at the time and place of his choosing.Is it some sort of a cosmic sport ?
I really do not know what the answer is but each time I look at a new born I am convinced of the existence a loving power that smiles at me as if teasing me to scratch my head a little more and saying “keep looking,you will know”.
I promise myself that I will do exactly that.I will keep looking . 

taged philoshphy

Madhushala by dr. haivansh rai bachchan

Apne yug mein sabko anupam gyaat hui apni haala,
Apne Yug mein sabko adbhut gyaat hua apna pyaala,
Phir bhi vridhon se jab poocha ek yehi uttar paya,
ab na rahe woh peenewale ab na rahi woh Madhushala.
Kitini Jaldi rang badalti hai apna chanchal haala,
Kitni Jaldi Ghisne Lagta haathon mein aakar pyaala,
Kitni Jaldi saki ka aakarshan ghatne lagta hai,
Praat nahin thi vaisi jaisi raat lagi thi madhushala.
Uss pyaale se pyaar mujhe jo dur hatheli se pyaala,
Uss haala ka chaav mujhe jo dur adhar mukh se haala,
Pyaar nahin pa jaane mein hai,Paane ke armanon mein,
Pa jaata tab haay na itni pyaari lagti madhushala.
Beautiful lines from one of my favourite poets Dr Bachchan.What I love about these lines is that they represent the true nature of our mindplay.We exist at multiple levels and the surprise is we ourselves do not know how many.This nature exibits itself very early when you are a child.As soon as you get the cycle it ceases to fire your imagination anymore.In fact you do not even wish to look at it after a couple of months.But sadly fail to recognise this fleeting aspect of our feelings……Kitni jaldi saki ka aakarshan ghatne lagta hai.When you are young you woo a girl and it feels like heaven when you are actually able to be freindly with her.But as the relation ship gets stronger and more intimate you recognize that your desire is diminishing by the minute.Blaming it on your wrong judgement you compromise and start living as if a stranger in your own home and start chasing another rainbow.If only I was the CEO of a MNC ……..If only I was the wealthiest and most influential man …..if only my children would love me…….If only I would die a peaceful death ! And then you ask yourself :
Praapya nahin hai to ho jaati lupt nahin phir kyun haala,
Praapya nahin hain to ho jaata lupt nahin phir kyun pyaala,
Dur na itni himmat haaroon Paas na itni Pa jaoon,
Vyarth mujhe daudati maru main mrig jal bankar madhushala.
To Listen to the recital of Madhushala By Amitabh Bachchan Pls copy and paste below link on your browser.Press enter :
http://www.esnips.com/doc/01a8dac9-0dce-42cd-b5bc-2c72586f4daa/madhushala
http://in.youtube.com/watch?v=cr7kLxTPjG0&feature=relatet , , , 

Going far means returning

I had always heard the words Yin and Yang knowing that they had something do with the Chinese philosophy and they represented the opposites.But today while reading the Tao of Physics I understood the meaning in depth and was overwhelmed by the profoundness of thought and its representation in our everyday life.The principle characterstic of the Tao is the cyclic nature of its ceaseless motion and change.”returning is the motion of Tao”says LaoTzu,and “Going far means returning”.
The idea is that all developments in nature,those in physical world as well as those of human situations,show cyclic patterns of coming and going,of expansion and contraction.It is deduced from the movement of sun and moon,change in seasons to be ultimately taken as a rule of life.Whenever a situation develops to its extreme ,it is bound to turn around and become its opposite.Thus it is better to have too little than to have too much,and better to leave things undone than to overdo them.Just as the man who travels farther in the east will end up in the west,those who accumulate more and more money will end up being poor – not necessarily in the same dimension.Modern industrial society which has continously aimed at improving the standard of life for all its members has finally ended up in leaving us all at the brink of an environmental disaster.
The idea of cyclic patterns in the motion of Tao( the energy flow)was given a definite structure by the introduction of polar opposites yin and yang.The original meaning of the words yin and yang was that of the shady and sunny side of a mountain.Thus :
That which lets now the dark,now the light appear is Tao.
In the realm of thought yin is the complex,female,intuitive mind,yang the clear and rational male intellect.Yin is the quite,contemplative stillness of a sage,yang the strong,creative action of the king.
Linking it with my personal experience I found the premise to be true in almost all that one experiences during a lifetime.There is joy and sorrow,success and failure,love and hate,agony and ecstasy,ignorance and knowledge,hope and despair…………Life and death.
And if you examine it carefully it is one that lets us appreciate the other.If there was no sorrow in failure we would not know the joy of success.If we did not go through the agony of hate we would not know the ecstasy of love.If we did not feel the despair of death we would not hope for a life well lived.

Is there a God ?

An atheist professor of philosophy speaks to his class on the problem science has with God, The Almighty.He asks one of his new students to stand and …..
Prof: So you believe in God?
Student: Absolutely, sir.
 Prof: Is God good?
Student: Sure. 
Prof: Is God all-powerful?
 Student: Yes. 
Prof: My brother died of cancer even though he prayed to God to heal him. 
Most of us would attempt to help others who are ill. But God didn’t. How is this God good then? Hmm?
 (Student is silent.)
 Prof: You can’t answer, can you? Let’s start again, young fellow. Is God good?
 Student: Yes.
 Prof: Is Satan good?
 Student: No.
 Prof: Where does Satan come from?
 Student: From…God…
 Prof: That’s right. Tell me son, is there evil in this world?
 Student: Yes.
 Prof: Evil is everywhere, isn’t it? And God did make everything.Correct?
 Student: Yes.
 Prof: So who created evil?
 Student does not answer.
 Prof: Is there sickness? Immorality? Hatred? Ugliness? All these terrible things exist in the world, don’t they?
Student: Yes, sir.
 Prof: So, who created them?
 Student has no answer.
 Prof: Science says you have 5 senses you use to identify and observe the world around you. Tell me, son…Have you ever seen God?
 Student: No, sir.
 Prof: Tell us if you have ever heard your God?
 Student: No, sir.
 Prof: Have you ever felt your God, tasted your God, smelt your God? Have you ever had any sensory perception of God for that matter?
 Student: No, sir. I’m afraid I haven’t.
 Prof: Yet you still believe in Him?
 Student: Yes.
 Prof: According to empirical, testable, demonstrable protocol, science says your GOD doesn’t exist. What do you say to that, son?
 Student: Nothing. I only have my faith.
 Prof: Yes. Faith. And that is the problem science has.
 Student: Professor, is there such a thing as heat?
 Prof: Yes.
 Student: And is there such a thing as cold?
 Prof: Yes.
 Student: No sir. There isn’t.
 (The lecture theatre becomes very quiet with this turn of events.)
 Student: Sir, you can have lots of heat, even more heat, superheat, mega heat, white heat, a little heat or no heat. But we don’t have anything called cold. We can hit 458 degrees below zero which is no heat, but we can’t go any further after that. There is no such thing as cold. Cold is only a word we use to describe the absence of heat. We cannot measure cold. Heat is energy. Cold is not the opposite of heat, sir, just the absence of it.
 (There is pin-drop silence in the lecture theatre.)
 Student: What about darkness, Professor? Is there such a thing as darkness?
 Prof: Yes. What is night if there isn’t darkness?
 Student: You’re wrong again, sir. Darkness is the absence of something.
You can have low light, normal light, bright light, flashing light….But if you have no light constantly, you have nothing and it’s called darkness, isn’t it? In reality, darkness isn’t. If it were you would be able to make darkness darker, wouldn’t you?
 Prof: So what is the point you are making, young man?
 Student: Sir, my point is your philosophical premise is flawed.
 Prof: Flawed? Can you explain how?
 Student: Sir, you are working on the premise of duality. You argue there is life and then there is death, a good God and a bad God. You are viewing the concept of God as something finite, something we can measure. Sir, science can’t even explain a thought. It uses electricity and magnetism, but has never seen, much less fully understood either one. To view death as the opposite of life is to be ignorant of the fact that death cannot exist as a substantive thing. Death is not the opposite of life: just the absence of it. Now tell me, Professor. Do you teach your students that they evolved from a monkey?
 Prof: If you are referring to the natural evolutionary process, yes, of course, I do.
 Student: Have you ever observed evolution with your own eyes, sir?
 (The Professor shakes his head with a smile, beginning to realize where the argument is going.)
 Student: Since no one has ever observed the process of evolution at work and cannot even prove that this process is an on-going endeavor, are you not teaching your opinion, sir? Are you not a scientist but a preacher?
(The class is in uproar.)
 Student: Is there anyone in the class who has ever seen the Professor’s brain? (The class breaks out into laughter.)
 Student: Is there anyone here who has ever heard the Professor’s brain, felt it, touched or smelt it? No one appears to have done so. So, according to the established rules of empirical, stable, demonstrable protocol, science says that you have no brain, sir. With all due respect,
Sir, how do we then trust your lectures, sir?
 (The room is silent. The professor stares at the student, his face unfathomable.)
 Prof: I guess you’ll have to take them on faith, son.
 Student: That is it sir… The link between man & god is FAITH. That is all that keeps things moving & alive.
 WANT TO KNOW WHO THAT STUDENT WAS ?
 This is a true story, and the student was none other than………
 Dr. APJ Abdul Kalam, the Ex president of India